आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
[पृष्ठ-शीर्षक: बाह्यार्थभङ्गवादः ३०१]
चाध्यक्षमेवात्र प्रमाणम्, सन्दिग्धभेदत्वात् ।
अप्रत्यक्षोपलम्भस्य नार्थदृष्टिः प्रसिध्यति, परेण परवेदने
ऽनवस्था स्यात् । न च क्रिया स्वसजातीयक्रियाकर्मभाव-
मश्नुते छिदावदिति तर्कपुरस्कारान्नैष दोष इति चेन्न—
उपलम्भापरपर्यायाया दृष्टेः सिद्धिर्निष्पत्तिर्वा स्यात् प्रती-
तिर्वा । आद्येऽनागतोपलम्भवेदनप्रसङ्गः, अनुपलब्धस्यानि-
रूपमें भासित होता है—तो उक्त अनुभव ग्राह्यज्ञानसे भिन्नरूप है ? या
ग्राह्यज्ञान ही है ? यह सन्दिग्ध होनेसे ज्ञानका स्वप्रकाशत्व भी सन्दिग्ध
ही है । अर्थात् "घटोऽयम्" इस ज्ञानसे उसका ग्राहक "जानामि"
यह ज्ञान भिन्न है, इसलिये "घटोऽयम्" इत्यादि ज्ञान स्वतोग्राह्य न
सिद्ध होकर परतोग्राह्य ही सिद्ध होता है ।
यदि कहो कि-ज्ञानका प्रत्यक्ष नहीं होनेसे अर्थदृष्टि ही (विषय-
ज्ञान ) असिद्ध हो जायगी और विषयमें प्रवृत्ति-निवृत्ति नहीं हो सकेगी ।
यदि दूसरे ज्ञानके द्वारा ज्ञानकी प्रतीति मानी जाय तो उस दूसरे ज्ञान-
की प्रतीति किसी तीसरे ज्ञानसे और तीसरेकी किसी चौथेसे, इस
प्रकार अनवस्था-दोष होनेसे वह प्रथम भी ज्ञान (घटोऽयम् इत्यादि )
सर्वथा असिद्ध हो जायगा और ज्ञानके बिना विषयकी ओर प्रवृत्ति नहीं
हो सकेगी । एवं कोई भी क्रिया अपनी सजातीय क्रियाका कर्म नहीं
होती है । जैसे, छिदाक्रियाका कर्म छिदा क्रिया नहीं होती किन्तु काष्ठ ही
कर्म होता है । क्योंकि "छिदां छिनत्ति" यह व्यवहार नहीं होता है ।
इस तर्कके आधारपर ज्ञानक्रिया भी किसी अन्य ज्ञानक्रियाका अर्थात्
अनुव्यवसायादिका कर्म नहीं हो सकेगी । इसलिये "जानामि" यह अनु-
भव ग्राह्यज्ञानसे अभिन्न ही है, ऐसा मानना चाहिये । अतः पूर्वमे जो
"जानामि" अनुभव तथा ग्राह्यज्ञानमें भेदको सन्दिग्ध बताकर दोष दिया
गया था, अर्थात् ज्ञानको परतोग्राह्य सिद्ध किया था, यह दोष नहीं है—
तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि अर्थदृष्टिका मानी है—अर्थका
उपलम्भ । अतः अर्थदृष्टिकी सिद्धिसे आपका क्या अभिप्राय है ?
