आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
३७६ आत्मतत्त्वविवेके
तर्काश्चात्र भवन्ति—आदिमत्त्वे प्रथमप्रवृत्त्यनुपपत्तौ सर्वथै-
वापवृत्तिप्रसङ्गः । सान्तत्वेऽनादेः सत्त्वानुपपत्तिप्रसङ्गः । अद्र-
व्यत्वे निर्गुणत्वप्रसङ्गः । अविभुत्वे दहनपवनादेः क्रियानुपपत्ति-
प्रसङ्गः¹ ।
न च संयुक्तसंयोगात्तदुत्पत्तिः, साक्षात् क्रियावद्द्वारकस्य
तस्याभावात् । अतथाभूतस्य च तद्धेतुत्वेऽतिप्रसङ्गात् ।
उक्त अनुमानोंमें विपक्षबाधक तर्क
उक्त अनुमानोंमें विपक्षबाधक तर्क भी हैं । जैसे, आत्मा यदि
आदिमान् हो तो जन्मकालिक प्रथम प्रवृत्ति नहीं हो सकनेके कारण उसमें
सर्वथा ही प्रवृत्तिका अभाव होने लगेगा । आत्मा यदि सान्त हो तो
अनादि होते हुए सान्त होनेके कारण वह भाव वस्तु नहीं हो सकेगा,
जैसे प्रागभाव । आत्मा यदि द्रव्य न हो तो वह निर्गुण हो जायगा ।
यदि अव्यापक हो तो अग्नि-पवन आदिमें क्रियाकी उत्पत्ति नहीं हो
सकेगी । अर्थात् नानादिग्वर्ती पवनादिमें अदृष्टवाले आत्माके संयोगसे
ही एकसाथ क्रियाकी उत्पत्ति होती है । आत्माके अव्यापक होनेपर
न सबमें एक साथ आत्माका संयोग हो सकेगा और न उनमें एक साथ
क्रियाकी उत्पत्ति हो सकेगी । किन्तु देखा यह जाता है कि एक ही
साथ अग्नि, पवन, जल आदिमें क्रिया होती रहती है । अतः सबमें
एक साथ संयोग होनेके लिये आत्माका व्यापक होना अनिवार्य है ।
यदि कहो कि—साक्षात् संयोग नहीं होनेपर भी संयुक्तसंयोगसे
पवनादिमें क्रियाकी उत्पत्ति हो जायगी । अर्थात् शरीरवृत्ति अविभु
आत्मासे संयुक्त आकाश और उससे संयुक्त होनेसे पवनादिमें क्रिया
होगी—तो ऐसा नहीं हो सकता । क्योंकि साक्षात् क्रियावान्के द्वारा
वह क्रिया नहीं हो रही है । अर्थात् संयुक्त संयोगसे जहा क्रिया होती
है, वहाँ क्रियावान्के द्वारा ही होती है । जैसे, सँडसीकी क्रियासे लोहे
में क्रिया होती है । देहसंयुक्त होनेपर भी पवनादिमें क्रिया नहीं हो
सकेगी । क्रिया रहितके साथ संयोग भी यदि क्रियाका जनक हो तो
शरीरसंयुक्त आकाशके संयोगसे जहाँ तहाँ क्रिया होने लगेगी ।
१ क्रियानुत्पत्तिप्रसङ्ग इति क्वचित् पाठ ।
अनुपल. भवा१० ३--
मूर्तत्वे नित्यस्यास्मदादिप्रत्यक्षधर्मानाधारत्वप्रसङ्गः, विशेष-
गुणवतापारम्भकत्वप्रसङ्गश्च । सक्रियत्वे मूर्तत्वप्रसङ्ग इति
शास्त्रार्थसंग्रहः ।
अणुरेवासौ, विज्ञानामवायिकारणसंयोगाधारत्वान्मनोवत् ।
अणीयांसमणोरपीति बाधप्रतिरोधाविति१ कश्चित् । तदयुक्तम्,
आत्मन्यविभौ मनसोऽणुत्वासिद्धेः, तत्संयोगक्रमादेव क्रियाक्रमो-
पपत्तेः । आगमस्तु 'महतोऽपि महीयांसम्' इति प्रथमपादमप-
एवं आत्मा यदि मूर्त हो तो नित्य होते हुए मूर्त होनेके कारण हम
लोगोंसे प्रत्यक्ष होने योग्य सुख ज्ञान आदि गुणोंका वह आश्रय नहीं हो
सकेगा । जैसे नित्य एव मूर्त परमाणुओंके गुणोंका प्रत्यक्ष नहीं होता
है । साथ ही मूर्त होते हुए विशेषगुणवान् होनेके कारण द्रव्यका
आरम्भक भी होने लगेगा । जैसे, पृथिवी आदिका परमाणु द्वयण-
कादिका आरम्भक होता है ।
किसीका मत है कि—यह आत्मा अणु है, न कि विभु । क्योंकि
ज्ञानका असमवायिकारण जो सयोग, उसका वह आधार है, जैसे मन ।
अर्थात् ज्ञानका असमवायिकारण आत्म मन सयोग होता है, अतः उस
सयोगका आश्रयभूत मन जैसे अणु है, वैसे ही उसका आश्रयभूत
आत्मा भी अणु ही है । इस अनुमानसे विभुत्वानुमानका प्रतिरोध
हो जायगा । एवं "अणीयासमणोरपि" इस श्रुतिद्वारा बाध भी हो
जायगा—किन्तु उक्त मत अयुक्त है । क्योंकि आत्मा यदि विभु न हो
तो मनका अणुत्व ही नहीं सिद्ध हो सकेगा । कारण, आत्माके विभु
होनेके कारण युगपत् अनेक ज्ञानोंकी उत्पत्ति होने लगेगी, वैसा न हो,
इसीलिये मनकी सिद्धि की जाती है, ताकि अणु-मनके क्रमिक संयोगके
कारण ज्ञान भी क्रमसे ही हो । यदि आत्मा ही अणु हो तो आत्माके
क्रमिक-संयोगसे ही क्रमिक ज्ञान क्रियाकी उपपत्ति हो जायगी, फिर मन
को अणु सिद्ध करना ही असंभव हो जायगा । एव उक्त आगमका जो
प्रमाणके रूपमे उपन्यास किये हो वह भी "महतोऽपि महीयांसम्" इस
१ 'बाधविरोधादिति' इति क्वचित् पाठः ।
३७८ आत्मतत्त्वविवेके
द्वायोपन्यस्तस्तदलमननेन ।
स्यादेतत्, सिद्धोऽप्ययमीदृशो हेय एव । आत्मदर्शी हि
तदुपकारिणि रज्यते, तदपकारिणं च द्वेष्टि । रागद्वेषौ च मूलं
संसारस्य । यस्तु न तं पश्येन्, नासौ तदुपकारापकारिणमपि ।
ततो न रज्येत, न द्विष्यात्, न संसरेदिति जाङ्गलिकेन ( विष-
विद्यावता ) नैर्विष्यवत् मुमुक्षुणापि नैरात्म्यमेव भावनीयमिति
चेत्—न, अनात्मदर्शिनो मुमुक्षुत्वव्याघातात् । न ह्यात्मानम-
प्रतिसन्धाय कश्चिद् दुःखं हातुमिच्छेत् सुखं वाऽवाप्तुम् । मया
१स्वर्गापवर्गफलभागिना भवितव्यमित्यभिप्रायस्य यावदभियोगमनु-
प्रथमपादको छोडकर किये हो, किन्तु ऐसा न करो । अर्थात् प्रथम-
पादस्थ आगमसे विरोध होनेके कारण अणुत्वप्रतिपादक आगम आत्मा
की दुर्बोधता सूचित करनेके लिये है ।।
आत्माका उपादेयत्वनिरूपण
( पूर्वपक्ष ) अस्तु, प्रमाणोंसे सिद्ध हुआ भी इस तरहका आत्मा हेय
( त्याज्य ) ही है । क्योंकि आत्माका ज्ञान रखनेवाला व्यक्ति उसके
