आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] अनुपलब्धवादः ३९९
किन्तु कथञ्चिदुपाधिमादाय स व्यवतिष्ठताम् । यद्वा
कार्यत्वमेवेति सन्देहः परिशिष्यते, गत्यन्तराभावादिति सोऽपि
निवार्यते । न तावद् देहव्यतिरेकेऽनित्यज्ञानसम्भवः,
तयो कार्यकारणभावनियमात् । ततो नित्यं भवेत् ततः
सर्वविषयं च । नियतविषयताया अनित्यत्वेन व्यापनात् ।
विषयनियमस्य सामग्रीशक्तिसमवधानाधीनतया नित्यात्
तस्याः स्वव्याप्यमुपादाय निवर्तमानाया अनित्ये विश्रामात् ।
रहित होनेके कारण कार्यत्व-हेतुसे ही क्षित्यादिके प्रति अशरीरी कर्त्ता
सिद्ध हो जाता है ।
अब यहाँपर केवल यही सन्देह बच जाता है कि उक्त अशरीरि-
कर्तृत्व कथञ्चित् अर्थात् शरीराधिकवृत्ति उपाधिके बलको लेकर सिद्ध
होगा या कार्यत्व हेतुको लेकर सिद्ध होगा । इन दोके अलावे अश-
रीरिकर्तृत्वसिद्धिके लिये कोई तीसरी गति नहीं है । अत इस
सन्देहका भी अब निवारण किया जा रहा है ।
जैसे—यदि क्षित्यादिका कर्त्ता शरीररहित है तो उसका ज्ञान अनित्य
नहीं हो सकता है । क्योंकि अनित्यज्ञान और देहमें कार्यकारणभावका
नियम होनेसे देहरूपकारणके अभावमें अनित्यज्ञानका भी अभाव हो
जायगा । इसलिये उसका ज्ञान नित्य होगा और सर्वविषयक भी
होगा । क्योंकि नियतविषयता अनित्यत्वसे व्याप्त है । अर्थात् अनित्य
ज्ञान ही निर्धारित (सीमित) विषयक होता है । नित्यज्ञान तो अनियत-
विषयक होनेसे सर्वविषयक ही होगा । कारण, ज्ञानमे विषयविशेषका
नियमन ज्ञानसामग्रीशक्तिकी उपस्थितिके अधीन है । अत नित्यज्ञानसे
स्वयं निवृत्त होती हुई ज्ञानोत्पादक सामग्रीशक्ति अपने व्याप्यभूत
विषयनियमको भी निवृत्त करती हुई अनित्यज्ञानमें ही व्यवस्थित होती
है । अर्थात् नित्यज्ञानमे सामग्रीकी अधीनता नहीं रहनेसे विषयका
नियम भी नहीं रहता । प्रत्युत अनित्यज्ञान ही सामग्रीके अधीन उत्पन्न
होता है और नियतविषयक होता है । अत नित्यज्ञान सर्वविषयक
ही होगा ।