अर्थोपलम्भकी उत्पत्ति या अर्थोपलम्भकी प्रतीति । प्रथम अभिप्राय
३०२ आत्मतत्त्वविवेके
ष्पत्तेः । न चाविद्यमानेनाविद्यमानस्योपलम्भ¹ इति स्वसंवि-
त्तावसंवित्तिरेवेति ।
द्वितीये तु सिद्धसाधनम् । न ह्यनुपलब्ध उपलब्धो
भवति । न चैवं सत्यर्थोऽपि नोपलभ्येत । न ह्युपलम्भप्रतीति-
रर्थवेदनमपि तूपलम्भनिष्पत्तिः । उपलम्भादृष्टावुपलम्भनिष्प-
लेनेपर जो उपलम्भ अभी अनागत हे (अभी उत्पन्न नहीं हुआ है),
उसका भी प्रत्यक्ष होने लगेगा । क्योंकि आपके अभिप्रायानुसार उप-
लम्भका प्रत्यक्ष हुए बिना उपलम्भकी उत्पत्ति ही नहीं हो सकती है।
अर्थात् विषयज्ञानकी उत्पत्तिके लिये पूर्वमें विषयज्ञानका प्रत्यक्ष होना
आवश्यक है, जो सर्वथा असंगत बात है । क्योंकि जो ज्ञान अभी पैदा
ही नहीं हुआ है, उसका पहले ही प्रत्यक्ष कैसे हो सकेगा ? कारण,
जिस ज्ञानका प्रत्यक्ष करना है, वह ज्ञान अभी अविद्यमान है तथा
स्वतोग्राह्यवादीके मतानुसार उस अविद्यमान ज्ञानका ग्राहक भी स्वयं
वही है । अतः अविद्यमान (स्वयं) से अविद्यमान (स्वयं) का ज्ञान
नहीं हो सकता है । इसलिए स्वतोग्राह्य माननेमे सर्वथा अग्राह्य हो जाने-
की स्थिति आ जाती है ।
द्वितीय अभिप्रायमें तो सिद्धसाधनदोष हो जायगा । अर्थात् अर्थ-
दृष्टिकी सिद्धिसे आपका अभिप्राय अर्थोपलम्भकी प्रतीतिसे हो तो
“अप्रत्यक्षोपलम्भस्य” इस कथनका यह अर्थ होगा कि - जब तक उप-
लम्भका प्रत्यक्ष (प्रतीति) नहीं होगा, तब तक अर्थोपलम्भकी प्रतीति
नहीं होगी—तो इसे मैं भी मानता ही हूँ । इस प्रकार सिद्धसाधनदोष
आ जाता है । क्योंकि अनुपलब्ध को हम भी उपलब्ध नहीं बताते हैं।
अर्थात् प्रतीतिकी दशामें ही हम भी प्रतीति मानते हैं, न कि अप्रतीति-
की दशा में । यहाँ यह नहीं कह सकते कि—अर्थज्ञानका ज्ञान हुए
बिना अर्थका भी ज्ञान नहीं हो सकेगा—क्योंकि ज्ञानका ज्ञान होना
अर्थज्ञान नहीं है, किन्तु ज्ञानकी निष्पत्ति (उत्पत्ति) होना अर्थज्ञान है ।
यदि कहो कि—ज्ञानका ज्ञान हुए बिना ज्ञानोत्पत्ति हुई है, यह
व्यवहार ही कैसे होगा ?—तो ज्ञानकी उत्पत्तिका जो व्यवहार होना है,
१. वेदनमिति अ. ...
