आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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न किञ्चिदेकमेकस्मात्, सामग्र्याः सर्वसम्भव इति चेत्, कुत
एतत् ? निमित्तसहितस्यैवोपादानस्य प्रत्यक्षानुपलम्भाभ्यां कार-
णत्वावधारणादिति चेत्, न, दृश्यमात्रविषयत्वात्तयोः। दृश्यत्व
तस्य कथञ्चिन्निरस्तमिति चेत्, न, चेतनेऽपि तथा किं न स्या-
दिति। तस्मादुपादाननिमित्तयोर्यथा परस्परसहितयोरेव कार्य-
शक्तिस्तथा चेतनाचेतनयोरपीत्येकनिवृत्तावितरनिवृत्तिप्रसङ्गः।
यदि कहो कि—कोई भी कार्य किसी एक कारणसे नहीं होता किन्तु
सामग्रीसे ही सब कार्य होता है। तथा कारणसामग्रीमे निमित्त भी
समाविष्ट है। अत कार्यमें निनिमित्तत्वका प्रसङ्ग न होगा—तो ऐसा
क्यों है ? यदि कहो कि—ऐसा इसलिये है कि अन्वय व्यतिरेकके
द्वारा निमित्तसहित ही उपादानमें कारणत्वका निश्चय होता है—तो
ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि अन्वयव्यतिरेकका विषय केवल दृश्य
ही निमित्त होगा। अर्थात् अन्वय व्यतिरेकके बलसे दृश्यनिमित्तका
ही उपादानके साथ साहित्य गृहीत होगा, न कि अदृश्य निमित्तका।
अत अदृश्य निमित्तकी दृष्टिसे कार्यमे निर्निमित्तत्वका प्रसङ्ग रह ही
जाता है।
यदि कहो कि—दृश्यमात्रमें अन्वय व्यतिरेक गृहीत होनेपर भी उसके
द्वारा कारणत्वका निश्चय करनेम दृश्यत्व अविवक्षित रहता है। अर्थात्
दृश्यविषयक अ वय व्यतिरेकग्रहसे दृश्य अदृश्य सभी निमित्तोंमें कारण
ताका निश्चय हो जायगा—तो यह नहीं कह सकते। क्योंकि तब
चेतन कर्ताके विषयमे भी दृश्यत्वकी अविवक्षा क्यों न हो ? अर्थात्
सामान्यत चेतनकर्ता और कार्यमें ही कार्यकारणभाव गृहीत होगा। यह
अनिवार्य नहीं है कि कार्यका उत्पादक दृश्य ही कर्ता होगा। अत
क्षित्यङ्कुरादि कार्यका दृश्य कर्ता नहीं होनेसे अदृश्य (ईश्वर) स्वत
सिद्ध हो जाता है।
इसलिए जैसे परस्पर सहित होनेपर ही उपादान और निमित्तमें
कार्य उत्पन्न करनेकी क्षमता होती है, वैसे ही चेतन और अचेतनके
परस्पर सहित होनेपर ही कार्यकी उत्पत्ति हो सकती है, यह भी मानना
पड़ेगा। अत क्षित्यादिकार्यके प्रति एक (चेतनकर्ता) की निवृत्ति