सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 447, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 447

३९८ आत्मतत्त्वविवेके
नाप्यधिकवृत्तिः, शरीरविनाकृतस्य कर्तुः स्वयमनभ्युप-
गमात् । अस्तु पाक्षिकोऽभ्युपगमः । तेन न तत्कार्यत्वमात्रात्
कर्तृमत्त्वसिद्धिः, शङ्कितोपाधित्वात् । न चोपाधेरेव तत्सिद्धिः,
तस्य स्वयं सन्दिग्धासिद्धत्वादिति चेत्, न, उभयथाऽप्यशरी-
रिकर्तृव्यवस्थातिनियमात् ।
माणुओंमे गति उत्पन्न कर सकता है और तदनन्तर पृथिवी जलादिकी
उत्पत्ति कर सकता है ।
शरीरकी अपेक्षा अधिक सीमामे रहनेवाला भी उपाधि नहीं हो
सकता । अर्थात् जो कार्य शरीरकर्तृक नहीं है उसमे रहनेवाला धर्म
भी उपाधि नहीं हो सकता । क्योकि तत्र शरीरके बिना भी कर्तृत्व
सिद्ध हो जायगा जो तुम्हारे लिए अपसिद्धान्त है । इसका यदि यह
समाधान करो कि—शरीररहित कर्तृत्वरूप शरीराधिकवृत्ति उपाधिका
निश्चयात्मक अभ्युपगम होनेपर ही निरीश्वरवादीके लिये अपसिद्धान्त
होता, पर वैसा नहीं है, किन्तु उक्त उपाधिका पाक्षिक (सन्देहात्मक)
अभ्युपगम है । अत कार्यत्व हेतुमात्रसे सकर्तृकत्वकी सिद्धि नहीं
होगी क्योंकि वहाँ शङ्कितोपाधि है अर्थात् सोपाधिकत्वकी आशङ्कासे
हेतुमें व्यभिचारकी आशङ्का हो जाती है और व्याप्तिज्ञानका प्रतिबन्ध
होकर अनुमिति भी रुक जाती है । अत मेरे लिये अपसिद्धान्त नहीं
होता है । यहाँ नैयायिक यह नहीं कह सकता कि-‘शरीराधिकवृत्ति उस
उपाधिके सकर्तृकत्वरूप साध्यका व्यापक होनेके साथ साथ व्याप्य भी
होनेके कारण उस उपाधिसे ही सकर्तृकत्वरूप साध्यकी सिद्धि हो
जायगी’ क्योंकि उक्त उपाधि स्वयं ही सन्दिग्धासिद्ध है । अर्थात्
न्यायमतमें उसका उपाधित्व ही सन्दिग्ध है । अथवा उसमें सकर्तृकत्व
रूप साध्यका व्याप्यत्व ही असिद्ध है । अतः उपाधिबलसे न्यायमतमें
सकर्तृकत्वकी सिद्धि नहीं की जा सकती है—तो ऐसा समाधान नहीं
कर सकते हो । क्योंकि शरीराधिकवृत्ति उपाधि हो या न हो, दोनों
ही दशाओंमे अशरीरी कर्त्ताकी सिद्धि हो जायगी । अर्थात् यदि
शरीरातिरिक्तवृत्ति उपाधि हो तो उस उपाधिके बलसे ही अशरीरी कर्त्ता
(ईश्वर) की सिद्धि हो जाती है । यदि उक्त उपाधि न हो तो उपाधि