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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 457, कुल 530 में से

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पृष्ठ 457

न च समस्तविशेषापोहे सामान्यस्थितिः, यतः षट्कारकव्यावृत्ता-
वपि कारकमात्रतः कार्यप्रत्याशा स्यात् । एकप्रवृत्तौ तु सर्वप्रवृत्ति-
रप्रत्यूहेति शृङ्खलाबन्धेन व्यवस्थितेः ।
अथ मतं तवैवेयं प्रक्रिया, यस्माकं तु कार्येणानुविहितभावा-
भावं चेतनमचेतनं वा कारणमुच्यते । सहतौ तु सर्वं स्वप्रधानम् ।
पर सामान्यरूपसे भी कारककी स्थिति नहीं रह पायगी, जिसके आधार
पर प्रसिद्ध छः कारकोंकी व्यावृत्ति हो जानेपर भी सामान्यकारकसे कार्य
की आशा की जाय । यदि सामान्य कारककी स्थितिके लिये किसी
एक कारककी प्रवृत्तिका आश्रय लो तो सभी कारकोंकी प्रवृत्ति निर्विघ्न
हो जायगी । क्योंकि कारकत्वधर्म सभी कारकोंमें समान है । इस
प्रकार कारकोंकी परस्पर बँधी हुई शृङ्खलासे विपक्षबाधककी व्यवस्था हो
जाती है ।
यदि मानो कि—उक्त सारी प्रक्रिया तुम्हारे (नैयायिकके) यहाँ ही
है हमारे (बौद्धके) यहाँ तो कार्यके साथ जिसका अन्वय-व्यतिरेक
बँधा हुआ है ऐसा चेतन या अचेतन ही कारण कहा जाता है । जहाँ
तो चेतन-अचेतनका समुदाय कारण होता है वहाँ सबकी अपनी-अपनी
प्रधानता होती है । ऐसा नहीं कि कोई कारक प्रधान (कर्त्ता) होता है
और कोई अप्रधान (अकर्ता) । अर्थात् “स्वव्यापारे च कर्तृत्वं सर्वत्रैवा-
स्ति कारके' इस वचनके अनुसार सभी कारक अपने-अपने व्यापारमें
स्वतन्त्र (कर्ता) हैं । उपादान (समवायि) और इतर (असमवायि
तथा निमित्त) इन तीनोंकी अपेक्षा क्वचित् है अर्थात् नियत नहीं है ।
अभिप्राय यह है कि कार्यकी उत्पत्तिमें सभी कारकोंके समवधानका कोई
नियम नहीं है । जहाँ समवधानके बिना कार्य नहीं होता, वहीं कर्त्ता
आदि कारकोंके समवधानका नियम होता है । तथा वहाँ भी सभी
अपने-अपने व्यापारमें प्रधान होते हैं । कोई प्रधान और कोई
अप्रधान नहीं होता । तथा कर्मत्व, करणत्व आदिका लक्षण भी उक्त
प्रकारका नहीं है । किन्तु व्यापारवान् होते हुए असाधारण कारणको
करण कहते हैं और अत्यन्त क्रियासे उत्पन्न फलशालीको कर्म कहते
हैं इत्यादि—तो ऐसा नहीं हो सकता । क्योंकि वैसा होनेपर बिना