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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 454, कुल 530 में से

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पृष्ठ 454

कार्ये कारकत्वं तत्प्रयोजकत्वं वेति। एवं तर्हि न प्रतिनियत-
देहाधिष्ठातृसिद्धिः, अङ्कुरादिकारकाधिष्ठात्राऽपि तत्सिद्धेरिति
चेत्, न, वादान्तरत्वात्।
यदापि तत्प्रस्तावः, तदापि न कार्यमात्रेण कारकाधिष्ठान-
मात्रेण वा तदनुमानम्, ततः कर्तृमात्रसिद्धेः। किन्तु हर्षभय-
शोकस्मितादिलिङ्गैस्तानुन्नीय तैर्भोक्तुरनुमानमिति न किञ्चिदेतत्।
तृतीयेऽपीर्ष्याकषाये चक्षुषी निमील्य न्यायानुसारः श्रूयताम्।
इह जगति नास्त्येव तत् कार्यं नाम, यत् कारकचक्रमवधीर्यात्मा-
आवश्यक है। और यह भी नियम नहीं है कि सभी क्षित्यङ्कुरादि
कार्यमें शरीर कारण या प्रयोजक होवे ही।
यदि कहो कि—ऐसा होनेपर अलग अलग देहोंके अधिष्ठाताकी भी
सिद्धि नहीं हो सकेगी। क्योंकि अङ्कुरादि कारकोंके अधिष्ठाता (ईश्वर)
से घट आदिकी सिद्धि हो जायगी। अर्थात् कुम्भकार आदिकी क्या
आवश्यकता है? ईश्वरसे ही घटादिकार्यका निर्वाह हो जायगा—तो
ऐसा नहीं कह सकते हो। क्योंकि तब यह दूसरा विचार प्रस्तुत हो
गया। अर्थात् मेरा ईश्वर तो सिद्ध ही हो गया और उसे ही सिद्ध करने
के लिये मैं प्रवृत्त हूँ। अतः अभी कुम्भकारको कर्त्ता सिद्ध करनेकी
क्या आवश्यकता है?
फिर भी यदि कुलालको भी कर्त्ता सिद्ध करनेका विचार प्रस्तुत करो तो
भी कार्यमात्रसे या कारकोंके अधिष्ठानमात्रसे कुलालनामधारीका अनुमान
नहीं होता है। क्योंकि उससे तो कर्त्तामात्र सिद्ध होता है। किन्तु
हर्ष, भय, शोक, स्मित आदिके सूचक लिङ्गोंसे हर्षादिका अनुमानकर
पुनः उनके आधारके रूपमें पृथक् पृथक् कुलाल आदिके आत्माकी सिद्धि
होती है। अतः यह दूसरा प्रस्ताव भी कुछ नहीं है।
"विपक्षमें बाधकका होना ही व्याप्ति है" इस तृतीयपक्षमें भी
ईर्ष्यासे कलुषित दृष्टिको हटाकर न्यायका अनुमोदन सुनो। इस संसार-
में कोई भी यह कार्य नहीं है, जो कारकचक्रकी अवहेलना कर अपने