वाह्यार्थभङ्गवादः २०३
स्तिरित्येव व्यवहारः कुत इति चेत्, मा भूत्, न ह्यव्यवहारा-
देव निष्पन्नस्य वस्तुनो निवृत्तिः । तथा च तन्निबन्धनोऽर्थ-
व्यवहारो दुर्वार एव१ ।
न चानवस्था, अवश्यवेद्यत्वानभ्युपगमात्, निश्चयवत् ।
अन्यथा त्वनिश्चितनिश्चयस्यार्थनिश्चयोऽपि न सिध्येत् । न
यह भले ही मत हो, उससे कोई हानि नहीं है। क्योंकि केवल अव्यव-
हारके कारण उत्पन्न वस्तुकी निवृत्ति नहीं हो जाती है। अर्थात् ज्ञानका
ज्ञान नहीं होनेसे उस ज्ञानकी उत्पत्तिमे कोई रुकावट नहीं आती तथा
अर्थज्ञान उत्पन्न होनेके बाद होनेवाले अर्थसम्बन्धी ग्रहण या परित्यागरूप
व्यवहारमें भी कोई रुकावट नहीं हो सकती है। अर्थात् अर्थसम्बन्धी
व्यवहारके लिए भी अर्थज्ञान ही अपेक्षित है न कि अर्थज्ञानकी प्रतीति ।
यदि ज्ञात ज्ञान ही अर्थसम्बन्धी व्यवहारके योग्य माना जाय तो भी
ईश्वरद्वारा ज्ञात होनेसे ही काम चल जायगा, हम लोगोंके द्वारा ज्ञानका
ज्ञात होना व्यवहारके लिये आवश्यक नहीं है।
ज्ञानको परतो ग्राह्य माननेमे जो अनवस्था दोष दिये हो, वह भी
दोष नहीं हो सकता है। क्योंकि "सभी ज्ञान अवश्य वेद्य ही हैं"
यह मैं नहीं मानता।२ एवं ज्ञानका ज्ञान हुए बिना यदि अर्थका ज्ञान
भी असिद्ध हो जाय तो निश्चयका निश्चय नहीं होनेसे अर्थका भी
निश्चय नहीं हो सकेगा। क्योंकि स्वप्रकाशवादीके मतमे भी निश्चया-
त्मक ज्ञान अपने निश्चयत्वका निश्चय नहीं करता है। अर्थात् स्थाणु-
पुरुषादिके सन्देहस्थलमे स्थाणुत्व सूचक विशेषका दर्शन होनेपर जो
निश्चयात्मक ज्ञान होता है, वह अपने निश्चयत्वका निश्चय नहीं कराता
१. इति इति २ पु०, पा०
२. यद्यपि स्वसंयुक्तसमवायरूप-प्रत्यासत्तिके रहनेसे ज्ञानके अवश्य वेद्य होनेमे
कोई बाधा नहीं है, फिर भी सुखादि-सामग्रीके बलवती होनेसे सदा
ज्ञानका ज्ञान नहीं हो सकेगा । यदि हो तो सुखादिका अनुभव ही
कभी न हो पायेगा । एव, जैसे रूपादि विशेषगुण उद्भूत और अनुद्भूत
दोनो होते हैं, वैसे ही ज्ञान भी विशेषगुण होनेके कारण उद्भूत (ज्ञात)
और अनुद्भूत (अज्ञात) दोनों ही होगा ।
३०४ आत्मतत्त्वविवेके
चासौ स्वात्मन्यपि निश्चय इति वधूमापमापनवृत्तान्त-
मनुहरति ।
छिदादिवदिति तु दृष्टान्तमात्रेण नास्मदवधानम् । "ज्ञानं
न ज्ञानान्तरकर्म, सजातीयक्रियात्वात्, या यज्जातीया क्रिया
नासौ तत्क्रियाकर्म, यथा छिदा छिदान्तरस्ये"ति तु न्याय-
विप्लवः । छिदावत् सर्वथा सजातीयाकर्मत्वे साध्ये बाधित-
विषयत्वात्, पुरुषान्तरज्ञानस्य च पुरुषान्तरज्ञानवेद्यत्वात्,
है, यह बात स्वप्रकाशवादी भी मानता है । ऐसी परिस्थितिमें यहाँ
ज्ञानके दृष्टान्तसे अर्थनिश्चय भी नहीं हो सकेगा। यह बात स्वतः
