आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४०० | आत्मतत्त्वविवेके |
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सर्वगोचरे च ज्ञाने चिकीर्षाप्रयत्नयोरपि तथाभावः,
तदेकविषयत्वात्तयोः । तथा च कश्चिदुपाधिमादायाशरीर-
पूर्वकमपि किञ्चिदेव कार्यं कर्तृपूर्वकं भविष्यतीति शङ्कापिशा-
च्याः क्कावकाशः ।
एवमन्यत्राप्यनया दिशा उपाधिशङ्का निराकरणीयेति
निरुपाधिसम्बन्धसिद्धिः । विपक्षसम्भवे च साधनप्रयुक्तसाध्य-
एव ज्ञानके सर्वविषयक होनेपर चिकीर्षा और प्रयत्न भी सर्वविषयक
होंगे । क्योंकि ज्ञानका जो विषय होता है, वही चिकीर्षा और प्रयत्न-
का भी विषय होता है । अर्थात् यद्विषयक ज्ञान होता है, तद्विषयक
ही चिकीर्षा और प्रयत्न भी होते हैं । अतः सर्वविषयक नित्यज्ञान-
चिकीर्षा तथा प्रयत्नवाला ईश्वररूप अशरीरी कर्त्ता सिद्ध हो जाता है ।
इस तरह—‘किसी शङ्कित उपाधिको लेकर शरीरके बिना भी उत्पन्न
होनेवाला कुछ ही कार्य कर्तृजन्य होगा न कि सभी कार्य’ इस शङ्का
पिशाचीको भी कहा मौका है ? अर्थात् उपाधिकी आशङ्का ‘अशरीर
पूर्वक भी कुछ ही कार्य सकर्तृक होगा’ इस शङ्काका आपादन
नहीं कर सकेगी । क्योंकि बिना शरीरके भी कर्त्ता सिद्ध हो
जानेपर पूर्वोक्त युक्तिसे उस अशरीरी कर्ताके ज्ञान इच्छा और प्रयत्न
नित्य तथा सर्वविषयक मानने होंगे । ऐसी स्थितिमे जिस कार्यमें तुम
अकर्तृकत्वकी आशङ्का करते हो, उसका भी उपादानकारण अवश्य ही
उस नित्य तथा सर्वविषयक ज्ञान इच्छा और प्रयत्नका विषय होगा ।
तथा उपादानविषयक अपरोक्षज्ञान चिकीर्षा कृतिमत्त्व ही तो कर्तृत्व
है । अतः जिस कार्यमे तुम अकर्तृकत्वकी आशङ्का कर रहे हो उसमे भी
अकर्तृकत्वकी आशङ्का कैसे हो सकेगी ? तात्पर्य यह है कि कोई भी कार्य
बिना कर्त्ताके नहीं हो सकेगा । अतः अशरीरिकर्तृक सभी क्षित्यादिकार्य
सकर्तृक सिद्ध होते हुए ईश्वररूप सर्वज्ञ कर्ताको उपस्थित करते हैं ।
इस प्रकार अन्य अनुमानोंमे भी इसी रीतिसे अर्थात् पूर्वोक्त चार
विकल्पोंके द्वारा उपाधिशङ्काका निवारण करना चाहिये । इस तरह
कार्यत्व और सकर्तृकत्वमे निरुपाधिसम्बन्धरूप व्याप्तिकी सिद्धि हो
जाती है ।