आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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इति चेत्, कोऽय विप्रतिपद्यते ? कारकप्रयोक्तुरुभयत्रापि तुल्य-
त्वात् । देही तादृश इति चेत्, कोऽस्यार्थः ? किं देह-(देह-
व्यापारसम्पादन-) द्वारेण सर्वाणि कारकाणि प्रयुङ्क्ते चेतनः ?
आहो देहं प्रयुञ्जान एवेति ? न पूर्वः, देहस्यापि कारकतया
देहान्तरप्रयोज्यतायामनवस्थानात् । न द्वितीयः, विशशकलचा-
लनादौ व्यभिचारात् ।
देहं धारयन्निति चेत्, सोऽयं देहो धार्यः किं कारकतया
तत्कारकान्तरप्रयोगाऽर्थम् ? अथ स्वकर्मोपात्ततामात्रेण ? प्रथमे
उसी ढङ्गके कर्त्ताका व्यतिरेकग्रह भी व्याप्तिज्ञानमें उपयोगी होता है—
तो इसमें किसको विप्रतिपत्ति है ? क्योंकि कारकोंको कार्यमें प्रयुक्त
करनेवाला कर्त्ता दोनों जगह ( अन्वय-व्यतिरेक दोनोंमें ) समान है ।
यदि कहो कि—वह देही कर्ता है, जिसका कार्यके साथ अन्वय
गृहीत है, अत व्याप्तिज्ञानकेलिये उसीका व्यतिरेकग्रह भी उपयोगी
होगा। इसलिये उक्त अन्वय व्यतिरेकद्वारा शरीरी चेतन ही कर्त्ता
सिद्ध होता है अशरीरी नहीं—तो शरीरीको कर्ता माननेका क्या
अभिप्राय है ? क्या देहके द्वारा ही चेतन सभी कारकोंको प्रयुक्त करता
है सीधे नहीं ? अथवा देहको प्रयुक्त करता हुआ ही वह कारकोंको प्रयुक्त
करता है ? इसमें प्रथम पक्ष नहीं हो सकता । क्योंकि जैसे, अन्य कारकों
को प्रयुक्त करनेमें देह द्वारभूत है वैसे देह भी कारक ही है, अत उसे
भी प्रयुक्त करनेके लिये प्रयोजकके रूपमे दूसरी देहकी अपेक्षा होनेसे
अनवस्थादोष हो जायेगा ।
“देहको प्रयुक्त ( सञ्चालित ) करता हुआ ही अन्यकारकों को प्रयुक्त
करता है’ यह द्वितीयपक्ष भी नहीं हो सकता है । क्योंकि कमलनालके
टुकडेको जादूगर अपनी देहको चालित किये बिना ही ध्यानमात्रसे
सञ्चालित कर देता है। अत इस द्वितीयपक्षमें व्यभिचार दोष आ
जाता है ।
यदि कहो कि—देहको धारण करता हुआ कर्ता फलोत्पादनमें सभी
कारकोंको प्रयुक्त करता है इसी अभि[प्राय]... है ...