उपकारीके प्रति राग रखेगा और उसके अपकारीके प्रति द्वेष करेगा और
ये राग और द्वेष ही संसारके मूल हैं । जो तो ऐसे आत्माका ज्ञान नहीं
करेगा, वह उसके उपकारी और अपकारीको भी नहीं जानेगा और न
उसमें राग करेगा, या न द्वेष करेगा और न आवागमनरूप संसारमें
बँधेगा । अत जिस प्रकार विषवैद्य विषमे भी नैर्विष्य ( औषध ) की
भावनासे ही चिकित्सा करता है, वैसे ही मोक्षकी कामनावाले व्यक्तिको
भी नैरात्म्य ( आत्माका अभाव ) की ही भावना करनी चाहिये ।
समाधान—इस तरहकी बात नहीं कह सकते । क्योंकि जो आत्म-
दर्शी नहीं होगा वह मुमुक्षु ( मोक्षाभिलाषी ) भी नहीं हो सकता है ।
अर्थात् जो दुःखयुक्त आत्माको जानेगा, वही उसके दुःखनाशरूप मोक्षकी
इच्छा करेगा । आत्माका प्रतिसन्धान किये बिना न कोई दुःखको
१. स्वर्गापवर्गपद सुखदुःखाभावपरे इति आधारग्रन्थ टिप्पणी ।
अनुपलम्भवादः ३ *
वृत्तेः। अननुवृत्तावभियोगनिवृत्तौ फलासिद्धेः।
इत्थञ्च नैरात्म्यदृष्टिर्नास्तिक्यं दृढयेत्। तच्च प्रबलविषय-
तृष्णानिष्णतं१ मनर्थमनन्तं प्रसुवीत। न चेदेवम्, कुतो "याव-
ज्जीवेदि"त्यादयो निःशङ्कमुल्लापाः२।
यदुक्तमुपकारिणि रज्येत अपकारिणं द्विष्यादिति, तदेवमे-
तत्। यो हि मोक्षमुपकारं मनुते, स तद्धेतौ रक्तः, तमुपाददानः
तत्परिपन्थिनं द्वेषादलंप्रत्ययाद्वा परिहरन्नेव समीहितं समासाद-
छोड़नेकी इच्छा करेगा और न सुखको पानेकी। मैं स्वर्ग और अपवर्ग
फलका भागी बनूँ यह इच्छा तबतक बनी रहती है, जबतक कि सुख
पाने और दुःख छोड़नेका प्रयत्न जारी रहता है। उक्त इच्छाकी
अनुवृत्ति नहीं रहनेपर प्रयत्न की भी निवृत्ति हो जायगी और प्रयत्नके
अभावमें स्वर्गादि फल भी नहीं सिद्ध हो सकेगा। अर्थात् उक्त फलेच्छा
से सिद्ध होता है कि आत्मतत्त्वका ज्ञान अनिवार्य है।
एवं, यह नैरात्म्यबुद्धि नास्तिक्यको अर्थात् 'न परलोक है और न
कर्मफल होता है' इस तरहके निश्चयको और दृढ़ करेगा तथा वह
नास्तिक्य प्रबल विषय-तृष्णासे भरे हुए अनन्त अनर्थोंको उत्पन्न करेगा।
यदि ऐसा न करता तो क्यों--
"यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।"
इत्यादि निःशङ्क प्रलाप होते ? अर्थात् नास्तिक्यके कारण उत्पन्न
विषय-तृष्णाकी वजहसे ही उक्त प्रलाप नास्तिकोंकी ओरसे किये
जाते हैं।
और जो यह कहा कि--आत्माका प्रतिसन्धान करनेवाला व्यक्ति
आत्माके उपकारीके प्रति राग करेगा और अपकारीके प्रति द्वेष करेगा--
तो यह ऐसा ही है। अर्थात् उक्त कथन ठीक ही है। क्योंकि जो
मोक्षको उपकारके रूपमें मानता है, वह मोक्षके हेतुमें रागवान् होकर
उसे ग्रहण करता हुआ तथा उसके बाधकको (भोगेच्छाको) द्वेषबुद्धि
१. सम्प्लुतम् इति १ पु० पा० । २. निःशङ्कप्रलापाः इति १ पु० पा०
३८० आत्मतत्त्वविवेके
येत, न तु विपर्ययात् । यस्तु भोगम्, सोऽपि तथा, इत्यनुकूल-
मेव प्रतिकूलत्वेन गृहीतं मन्दैः । अन्यत्रानुरज्येत, अन्यत्रापि
द्विष्यादिति न दृष्टं गोवैद्यकेऽपीति ।
तथापि दुःखहेतुत्वादिन्द्रियादिवदसौ हीयतामिति चेत्,
यादृशो दुःखहेतुस्तादृशो हेय एव, सोपाधिश्च तथा । निरुपाधि-
रपि हीयतामिति चेन्न, अशक्यत्वात् , निष्प्रयोजनत्वाच्च । न
या अलंबुद्धिसे दूर करता हुआ अपने अभीष्ट ( मोक्ष ) को प्राप्त कर
सकता है, न कि इसके विपरीत भोगोंके सेवनसे ।
एवं, जो तो भोगको अपने उपकारके रूपमे मानता है, वह भी
वैसा ही करता है । अर्थात् भोगानुकूलमें राग करता हुआ तथा भोगमे
बाधकका परिहार करता हुआ ही अपने अभीष्ट भोगको प्राप्त कर सकता
है । अत यह राग और द्वेष तो अभीष्टके ही साधक हैं । किन्तु
मन्दबुद्धियोंने अनुकूलको ही प्रतिकूलके रूपमें समझ लिया है । अन्यत्र
अर्थात् जो अभीष्ट नहीं है उसमें यदि राग हो तथा जो अभीष्ट हो
उसीमें द्वेष हो तो वह राग और द्वेष प्रतिकूल हो सकता है । किन्तु
ऐसा तो गो-चिकित्सकमे भी नहीं देखा जाता है । क्योंकि गौका चीरना
फाड़ना महान् अनर्थका कारण है, फिर भी चिकित्सक उसे रोगसे मुक्त
करनेके उद्देश्यसे उसकी शल्य-चिकित्सा करता ही है और उसका पाप
उस चिकित्सकको नहीं लगता है । उसी प्रकार राग-द्वेष भी स्वरूपतः
अनर्थका हेतु नहीं होता है, यदि उसका उद्देश्य कल्याणमय हो ।
अतः मुक्तिमें राग करना और उसके प्रतिबन्धकमें द्वेष करना उचित
ही है ।
फिर भी दुःखका हेतु होनेके कारण इन्द्रिय विषय तथा देहादिके
समान यह आत्मा त्याज्य होगा, ऐसा यदि कहो तो जिस तरहका आत्मा
दुःखका हेतु है, वैसा त्याज्य ही है । और शरीर-इन्द्रिय आदि उपाधिसे
युक्त ही आत्मा दुःखका हेतु है । यदि कहो कि-उपाधि विहीन शुद्ध
आत्मा भी त्याज्य होगा-तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि उपाधि-
रहित आत्माका त्याग असंभव है और निष्प्रयोजन भी है । क्योंकि
अनुपलम्भवादः ३८१
हि तस्य हानं विनाशो, नित्यत्वात् । नापि विप्रयोगो, व्यापक-
त्वात् । नाप्यप्रतिपत्तिः, यथा यथा तदर्थं यत्नः, तथा तथा
प्रतिपत्तेः । उपेक्षात इति चेत्, कृतैवैतावन्तं कालमुपेक्षा,
तथापि तद्धानासिद्धेः ।
