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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 530 में से

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पृष्ठ 464

४१४ आत्मतत्त्वविवेके

व्यावर्त्तमाना सपक्षे विश्राम्यतीत्युभयमुखी प्रतिबन्धसिद्धिः ।
व्याप्तिस्वरूपनिरूपण
कः पुनरयं प्रतिबन्धः ? स्वाभाविकः सम्बन्धः । कः स्वा-
भाविकार्थः ? निरुपाधित्वम् । कः पुनरुपाधिः ? साध्यप्रयोजकं
निमित्तान्तरम् । किमस्य लक्षणम् ? साधनाव्यापकत्वे सति
साध्यव्यापकत्वम् । कथं पुनरेवंलक्षणकोऽर्थः प्रत्येतव्यो निरा-
ही उस विपक्षसे व्यावृत्त होती है । अर्थात् वह कर्तृविहीन वस्तु कार्य
नहीं होती किन्तु नित्य होती है, जिसका कोई कारण ही नहीं होता ।
इसलिये वह कारणवत्ता कर्तृविहीन नित्य वस्तुरूप विपक्षसे व्यावृत्त
होती हुई सकर्तृक वस्तुमे विश्रान्त हो जाती है । इस प्रकार उभयमुखी
(अन्वयमुखी और व्यतिरेकमुखी) व्याप्तिकी सिद्धि हो जाती है ।
अर्थात् जो जो कार्य होता है, वह वह सकर्तृक होता है तथा जो
सकर्तृक नहीं होता वह कार्य भी नहीं होता, जैसे नित्य आकाशादि ।
इस तरह अन्वयव्याप्ति और व्यतिरेकव्याप्तिकी सिद्धि हो जाती है ।
प्रश्न—ईश्वरकी सिद्धिमे व्याप्ति ही मूल है, अत वह व्याप्ति
क्या है ?
उत्तर—हेतुमें साध्यका स्वाभाविक सम्बन्ध व्याप्ति है ।
प्रश्न—स्वाभाविकका क्या अर्थ है ?
उत्तर—निरुपाधिक अर्थात् उपाधि रहित होना ।
प्रश्न—उपाधि क्या वस्तु है ?
उत्तर—साध्यका प्रयोजक कोई दूसरा निमित्त, जो साध्यका
समव्याप्य हो, वही उपाधि है । जैसे, "धूमवान् वह्नेः"
इस अनुमानमे आर्द्वेन्धनसंयोग उपाधि है ।
प्रश्न—उपाधिका लक्षण क्या है ?
उत्तर—साधनका अव्यापक होते हुए साध्यका व्यापक होना उपाधि
का लक्षण है । जैसे, आर्द्वेन्धनसंयोग वह्निरूप साधनका
अव्यापक होते हुए धूमात्मक साध्यका व्यापक होनेसे उपाधि
कहाता है ।