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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 530 में से

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पृष्ठ 462

अनुपलम्भवादः ४१३
तस्याभावेऽपि जलानलादीनां चेतनप्रेर्यत्वदर्शनात् । न च शरीर-
प्रयोज्यं यत् तदेव चेतनप्रेर्यमिति नियमः, शरीरस्यैव स्वातन्त्र्य-
प्रसङ्गादित्युकम् ।
तस्मादचेतनत्वमात्रनिबन्धनमेतद् दण्डादिषु, तथा च पर-
माण्वदृष्टादिष्वपि तस्य भावात् तथाभावो दुर्वारः । तदेतत् कार्यं
कारणवत्तया व्याप्तम्, सा च विपक्षेऽसंभवन्ती स्वव्याप्यमुपोदाय
अङ्कुरादिकोसे व्यावृत्त तथा केवल घटपटादिमे ही रहने वाला हा और
यही शरीरिकर्तृकत्वका अनुमापक हेतु होगा। किन्तु यह नहीं हो
सकता कि—उक्त अवयव सन्निवेशविशेष ही चेतन कर्तृकत्वका भी प्रयो
जक हो—क्योंकि जल अग्नि आदिमे घटपटादिके समान अवयव
संघटन के नहीं रहने पर भी जलादिका चेतनद्वारा सञ्चालित होना
देखा जाता है। अतः उस दृष्टान्तसे घटपटादिके तुल्य अवयवसन्निवेश
नहीं होनेपर भी क्षिति अङ्कुरादिके चेतन (ईश्वर) द्वारा उत्पादित होनेमे
कोई बाधा नहीं है।
यह भी नियम नहीं है कि—जिस वस्तुका प्रयोजक शरीर है वही
चेतनद्वारा सञ्चालित होती है—क्योंकि शरीरका भी प्रयोजक कोई
दूसरा शरीर नहीं होता, इसलिये तब शरीर भी चेतनद्वारा सञ्चालित
नहीं होगा और शरीरके सञ्चालनमे स्वयं शरीर ही स्वतन्त्र हो जायगा।
ऐसी स्थितिमे मृतशरीर भी चेतनकी अपेक्षा नहीं रहनेसे अपने आप
सञ्चालित होने लगेगा। यह बात पूर्वमे कही ही जा चुकी है।
इसलिये दण्डादिमें जो अपना व्यापार करनेमे पराधीनता है, वह
केवल उसकी अचेतनताके कारण है, यह तृतीयपक्ष ही सुसङ्गत है।
इसप्रकार परमाणु अदृष्ट आदिमे भी अचेतनता धर्मके होनेसे उनका
भी व्यापार चेतनपरतन्त्र ही होगा, यह अनिवार्य है। अर्थात् पर-
माणुओंका प्रेरक चेतन ईश्वर ही है, क्योंकि जीवोंम वह सामर्थ्य
नहीं है।
अतः यह सभी कार्य कारणवत्तासे व्याप्त है। अर्थात् जो जो कार्य
है, वह कारणवाला है। तथा वह कारणवत्ता विपक्षभूत अकर्तृक
( —हीन ) वस्तुमें असंभव होती हुई अपने व्याप्यभूत कार्यत्वके साथ