निष्प्रयोजनं चैतत् , सोपाधेर्हि त्यागो दुःखहानाय, निरु-
पाधेस्तु किमर्थम् ? पुनः सोपाधित्वशङ्कया इति चेत्, न, बीजा-
भावादिति । कुतः पुनरुपादेयः ? तथा मति भावनाक्रमेण
उसके त्यागका अर्थ उसका विनाश नहीं है, क्योंकि यह नित्य है । त्याग
का अर्थ दूर हो जाना या व्यवहित हो जाना भी नहीं है, क्योंकि आत्मा
व्यापक है । अप्रतीतिको भी आत्माका त्याग नहीं कहा जा सकता ।
क्योंकि अप्रतीतिरूप त्यागके लिये जैसे जैसे यत्न किया जायगा, वैसे
वैसे उसकी प्रतीति ही होती जायगी । यदि कहो कि—उपेक्षासे अप्रतीति
की सिद्धि हो जायगी, अर्थात् आत्माकी प्रतीतिके लिये कोई यत्न ही
नहीं किया जायगा, अतः उसकी अप्रतीति स्वतः हो जायगी—तो आपने
इतने समय तक आत्मज्ञानके प्रति उपेक्षा की ही, फिर भी आत्माका हान
( अप्रतीति ) नहीं सिद्ध हुआ । अर्थात् "अहं गौरः अहं सुखी ' इत्यादि
ज्ञानकी धारा चलती ही रहती है । अतः आत्माका त्याग किया जाना
प्रत्येक दृष्टिसे अशक्य है ।
एवं निरुपाधिक आत्माका हान निष्प्रयोजन भी है । क्योंकि
सोपाधिक आत्माका त्याग दुःखसे छुटकारा पानेके लिये अपेक्षित है,
किन्तु निरुपाधिक आत्माका त्याग किसलिये अपेक्षित है ? यदि कहो
कि—सोपाधिककी आशङ्कासे अर्थात् शरीर-इन्द्रिय आदि उपाधिका
भविष्यमे पुनः संसर्गे हो जानेकी आशङ्कासे निरुपाधिक आत्माका भी
त्याग अपेक्षित है—तो यह नहीं कह सकते । धर्माधर्म या मिथ्याज्ञान-
रूप बीजका अभाव हो जानेसे ही आत्माको पुनः शरीरग्रहणकी आशङ्का
नहीं रहेगी ।
यदि यह पूछो कि—आत्मा यदि हेय नहीं है तो उपादेय ( ग्राह्य )
भी क्यों है ?—तो इसका उत्तर यह है कि न्यायके अनुसार आत्माका
३८२ आत्मतत्त्वविवेके
निःश्रेयससिद्धेः । किमस्योपादानम् ? विवेकः । कुतः ?
अनात्मनः शरीरादेः ।
किं पुनरत्र प्रमाणम् ? न्यायः, आम्नायश्च । शरीरमेव
हि तारतम्याभिषिक्तमनात्मान मन्यमानस्य तदुपादाय तदनुकूल-
त्रैलोक्यविषया तृष्णा विजृम्भते, तथा तत्प्रतिकूलविषयो द्वेषः ।
न चैतत् केवलात्मदर्शिनः सम्भवति, निरुपाधेः पुत्रवित्तलोभा-
भावात्, तैरनुपकार्यत्वात्, छेदक्लेददाहशोषाद्यनुपपत्तेः विधि-
मनन कर लेनेपर निदिध्यासनद्वारा शरीरादिसे भिन्न आत्मतत्त्वका
साक्षात्कार होनेसे मोक्षकी सिद्धि होगी । इसीलिये आत्मा उपादेय है ।
यदि पूछो कि-आत्माके उपादानका क्या अभिप्राय है ? तो उत्तर होगा-
विवेक अर्थात् भिन्नरूपमे ज्ञान । यदि पूछो—किससे ? तो कहूँगा,
अनात्मभूत शरीर इन्द्रिय आदिसे । अर्थात् शरीर, इन्द्रिय, मन तथा
विषय आदिसे भिन्नरूपमें आत्माका ज्ञान ही उसका उपादान है ।
यदि पूछो कि-शरीरादिसे भिन्नरूपमें आत्माका ज्ञान करना चाहिये,
इसमें क्या प्रमाण है ?—तो यही उत्तर है कि न्याय और आम्नाय (श्रुति)
दोनों ही प्रमाण हैं । क्योंकि शरीरको ही, जो सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं
पूर्णरूपसे अनात्मा है, आत्मा माननेवाले व्यक्तिको शरीर पाकर उसके
अनुकूल संसारविषयक तृष्णा जगती है तथा शरीरके प्रतिकूल विषयके
प्रति द्वेष जगता है । इसप्रकारकी तृष्णा और द्वेष निरुपाधिक आत्म-
ज्ञानीको नहीं हो सकता है । क्योंकि उपाधिविहीन आत्माको पुत्र धन
आदिका लोभ नहीं होता है । कारण, उपाधि हीन आत्माका पुत्रवित्तादि
से कोई उपकार नहीं है । एव निरुपाधि आत्माको छेदन, क्लेदन,
दाह या शोषण आदिका कुछ भी अनुभव नहीं होता है। इसलिये
छेदनादिके हेतुओंके प्रति द्वेष भी नहीं होता ।
एव विधि-निषेधोंमे निरुपाधि आत्माका अधिकार भी नहीं है ।
अर्थात् वैदिक यज्ञादि विधियोंमें तथा हिंसादि निषेधोंमें शरीरवान् आत्मा
ही अधिकारी है । अतः निरुपाधि आत्माको विहितानुष्ठान या निषिद्ध-
परित्यागकी दृष्टिसे भी तृष्णा या द्वेषकी सम्भावना नहीं है । क्योंकि
अनुपलम्भवादः ३८३
निषेधानधिकाराच्च । जन्मजातिवयोवित्तसंस्काराद्युपग्रहेण
तत्प्रवृत्तेः ।
ततोऽनात्मन्यात्मग्रहो निदानं संसारस्य, मिथ्याज्ञानं च
तत्त्वज्ञानान्निवर्तते । तच्च श्रवणमननादिक्रमेणोत्पद्यते । कारण-
निवृत्तौ च कार्यं न जायते । उत्पन्नश्च धर्माधर्मप्रचयो भोगेन
क्षीयत इति न्याय्यार्थपारसंक्षेपः । आम्नायसारसंक्षेपस्त्वशरीरं
वाव सन्तमित्यादि ।
जन्म (शरीरग्रहण), ब्राह्मणत्वादि-जाति, दीर्घायुष्ट्वरूप वय, यज्ञसम्पादनके
लिये समुचित द्रव्य तथा उपनयन-संस्कार आदि होनेपर ही विधि-निषेध-
शास्त्रमें अधिकार होता है, अन्यथा नहीं । अर्थात् उक्त जन्म-जाति आदि
का उपग्रह वीतराग आत्मतत्त्वदर्शीको नहीं होनेसे उसका विधि-निषेधोंमे
अधिकार नहीं होता ।
अतः शरीर-इन्द्रियादि अनात्मवस्तुमे आत्मत्वका ग्रहणरूप मिथ्या-
ज्ञान ही संसारका हेतु है, और वह मिथ्याज्ञान तत्त्वज्ञानसे दूर होता
है । तथा वह तत्त्वज्ञान भी श्रवण मनन निदिध्यासनक्रमसे पैदा होता
है । इसप्रकार आत्मतत्त्वज्ञानसे मिथ्याज्ञानरूप संसारहेतुकी निवृत्ति
हो जानेसे संसाररूप कार्यकी भी निवृत्ति हो जाती है । अर्थात् मिथ्या-
ज्ञानकी निवृत्तिसे रागद्वेषरूप दोषकी निवृत्ति होती है । दोषकी निवृत्ति
