आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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नचामादयेदित्यविवादम् । तच्च सर्वं चेतनोपहितमर्यादम् ।
अन्यथा तल्लक्षणव्यवस्थानुपपत्तेः ।
तथाहि, आधेयकारकोपहितमर्यादमधिकरणस्य रूपम्,
आधारत्वात् । अपनेयापगन्तृकारकोपहितं च स्वरूपमपादानस्य,
तदवधित्वात् । करणीभूतकर्मोपहितं च रूपं सम्प्रदानस्य,
तदभिप्रेयत्वात् । करणोपहितं च रूपं कर्मणः, तद्व्याप्यत्वात् ।
कर्तृपहितं च रूपं करणस्य, साक्षात् तद्व्यापारविषयत्वात् ।
समस्तकारकोपहितं च रूपं कर्तुः, तत्प्रयोजकत्वात् ।
ज्ञानचिकीर्षाप्रयत्नाधारत्वव्यवस्थितेश्च न चक्रकेतरेतराश्रय-
स्वरूपको प्राप्त कर सके । यह निर्विवाद है । और उन सभी कार्योंकी
मर्यादा अर्थात् स्वरूपव्यवस्था साक्षात् या परम्परया चेतनसे उपहित है ।
अन्यथा उनके लक्षणकी व्यवस्था ही नहीं हो सकेगी । जैसे—कर्ता
और कर्मरूप आधेयभूत-कारकोंसे उपहित है मर्यादा जिसकी, उसे
अधिकरणकारक कहते हैं । क्योंकि यह आधारभूत है । अर्थात्
"कर्तृकर्मव्यवहितामसाक्षाद् धारयन् क्रियाम् । उपकुर्वन् क्रियासिद्धौ
शास्त्रेऽधिकरणं स्मृतम् ।" इस वचनके अनुसार कर्ता और कर्मके द्वारा
वह क्रियाका आश्रय है । अपनेय ( त्याज्य ) भूत वृक्षादि एव अपगन्तृ-
भूत ( छोड़नेवाले ) सार्थादिकारकोंसे उपहित अपादानकारकका स्वरूप
है । क्योंकि त्यागघटकीभूत विभागका यह अवधि है । अर्थात् यहाँ
भी मन कर्त्ता है और उसकी क्रियाका सम्बन्ध अवधिके रूपमें वर्तमान
वृक्षरूप अपादान कारकसे है । कारणरूपताका प्राप्त हुए कर्मसे उपहित
सम्प्रदानकारकका स्वरूप है । क्योंकि दाताका गौ आदि कर्मभूत द्रव्य-
द्रव्यके द्वारा ही साधु ब्राह्मणादि अभिप्रेत हैं । अर्थात् करणीभूत कर्मसे
उपहित सम्प्रदान होता है । कर्म करणसे उपहित होता है, क्योंकि वह
करणव्यापारका विषय होता है । तथा करणका स्वरूप साक्षात् कर्तासे
उपहित होता है । क्योंकि वह साक्षात् कर्ताके व्यापारका विषय होता
है । एव कर्त्ताका स्वरूप समस्त कारकोंसे उपहित ( निरूपणीय ) होता
है । क्योंकि सम्पूर्ण कारकोका प्रयोजक है ।