आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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न द्वितीयः, तस्य जातिविशेषनियतत्वे घटार्थमपि तेषां कदा-
चित् स्वातन्त्र्यप्रसङ्गात् । तन्नियतत्वे स एवोच्यताम् । न च
घटपटशकटकटाहादिगतं दण्डवेमवासीसन्दंशादिगतं वा सामान्य-
विशेषमुपलभामहे । अस्त्यसौ यतः शरीरिकर्तृकत्वानुमानमिति
चेत्, न, घटत्वादेरेव तथाभावात् ।
अस्तु वा संस्थानविशेषः, न च स एवात्र निबन्धनम्,
दूसरा पक्ष भी नहीं हो सकता । अर्थात् यह कहना कि—दण्डादिमें
अदृष्टविशेषका सम्बन्ध होनेके कारण घटादि उत्पन्न करनेमें दण्डादिक
ही किसी चेतनसे अधिष्ठित होते हैं । क्षिति-जलादि उत्पन्न करनेमें
तो उनके कारण परमाणु आदि स्वतन्त्र ही हैं । क्योंकि उनमें उस
अदृष्टविशेषका सम्बन्ध नहीं रहता—ठीक नहीं है । क्योंकि वह
अदृष्टविशेषका उपग्रह यदि जातिविशेषसे नियत न हो तो पृथिवी
आदिके समान ही घटादिके लिये भी कभी दण्डादि स्वतन्त्र हो जायगा ।
अर्थात् वही कारण उसी कार्यमें कभी स्वतन्त्र रहेगा और कभी चेतना-
धिष्ठित होगा । यदि अदृष्टविशेषोपग्रह जातिविशेषसे नियत हो तो
उस जातिविशेषको ही बताओ । अर्थात् ऐसी कोई जाति नहीं है ।
क्योंकि दण्ड आदि एक-एकमें रहनेवाली जाति व्यभिचरित है तथा
घट, पट, शकट ( गाड़ी ), कटाह ( कड़ाही ) आदि कार्योंमें एव दण्ड,
वेमा, वासी (बँसुला), सन्दश (सँड़सी) आदि कारणोंमें समान रूपसे
रहनेवाली किसी विशेषजातिकी उपलब्धि नहीं होती है ।
यदि कहो कि—यह विशेष जाति वही है, जिससे शरीरिकर्तृकत्व
का अनुमान होता है । अर्थात् शरीरिकर्तृकत्वका व्याप्यभूत जाति
अवश्य है—तो यह भी नहीं कह सकते । क्योंकि घटत्वादिक ही
शरीरिकर्तृकत्वका अनुमापक (व्याप्य) जाति है । अभिप्राय यह है
कि सम्पूर्ण कार्योंमें ऐसी कोई जाति नहीं है, जिससे सभी कार्य
शरीरिकर्तृक सिद्ध हो सकें । अत घटत्व पटत्व आदि जातियोंके
आधारपर घट-पटादिकार्य ही शरीरिकर्तृक होंगे और पृथिवी-जलादि
कार्य तो अशरीरिकर्तृक ही होंगे ।
अथवा, अवयवोंका सन्निवेशविशेष ही यह अनुगमक धर्म रहे, जो