से प्रवृत्तिकी निवृत्ति होती है । तथा प्रवृत्तिकी निवृत्तिसे जन्मकी
निवृत्ति हो जाती है । जन्मकी निवृत्ति हो जानेसे पुनः दुःखोत्पत्ति नहीं
होती है, यही अपवर्ग है ।¹
एवं पूर्वोत्पन्न धर्माधर्मका समूह भोगद्वारा क्षीण हो जाता है । अतः
उस कारणसे भी पुनः संसारकी संभावना नहीं रह जाती है । यही
न्यायसिद्धान्तके रहस्यका संक्षेप है । वेदिकरहस्यका संक्षेप तो "अशरीरं
वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः" इत्यादि है । अर्थात् शरीर-इन्द्रिय
आदि उपाधियोंका विगम होनेपर आत्मामें संसारकी निवृत्ति हो
जाती है ॥
१. 'दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः'
(न्या० द० १।१।२।)
३८४ आत्मतत्त्वविवेके
तदप्रामाण्यं प्रपञ्चमिथ्यात्व-सिद्धान्तभेद-तच्चोपदेशपौनः-
पुन्येषु अनृत-व्याघात-पुनरुक्तदोषेभ्य इति चेन्न, न, मतात्पर्य-
त्वात् । निष्प्रपञ्च आत्मा ज्ञेयो मुमुक्षुभिरिति हि तात्पर्यं
प्रपञ्चमिथ्यात्वश्रुतीनाम् । आत्मन एकस्य ज्ञानमपवर्गसाधन-
मित्यद्वैतश्रुतीनाम् । दुरूहोऽयमिति पौनःपुन्यश्रुतीनाम् । बहिः
संकल्पत्यागो निर्मनस्कश्रुतीनाम् । आत्मैवोपादेय इत्यानन्द-
श्रुतीनाम् । गारुडवदनुष्ठाने तात्पर्यं प्रकृत्यादिश्रुतीनाम् ,
तन्मूलानां साङ्ख्यादिश्रुतीनां चेति नेयम् । अन्यथा “जैमिनि-
आम्नायमें अप्रामाण्यका खण्डन
यदि कहो कि—आम्नाय ( वेद ) अप्रमाण है । क्योंकि प्रत्यक्ष
सिद्ध प्रपञ्चको मिथ्या बतानेके कारण वह अनृतदोषसे ग्रस्त है । एवं
“सदेव सोम्येदमग्र आसीत्” इत्यादि श्रुतियोंमें अद्वैतका प्रतिपादन किया
गया है और अन्यत्र श्रुतिमें द्वैतका प्रतिपादन किया गया है, इस
प्रकार सिद्धान्तभेद मिलनेसे व्याघातदोषसे ग्रस्त है । तथा एक ही
ब्रह्मका बारबार उपदेश होनेके कारण पुनरुक्तदोषसे ग्रस्त है—तो ऐसा
नहीं कह सकते हैं । क्योंकि उक्त कथनोंका अभिप्राय दूसरा है । जैसे,
“मोक्षार्थियोंके लिये निष्प्रपञ्च आत्मा ज्ञेय है” इसमें प्रपञ्चको मिथ्या
बतानेवाली श्रुतियोंका तात्पर्य है । ‘एकमात्र आत्माका ही ज्ञान मोक्ष
का साधन है” इसमें अद्वैत श्रुतियोंका तात्पर्य है । आत्माको अमना
बतानेवाली श्रुतियोंका तात्पर्य बाह्यसङ्कल्पोंका त्याग करनेमें है । आत्मा
को आनन्दस्वरूप बतानेवाली श्रुतियोंका तात्पर्य “आत्मा ही उपादेय है”
इस अर्थमें है । प्रकृतिको चेतनसंसर्गसे सृष्टिकर्ता बतानेवाली श्रुतियों
तथा तन्मूलक साख्यादि दर्शनोंका तात्पर्य गारुडविद्याके समान अनुष्ठान
में है । अर्थात् गरुडविद्या जाननेवाले जाङ्गलिक साँपके काटनेसे अचेतन
हुए व्यक्तिमें परिश्रमद्वारा चैतन्य उत्पन्न कर देता है । उसी प्रकार
अचेतन भी प्रकृतिमें चैतन्यका उपराग बताया गया है । इसका तात्पर्य
यह है कि शरीरादिसे भिन्न अपने तत्त्वको नहीं जाननेवाले अचेतनतुल्य
आत्माको तत्त्वज्ञानके लिये प्रणिधान ( समाधि ) का उपदेश देनेके लिये
सांख्यमतका प्रतिपादन हुआ है । यदि इसप्रकारका तात्पर्य न हो तो
—यदि वेदज्ञः कपिलो नेति का प्रमा ।
तावुभौ यदि वेदज्ञौ व्याख्याभेदस्तु किं कृतः ? ॥” इति ।
प्रामाण्यं तु तस्य कुत इति चेन्, आप्तोक्तत्वात् । तदसिद्ध-
मिति चेत्, न, विश्वस्य कर्तुरनुमानसिद्धत्वात् । विवादाध्यासित-
र्विश्वं सकर्तृकं कार्यत्वादिति ।
विशेषविरुद्धोऽयं हेतुरिति चेत्, न, विरोधिविशेषाप्रतीतौ
विरोधस्य प्रत्येतुमशक्यत्वात्, तत्प्रतीतौ वा सहोपलम्भनियमेन
[इ]समे क्या प्रमाण है कि जैमिनिमुनि वेदज्ञाता हैं और कपिलमुनि
[न]हीं हैं। यदि दोनों ही महर्षि वेदज्ञाता हैं, तो दोनोंकी व्याख्या
यों भिन्न भिन्न हो जायगी ? अर्थात् तात्पर्यभेदसे दोनोंकी व्याख्या
[स]ङ्गत है ॥
वेदप्रामाण्यका स्थापन
यदि कहो कि—वेदमे अप्रामाण्य भले ही न हो, किन्तु उसमे प्रामाण्य
[की] सिद्धि कैसे होगी ?—तो यही कहूँगा कि आप्तद्वारा उक्त होनेके
[का]रण वेद प्रमाण हैं। यदि कहो कि वेदमे आप्तोक्तत्व असिद्ध है—
[त]ो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि संसारका कर्ता (ईश्वर) अनुमानसे
सिद्ध है। यहाँ अनुमानका स्वरूप यों है—विवादास्पद है कर्ता जिसका,
[ऐ]सा यह विश्व, कर्तासे उत्पन्न है, क्योंकि यह कार्य (उत्पत्तिमान्)
[है]। जो जो कार्यवस्तु है, उसका अवश्य कोई कर्ता होता है, जैसे
घटरूपकार्यका कर्ता कुम्भकार होता है, इत्यादि ।
यदि कहो कि—ईश्वरको सिद्ध करनेवाला कार्यत्व हेतु पक्षधर्मता-
[ब]लसे सिद्ध होनेवाले अशरीरी कर्तारूप विशेषके विरुद्ध है। अर्थात्
[उ]क्त अनुमानद्वारा जो ईश्वर सिद्ध होता है, वह पक्षधर्मताबलसे
नित्य सर्वज्ञ एव अशरीरी सिद्ध होता है। किन्तु कार्यत्व हेतु उसके
विरुद्ध है। क्योंकि लोकमे जो भी कार्य देखा जाता है जैसे
घटापटादि वह सभी शरीरी कर्तासे उत्पन्न है। अत कार्य होना
अशरीरी कर्ताके विरुद्ध है—तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि पक्ष-
[ध]र्मताबलसे अशरीरी कर्तारूप विरोधीभूत विशेषकी प्रतीति है ? या नहीं
२५
३८६ आत्मतत्त्वविवेक
विरोधस्य बाधितत्वात् ।
सर्वथैवाप्रतीतस्याभिप्रायगोचरत्वमपि कथमिति चेत्, न,
स्वार्थानुमानसिद्धत्वात् । ततोऽपि कथं सिद्ध्यतीति चेत्, अप्र-
तीतप्रत्यायकं प्रमाणम्, न त्वप्रतीतेन विरोधः शक्यनिश्चय इत्यतो
विशेषात् ।
का पुनरनुमानस्यैवम्भूतप्रत्यायने शक्तिरस्तीति चेत्,
है ? यदि उसकी प्रतीति ही नहीं है तो विरोधीकी प्रतीतिके अभावमे
विरोधकी प्रतीति ही नहीं हो सकेगी । यदि अशरीरी कर्त्ताकी प्रतीति है
तो अशरीरिकर्त्तृकत्व और कार्यत्वकी साथ-साथ उपलब्धि होनेके कारण
उनका विरोध बाधित है । अर्थात् जिसका साथ साथ उपलम्भ होता है,
उसमे विरोध बताना अग्निको शीत बतानेके बराबर है ।
यदि कहो कि—क्षित्यादिके कर्त्ता ईश्वरके जो नित्यत्व सर्वज्ञत्व-
अशरीरित्व आदि विशेष हैं, वे सर्वथा ही अप्रतीत हैं, अत वे तुम्हारे
तात्पर्यके विषय भी कैसे हो सकते हैं ? तथा अशरीरिकर्त्तृकत्वकी सिद्धि-
के लिये न्यायप्रयोग भी कैसे हो सकेगा ?—तो ऐसा नहीं कह सकते ।
क्योंकि विशेषकी स्वार्थानुमानसे सिद्धि है । अर्थात् स्वार्थानुमानस उसकी
प्रथम प्रतीति करके पश्चात् दूसरेको बतानेके लिये परार्थानुमानका प्रयोग
किया जाता है । यदि पूछो कि—स्वार्थानुमानसे भी उस विशेषकी कैसे
सिद्धि हो सकती है, जो सर्वथा ही अप्रतीत है । क्योंकि पक्षधर्मता
भी व्याप्तिबलसे आनीत अर्थको ही पक्षमे सिद्ध करती है, न कि जो
सर्वथा ही अप्रतीत है उसको । अशरीरी कर्त्ता तो सर्वथा ही अप्रतीत
है—तो यहाँ विशेषकी सिद्धि इसलिये हो सकेगी कि अप्रतीत वस्तुकी
प्रतीति कराना ही तो प्रमाणका काम है । अर्थात् प्रमाणकी महिमासे
उसकी प्रतीति हो जाती है । क्योंकि जबतक प्रतीति नहीं हुई रहती है
तबतक उसका हेतुभूत प्रमाणके साथ विरोधका निश्चय भी कैसे हो
सकता है ? प्रतीतिकी दशामें तो उस विशेष और प्रमाणकी साथ साथ
उपलब्धि होनेसे ही अविरोध सिद्ध हो जाता है ।
अनुमानकी वह कौनसी शक्ति है, जो इस प्रकारकी अप्रतीत वस्तुकी
प्रतीति करा देती है ?—तो इसका उत्तर यह होगा कि आकाङ्क्षा (अन्वय
आकाङ्क्षानुपपत्तिनियमभेदेन त्रिविधः सम्बन्धः। तत्रा-
काङ्क्षानियमाभ्यामन्वयी, अनुपपत्तिनियमाभ्यां व्यतिरेकीति
विभागः।
अस्तु तर्हि सत्प्रतिपक्षत्वं शरीराजन्यत्वादिति चेत्, न,
असमर्थविशेषणत्वेनासिद्धभेदस्यातुल्यबलत्वात्।
सहचार) और अनुपपत्ति (व्यतिरेक-सहचार) से ग्राह्य जो नियम
विशेष अर्थात् अन्वयव्याप्ति, व्यतिरेकव्याप्ति और अन्वय-व्यतिरेक
व्याप्ति है, तत्स्वरूप जो हेतुमें रहनेवाला तीन प्रकारका सम्बन्ध होता
है, वही अनुमानकी शक्ति है। इनमें अन्वयसहचार एव अन्वय-
व्याप्तिसे अन्वयी हेतु है, तथा व्यतिरेकसहचार एव व्यतिरेकव्याप्तिसे
व्यतिरेकी हेतु होता है, तथा अन्वय-व्यतिरेक उभय सहचारसे प्रतीत
होनेवाली व्याप्तिमे अन्वय व्यतिरेकी हेतु होता है। यह त्रिविध
हेतुओंका विभाग है। अर्थात् प्रतीतिके अपर्यवसानरूप आकाङ्क्षा तथा
प्रतीतवस्तुका अपर्यवसानरूप अनुपपत्ति इन दोनोंमेसे कोई एक अनु-
मितिमें अवश्य रहती है। अतः "क्षितिः सकर्तृका, कार्यत्वात् घटवत्"
यह अन्वयी अनुमान तबतक पर्यवसित नहीं हो सकता, जबतक कि
कर्तामे सर्वज्ञत्वका भान उस अनुमितिमे न हो। क्योंकि उपादानभूत
परमाण्वादिविषयक अपरोक्षज्ञानकी सत्ता ही कर्तृत्व है। तथा इसप्रकार-
का कर्तृत्व होनेके लिये कर्ताको परमाणु आदिका प्रत्यक्षज्ञान करनेवाला
सर्वज्ञ होना चाहिये। एवं, वह नित्य और अशरीरी भी इसीसे सिद्ध
हो जाता है।
यदि कहो कि—पूर्वोक्त दोष न होनेपर भी जन्यत्व हेतु शरीरा-
जन्यत्व हेतुके साथ सत्प्रतिपक्षित हो जाय। अर्थात् “क्षित्यादिकं
सकर्तृकं जन्यत्वात्" इस अनुमानका प्रतिपक्षी अनुमान होगा ‘क्षित्या-
दिक न सकर्तृकं, शरीराजन्यत्वात्”। अत शरीरसे उत्पन्न नहीं होनेके
कारण पृथिवी आदिका कोई कर्ता नहीं है—तो ऐसा नहीं कह सकते।
क्योंकि उक्त प्रतिपक्षी अनुमानके शरीराजन्यत्व हेतुमे शरीरविशेषण
असमर्थ है अर्थात् व्यभिचारका निवारक नहीं है। अतः शरीराजन्यत्व
हेतु व्याप्यत्वासिद्ध है। कारण, हेतुमें कोई भी विशेषण देनेका प्रयोजन
३८८ आत्मतत्त्वविवेके
असिद्धिपरिहारे विशेषणं समर्थमिति चेन्, न, एकाम-
सिद्धिं परिहरतो द्वितीयापत्तेः । अन्यथा विवादाध्यासितं
नादृष्टहेतुकं शरीराजन्यत्वादित्यनेनापि जन्यत्वस्य सत्प्रतिपक्ष-
प्रसङ्गानिति ।
तर्कापरिशुद्धिरस्तु दूषणम्, शरीरनिवृत्तौ बुद्धिनिवृत्तेः ।
बुद्धिनित्यत्वे शरीरानुपयोगवत्, प्रयत्ननित्यतायां ज्ञानेच्छा-
नुपयोगादिति चेत्, न, प्रयत्नस्य द्विधर्मकत्वात् । स हि
है व्यभिचारका वारण । किन्तु यहाँका शरीर विशेषण व्यभिचारवारक
नहीं होनेसे व्याप्यत्वासिद्धके अन्तर्गत आ जाता है । अत यह असिद्ध-
हेतु कर्तृसाधक पूर्वोक्त अनुमानके तुल्यबलवाला नहीं है। तुल्यबल
होनेपर ही सत्प्रतिपक्ष होता है ।
यदि कहो कि—केवल अजन्यत्वको हेतु बनानेमें यह हेतु स्वरूपा-
सिद्ध हो जायगा । क्योंकि क्षित्यादिक अजन्य नहीं है किन्तु जन्य है ।
अत स्वरूपासिद्धिका वारण करनेके कारण शरीर-विशेषण समर्थ
( सार्थक ) है । क्योंकि क्षित्यादिक शरीरसे तो अजन्य है ही—तो यह
भी नहीं कह सकते । क्योंकि एक असिद्धिका परिहार करनेमे पुनः
दूसरी असिद्धि ( व्याप्यत्वासिद्धि ) की आपत्ति हो जाती है । यदि
असमर्थ विशेषणकी दशामै भी सत्प्रतिपक्ष हो तो "क्षित्यादिकम् अदृष्ट-
हेतुक, जन्यत्वात्" यह अनुमान भी 'क्षित्यादिक न अदृष्टहेतुकम्,
शरीराजन्यत्वात्" इस प्रतिपक्षी अनुमानके द्वारा सत्प्रतिपक्षित होने
लगेगा ।
यदि कहो कि—ईश्वर साधक अनुमानमे विरुद्धत्वदोष या सत्प्रति-
पक्षत्वदोष भले न हो फिर भी तर्कापरिशुद्धिदोष होगा । अर्थात्
उक्त अनुमान प्रतिकूल तकोंसे उपहत हो जायगा । जैसे—जगतका
कर्ता यदि अशरीरी होगा तो शरीरके बिना उसमें बुद्धि भी नहीं हो
सकेगी । ईश्वरीयज्ञानके नित्य होनेसे उसके लिये यदि शरीरकी कोई
उपयोगिता न हो तो उसी तरह ईश्वरीय प्रयत्नके भी नित्य होनेसे उसके
लिये ज्ञान और इच्छाकी भी उपयोगिता समाप्त हो जायगी और ईश्वर
अनुपलम्भवादः ३८९
ज्ञानकार्यं ज्ञानैकविषयञ्च कर्तृत्वम् । तत्र कार्यत्वनिवृत्तौ कारण-
तया ज्ञानं मा पेक्षिष्ट, विषयार्थं तु तदपेक्षा केन वार्यते ? न
चास्य स्वरूपेणैव विषयप्रवणत्व, ज्ञानत्वप्रसङ्गात् । अयमेव हि
ज्ञानात् प्रयत्नस्य भेदो यदयमर्थाप्रवण इति ।
न च निर्विषय एवास्त्विति वाच्यम्, अकारणत्वप्रस-
ङ्गात् । तथा च सोऽप्येकः कथं सिध्येत् ? मा सैत्सीदिति
चेत्, न, तत्र साधनस्य निर्दोषत्वात् । दोषे वा स एव
ज्ञानरहित भी सिद्ध हो जायगा। अर्थात् जैसे शरीरके बिना भी ईश्वरीय
ज्ञानकी सत्ता मानते हो उसी प्रकार ज्ञान और इच्छाके बिना भी
ईश्वरीय प्रयत्न मानना पडेगा, जो कि "जानाति, इच्छति, यतते" इस
नियमके विरुद्ध है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि प्रयत्नके दो धर्म
हैं—एक यह कि वह कर्तृत्वरूप प्रयत्न ज्ञानका कार्य है । दूसरा यह कि
वह प्रयत्न ज्ञानसमानविषयक होता है, अर्थात् यद्विषयक ज्ञान होता
है, तद्विषयक ही प्रयत्न भी होता है । अत ईश्वरीय प्रयत्नमे कार्यत्व-
धर्मका अभाव होनेसे कारणके रूपमे ज्ञानकी अपेक्षा भले ही न हो
फिर भी विषयके लिये प्रयत्नको ज्ञानकी अपेक्षा होगी, इसे कौन रोक
सकता है । अर्थात् ईश्वरके नित्य भी इच्छा और प्रयत्न विषयलाभके
लिये ज्ञानकी अपेक्षा करते हैं । प्रयत्नको बिना ज्ञानकी अपेक्षा किये
ही सीधे विषयोन्मुख नहीं माना जा सकता, क्योंकि तब वह प्रयत्न न
होकर ज्ञान हो जायगा । कारण, ज्ञानसे प्रयत्न का यही भेद है कि
प्रयत्न सीधे विषयोन्मुख नहीं होता किन्तु ज्ञानके द्वारा ही होता है ।
अर्थात् ज्ञानीय विषयमे ही प्रयत्न भी होता है ।
यहाँ यह नही कह सकते कि—प्रयत्नको सविषयक माननेमे
ही ज्ञानकी अपेक्षा होगी, अत प्रयत्न निर्विषयक ही माना जाय–क्योंकि
तब उसमें कारणता भी नहीं हो सकती है । क्योंकि प्रयत्न कारण इसी
लिये कहाता है कि वह विषयमे व्यापार उत्पन्न करता है । अत.
निर्विषयक होनेके कारण प्रयत्न जब कारण ही नहीं हो सकेगा तो केवल
[...]को कैसे सिद्धि हो सकेगा ? अर्थात् कार्यत्वहेतुके बलसे
३९० आत्मतत्त्वविवेके
बाधः। सर्वविषयत्वात्तस्य किं विषयनियमार्थेन ज्ञानेनेति-
चेत्, न, तस्य स्वरूपेणार्थप्रवणत्वाभावात्, भावे वा ज्ञानत्व-
प्रसङ्गादित्युक्तम्।
जीवनयोनिप्रयत्नवद् विषयव्यवस्था भविष्यतीति चेत्,
न, जात्यन्तरत्वात्। एकजातीयत्वे तस्यापीच्छापूर्वकत्वप्रस-
ङ्गात्। इच्छाया वा तत्कारणत्वं न स्यात्, तामन्तरेणापि
ज्ञान-इच्छा आदि भले ही सिद्ध न हो किन्तु प्रयत्नके अकारण हो
जानेसे कार्यत्व हेतुसे प्रयत्न-पूर्वकत्व भी नहीं सिद्ध हो सकेगा। और
ज्ञान इच्छाके साथ साथ प्रयत्न भी जगत्के मूलरूपसे बहिष्कृत
हो जायगा।
यदि कहो कि—प्रयत्न भी मत सिद्ध हो, क्या हानि है?—तो ऐसा
नहीं कह सकते। क्योंकि सृष्टिमे प्रयत्न-पूर्वकत्व सिद्ध करनेवाला
कार्यत्व-हेतु सर्वथा दोषरहित है। यदि उसे भी सदोष मानो तो फिर
वही बाध-दोष आ जाता है। अर्थात् कार्यवस्तुका बिना प्रयत्नके होना
प्रत्यक्षबाधित है। यदि कहो कि—ईश्वरीय प्रयत्नके सर्वविषयक होनेसे
उसमें विषय नियमार्थ ज्ञानकी सत्ता मानना व्यर्थ है—तो ऐसा नहीं
कह सकते। क्योंकि प्रयत्नमें स्वत (सीधे) विषय प्रवणता (विषयो-
न्मुखता) नहीं होती है। यदि हो तो विषयसे सीधा सम्बन्ध
होनेके कारण वह प्रयत्न न होकर ज्ञान हो जायगा। क्योंकि
ज्ञानका ही विषयसे सीधा सम्बन्ध होता है। यह बात पूर्वमे कही
जा चुकी है।
यदि कहो कि—जीवनयोनि प्रयत्नके समान ही अन्य प्रयत्नमें भी
विषयकी व्यवस्था हो जायगी। अर्थात् जीवनयोनि प्रयत्न बिना ज्ञानके
ही प्राणविषयक होता है और अचेतावस्थामें भी प्राणी उसीके कारण
श्वास प्रश्वास क्रिया करता रहता है, वैसे ही अन्य प्रयत्न भी बिना ज्ञान
के ही सविषयक होगा—तो यह नहीं हो सकता। क्योंकि जीवनयोनि-
प्रयत्न एक दूसरी ही जातिका प्रयत्न है। यदि एक ही जातिका हो तो
वह भी अन्य प्रयत्नोंके समान इच्छा पूर्वक होने लगेगा। अर्थात्
इच्छा होने
अनुपलब्धवादः ३९१
तज्जातीयस्योत्पत्तेः । तस्मात् कृतिजातीयस्य ज्ञानेच्छाभ्यामेव
सविषयव्यवस्था । स च साधयितुमिष्ट इति ।
तार्किकगर्ववाहस्त्वाह—ननु सपक्षविपक्षयोर्दर्शनादर्शन-
मात्रस्य शतशः प्रवृत्तावपि व्यभिचारोपलम्भात् , तल्लक्षणस्या-
नुपलब्धव्यभिचारस्यापि तथाभावसम्भावनाक्रान्तत्वात् लक्ष-
णान्तरं प्रतिबन्धस्य वक्तुमुचितम् । तच्चोपाधिविरहो वा
स्यात् , तदुत्पत्तिर्वा, विपक्षे बाधकं वेति संक्षेपः । तत्र न
प्रथमः, अदृश्योपाध्यभावनिश्चयोपायाभावात् । दृश्येनैवोपा-
धिना भवितव्यमिति च नियमानुपपत्तेः ।
प्रयत्न बिना इच्छाके होता है, वैसे ही अन्य प्रयत्नमें भी इच्छाकी
कारणता नहीं हो सकेगी । क्योंकि इच्छाके बिना भी उसी जातिका
दूसरा प्रयत्न ( जीवनयोनि प्रयत्न ) उत्पन्न होता है । इसलिये उस
प्रयत्नमे, जो इच्छाके अधीन उत्पन्न होता है, ज्ञान और इच्छाके
द्वारा ही सविषयत्वकी व्यवस्था होती है । और वही प्रयत्न यहाँ
सिद्ध करनेके लिये मेरा अभीष्ट भी है । अर्थात् कार्यत्व हेतुसे
क्षित्यादिके प्रति उक्त कृति ( प्रयत्न ) मान् कर्ता ही सिद्ध करना मेरा
अभीष्ट है ।
अपनी तार्किकताका अभिमान रखनेवाले बौद्धका पूर्वपक्ष—सपक्षमें
हेतुसत्त्वज्ञान तथा विपक्षमें हेतुव्यावृत्तत्वज्ञानकी सैकड़ों बार प्रवृत्ति
होनेपर भी व्यभिचार देखा जाता है । अत सपक्षसत्त्व-विपक्षव्यावृत्त-
त्त्वरूप व्याप्तिलक्षणमें तत्काल व्यभिचारकी उपलब्धि न होनेपर भी
उसमे व्यभिचारकी संभावना बनी रहती है । इसलिये व्याप्तिका
दूसरा लक्षण करना चाहिये । और वह लक्षण उपाधिका अभावरूप
है, या तदुत्पत्तिरूप है अथवा विपक्षमें बाधकरूप है—यही संक्षेपसे
कहा जाता है । इनमें प्रथम नहीं हो सकता । क्योंकि जो उपाधि
प्रत्यक्ष-योग्य नहीं है, उसके अभावके निश्चयका कोई उपाय नहीं है ।
तथा दृश्य ही उपाधि होगा, ऐसा नियम भी नहीं हो सकता ।
३९२ आत्मतत्त्वविवेके
नापि द्वितीयः, सा ह्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां निश्चीयते, तौ
च दृश्यशरीरवच्चेतननिष्ठौ वा स्याताम् ? उपाधिविधुरदृश्या-
दृश्यसाधारणचेतनमात्रनिष्ठौ वा ? न प्रथमः, विटपादौ
व्यभिचारात्, प्रकृतासिद्धेश्च।
न द्वितीय , घटादिकार्यव्यतिरेकममये तत्प्रयोजककुलाल-
व्यतिरेकवद् दृश्य¹चेतनमात्रव्यतिरेकस्य निश्चेतुमशक्यत्वात् ।
दूसरा तदुत्पत्तिपक्ष भी व्याप्तिके लक्षणके रूपमे नहीं माना जा
सकता है । क्योंकि जो जिससे उत्पन्न होता है, वह उसका व्याप्य होता
है—यही तदुत्पत्तिरूप व्याप्तिका अभिप्राय है । किन्तु तदुत्पत्तिका
निश्चय अन्वयव्यतिरेकसे होगा । अर्थात् 'तत्सत्त्वे तत्सत्त्वमन्वय,
तदभावे तदभावो व्यतिरेक " इसके अनुसार अग्निके रहनेपर धूम होता
है और अग्निके अभावमे धूम नही होता है, इसलिये अग्निद्वारा
धूमोत्पत्तिका निर्णय होता है तथा तदुत्पत्तिके कारण धूममें अग्निकी
व्याप्तिका निश्चय होता है । किन्तु प्रकृतमे वे अन्वय और व्यतिरेक
दृश्यशरीरसे युक्त चेतनमें स्थित होंगे ? या उपाधिसे रहित दृश्या
दृश्यसाधारण चेतनमात्रमे स्थित होंगे ? इसमें प्रथमपक्ष नहीं हो
सकता । क्योंकि वृक्षादिमे इसका व्यभिचार पाया जाता है । अर्थात्
शरीरी चेतनके बिना भी अङ्कुरादिकी उत्पत्ति होती है । अतः
अङ्कुरादिके साथ शरीरी चेतनमें अन्वय व्यतिरेक नहीं होनेसे व्यभि-
चार स्पष्ट है । एव अन्वय व्यतिरेकको दृश्यशरीरगत माननेपर
नैयायिकोंका अभीष्ट अशरीरी चेतन कर्ता भी सिद्ध नहीं हा पा रहा है ।
शरीर आदि उपाधिसे रहित दृश्य अदृश्य साधारण चेतन
मात्रवृत्तिरूप द्वितीयपक्ष भी अन्वय व्यतिरेकके लिये नहीं माना जा
सकता है । क्योंकि जैसे घटादिकार्यके अभावकालमें उसे उत्पन्न
करनेवाले कुम्भकारका अभाव माना जाता है वैसे चेतनमात्रके
अभावका निश्चय नहीं किया जा सकता । किन्तु जो दृश्यादृश्य सभी
चेतनके साथ घटादिकार्यका अन्वय व्यतिरेक निश्चय मानता है, उसके
मतानुसार कुम्भकारका अभावनिर्णय होनेपर चेतनमात्रका अभाव माना
१ दृश्यादृश्य इति पाठो युक्तो भाति ।
अनुपलम्भवादः ३९३
न हि कुलालादिदृश्यव्यतिरेके तस्यावश्यं व्यतिरेको, विटपा-
दावपि तथाभावप्रसङ्गात् ।
तर्हि सन्तानान्तरानुमानमपि कथम् ? कुम्भकारव्यतिरेके
दृश्यादृश्यचिन्मात्रव्यतिरेकासिद्धिवत् स्वचित्तव्यतिरेकेऽपि
कम्पं प्रति चिन्मात्रव्यतिरेकासिद्धेरिति चेत्, न, वादान्तर-
त्वात् । यदापि तत्प्रस्तावः, तदापि स्वदेहे स्वपरसन्तानसा-
जाना चाहिये, पर ऐसा नहीं होता । क्योंकि कुम्भकार आदि दृश्यकर्त्ता-
का अभाव होनेपर अदृश्यकर्त्ताका भी अभाव नहीं होता । यदि वैसा
हो तो वृक्षादिमें भी अदृश्यकर्त्ताका अभाव होने लगेगा । अर्थात्
वृक्षादिकी उत्पत्तिकर्त्ताकेरूपमे कुम्भकारका अभाव होनेसे उसके अदृश्य-
कर्त्ता ( ईश्वर ) का भी अभाव नैयायिकको मानना पड़ जायगा । यदि
वैसा माने तो कार्यत्व-हेतु वहींपर सकर्तृकत्वका व्यभिचारी हो जायगा ।
अतः कार्यकारणभावका नियामक जो अन्वय व्यतिरेक है, उसे दृश्या-
दृश्यसाधारणचेतनमात्रमे वर्तमान नहीं मान सकते ।
यहाँ यदि नैयायिक यह प्रश्न करे कि—परचित्तसन्तानोँका अनुमान
बौद्ध कैसे कर सकेगा ? क्योंकि जैसे घटादिकार्यस्थलमे अन्वयके गृहीत
होनेपर भी कुम्भकारका व्यतिरेक होनेपर दृश्यादृश्यचेतन कर्त्तामात्रका
व्यतिरेक सिद्ध नहीं होनेसे व्यतिरेकसहचार नहीं सिद्ध हो पाता, वैसे
ही परशरीरमे होनेवाली चेष्टाके प्रति परचित्तसन्तानकी कारणता कैसे
सिद्ध होगी ? क्योंकि वहाँ अपने चित्तसन्तानका व्यतिरेक सिद्ध होनेपर
भी चिन्मात्रसन्तानका व्यतिरेक नहीं सिद्ध होनेसे चेष्टा और चित्त-
सन्तानमे अन्वय-सहचार होनेपर भी व्यतिरेक-सहचारकी सिद्धि नहीं
हो सकेगी—तो ऐसा प्रश्न नहीं किया जा सकता है । क्योंकि यह
अर्थान्तर हो जायगा । अर्थात् इस प्रश्नके उठानेसे नैयायिकके कार्यत्व
और सकर्तृकत्वके उभयविध सहचारमें कोई लाभ नहीं होता है । फिर
भी यदि इस अर्थान्तरविषयक प्रश्नको नैयायिक उठावे, क्योंकि परचेष्टा-
से परचित्तसन्तानकी अनुमिति करनेके लिये परचेष्टामें तदुत्पत्तिरूप
व्याप्तिका ग्रहण अवश्य अपेक्षित होगा तथा उक्त व्याप्तिग्रहके लिये उन
दोनोंका अन्वय-व्यतिरेकग्रह भी अपेक्षित होगा—तो भी अपने शरीरमें
३९४ आत्मतत्त्वविवेके
धारणचिन्मात्राविनिर्भागवृत्तिदृश्यदेहमात्रस्यैव प्रत्यक्षानुपल-
म्भाभ्यां कम्पं प्रति कारणत्वप्रतीतेः परचित्तस्यापि कारणत्वं
प्रतीयत इति ।
नापि तृतीयः, विपक्षेऽपि बाधकाभावात् । देशकालनिय-
मादीनां स्वकारणापातसन्निधिना कादाचित्केन प्रतिनियत-
शक्तिना कारणेनाचेतनेनाप्युपपत्तेरिति ।
उत्तानोल्लपितमेतत्—विकल्पत्रयस्याप्युपपत्तेः । तथाहि,
ही चेष्टाके प्रति स्वपरसन्तानसाधारण चित्तमात्रसे नियमतः सम्बद्ध
दृश्य देहमात्रकी ही कारणताकी प्रतीति सामान्यतः अन्वय व्यतिरेकग्रह
द्वारा होकर तदनन्तर सामान्यान्तःपाती परचित्तसन्तानमे भी परचेष्टाके
प्रति कारणताकी प्रतीति हो जाती है ।
एव विपक्षमें बाधकरूप तृतीयपक्ष भी नहीं हो सकता । अर्थात्
विपक्षमें बाधक भी व्याप्तिका लक्षण नहीं हो सकता है । क्योंकि विपक्ष
मे भी कोई बाधक नहीं है । अर्थात् क्षित्यादिके चेतनद्वारा निर्मित
नहीं होनेपर भी कार्यत्वमें कोई बाधक नहीं है । क्योंकि “यदि
चेतनकर्त्ता न हो तो यहाँ इस समय क्षिति अङ्कुरआदि कार्य भी नहीं हो
सकेगा” इस विपक्ष बाधकके द्वारा ही चेतनपूर्वकत्व और कार्यत्वमें
व्याप्य व्यापकभावका ग्रहण करना होगा । अर्थात् कार्यमे देशका,
कालका तथा कारणका नियम तबतक नहीं हो सकता जबतक कि कार्यका
कोई स्वतन्त्र बुद्धिमान् कर्त्ता न हो। किन्तु उक्त देश, काल और
कारणका नियम चेतन कर्त्ताको माने बिना ही अपने कारण कलापके
अधीन है उपस्थिति जिसकी, ऐसे कभी कभी होने वाले तथा कार्यके
अनुरूप नियत शक्तिको धारण करनेवाले अचेतन कारणसे भी हो सकता
है । अर्थात् चेतनकर्त्ताके अन्वयसे कार्यका अन्वय तथा उसके व्यतिरेक
से कार्यका व्यतिरेक नहीं होता, किन्तु कारणान्तरके अन्वय व्यतिरेकसे
ही कार्यका अन्वय व्यतिरेक होता है । अतः कार्यत्वहेतुसे चेतनकर्त्ता
(ईश्वर) की सिद्धि नहीं हो सकती है ।
(उत्तरपक्ष) पूर्वोक्त कथन गर्वोक्तिमात्र है। क्योंकि व्याप्तिग्रहके
चत्वारो जगति भावा भवन्ति—विरोधी, बहिर्वृत्तिः, सहवृत्ति-
रन्तर्वृत्तिश्चेति । न च पञ्चमः प्रकारः काङ्क्षितुमपि शक्यते,
विरोधाविरोधयोः साहित्यासाहित्ययोः आधिक्यानाधिक्ययोः
परस्परनिषेधरूपत्वात् । तत्र द्वयमत्र नोपाधित्वेन शङ्कनीयम्,
अकार्यस्यैवाकार्यस्यापि वा सकर्तृकत्वप्रसङ्गात् । न चेद-
मिष्टम्, अकार्यस्य कारणवत्तामात्रेण सहजविरोधे कारक-
विशेषस्य कर्तुरनवकाशात् ।
तीनों ही पक्ष युक्तियुक्त हैं। कारण, जगत्मे चार प्रकारके भाव
(धर्म) होते हैं। १—साधनविरोधी, २—साधनबहिर्वृत्ति (साधन-
व्यापक), ३—साधनसहवृत्ति (साधनसमनियत) तथा ४—साधना-
न्तर्वृत्ति (साधनव्याप्य)। इनसे अतिरिक्त पञ्चम प्रकारकी कामना भी
नहीं की जा सकती है। क्योंकि विरोध अविरोध, साहित्य-असाहित्य
और आधिक्य अनाधिक्य ये परस्परके निषेध स्वरूप हैं। इनमें
आधिक्यानाधिक्यके परस्पर विरोधका प्रदर्शन बहिर्वृत्ति और अन्तर्वृत्ति
पक्षके अभिप्रायसे है तथा शेष दो विरोधी और सहवृत्तिके अभिप्रायसे हैं।
इनमें साधनविरोधी और साधनबहिर्वृत्तिको उपाधिके रूपमे नहीं
माना जा सकता है। क्योंकि साधनका विरोधी यदि उपाधि हो तो
चूँकि प्रकृतमे कार्यत्व साधन (हेतु) है, इसलिये अकार्य ही सकर्तृक
होने लगेगा और कार्यमें अकर्तृकत्वका प्रसङ्ग हो जायगा। यदि साधन-
बहिर्वृत्ति अर्थात् साधनका व्यापक उपाधि हो तो कार्यके साथ साथ
अकार्य भी सकर्तृक होने लगेगा। अर्थात् उपाधि कार्यत्वसमानाधि-
करण होते हुए कार्यत्वाभावसमानाधिकरण भी होगा, तभी वह साधन-
व्यापक होगा। अतः उक्त उपाधिबलसे कार्य भी सकर्तृक होगा और
अकार्य (गगनादि) भी सकर्तृक होने लगेगा। इसमें इष्टापत्ति नहीं
कर सकते। क्योंकि जो अकार्य (नित्य) है, उसे तो कारणमात्रसे
स्वाभाविक विरोध है, अत कारणका ही एकभाग कर्ताका भी अवसर
कैसे आ सकेगा? अर्थात् अकार्यका तो कोई भी कारण नहीं होता, तो
कारणविशेषरूप कर्ता कैसे सिद्ध हो सकेगा? अत अकार्यमे सकर्तृ-
कत्वप्रसङ्गकी इष्टापत्ति नहीं कर सकते।