ग्राह्यत्ववादीको नहीं सूझती है । इस प्रकार यह उड़द मापनेवाली वधूके
वृत्तान्तके तुल्य है । अर्थात् जैसे उड़द तोलनेमें व्यग्र कोई वधू अपने
गुह्याङ्गको ढकने का ख्याल न रखे वैसे तुम भी ज्ञानको स्वप्रकाश सिद्ध
करनेकी व्यग्रतामे अपने ऊपर आनेवाले दोषाके समाधानका भी ख्याल
नहीं रखते हो।
जो तो छिदा क्रियाका दृष्टान्त दिये हो, उस दृष्टान्तमात्रसे हमें
सन्तोष नहीं हो सकता है । क्योंकि बिना हेतु दिये केवल दृष्टान्तमात्रसे
कुछ सिद्ध नहीं होता।
यदि कहो कि-ज्ञान अन्यज्ञानका कर्म नहीं हो सकता है, उसी
जातिकी क्रिया होनेके कारण, जो जिस जातिकी क्रिया होती वह उस
क्रियाका कर्म नहीं होती, जैसे छिदाक्रिया अन्य छिदाक्रियाका कर्म नहीं
होती है-तो यह न्याय नहीं है, न्यायाभास है। क्योंकि छिदाक्रियाके
दृष्टान्तसे ज्ञानमे भी सर्वथा सजातीय (ज्ञान) क्रियाका अकर्मत्व सिद्ध
करनेमे बाध नामक हेत्वाभास हो जाता है। क्योंकि अन्य पुरुषका
ज्ञान अन्यपुरुषीय ज्ञानका विषय होता है तथा अपना ज्ञान भी अपने
ही स्मरणात्मक आदि ज्ञानका विषय होता है। अर्थात् पूर्वमे उत्पन्न
अपने ही ज्ञानका बादमें अपनेको ही स्मरण आदि होता है। अत
ज्ञानके परतोग्राह्य होनेमें कोई अनुपपत्ति नहीं है।
यदि ज्ञानमे स्वकर्मत्व (स्वविषयत्व) सिद्ध करो तो छिदा आदि
सभी दृष्टान्तभूत क्रियायें स्वविषयत्वरूप साध्यसे बाधित हैं - - -
बाह्यार्थभङ्गवादः ३०५
स्वयमपि स्मृत्यादिगोचरत्वाच्च। स्वकर्मत्वे साध्ये दृष्टान्तस्य
साध्यविकलतया हेतोर्विरुद्धत्वादिति।
नापि स्वग्राहकेण, विवेचनानुपपत्तेः। न हि प्रमाण-
ग्रहणं यथार्थत्वैकनियतम्, अप्रमाणेऽपि प्रमाणाभिमानात्।
अन्यथा विपर्ययज्ञानादप्रवृत्तिप्रसङ्गाच्च।
ततो यदि प्रामाण्यमापाततः स्फुरेदपि, तथापि नियम-
हेतोरभावात् प्रमाणमेवेदमिति निश्चयः कुतः ? स च मृग्यते,
इसलिये वहाँका हेतु विरुद्धनामक हेत्वाभास हो जायगा। अर्थात् यह
ज्ञान उसी ज्ञानका विषय है, क्रिया होनेसे, छिदाके समान। इस
अनुमानमें दिया गया 'क्रियात्व' हेतु साध्यके विरुद्ध है। क्योंकि कोई
भी क्रिया अपना ही कर्म (विषय) नहीं होती है। जैसे, अपने ही
कन्धेपर कोई नहीं चढ़ सकता। इसलिये ज्ञान स्वप्रकाश (स्वतोग्राह्य)
नहीं हो सकता है।
यदि कहो कि—ज्ञानका ग्राहक जो अनुव्यवसाय या ज्ञाततारूप
लिङ्ग है, उसीके द्वारा ज्ञानगत प्रामाण्यका भी ग्रहण होता है—तो यह भी
नहीं कह सकते। क्योंकि अनुव्यवसायके द्वारा अथवा ज्ञाततारूप लिङ्ग
के द्वारा ज्ञानका ग्रहण होनेपर भी "वह ज्ञान प्रमाण ही है" ऐसा
निश्चयात्मक विवेचन नहीं हो सकता है। यदि कहो कि—अनुव्यवसाय
या ज्ञाततारूप हेतुसे उत्पन्न होनेवाली अनुमिति ही ज्ञानको प्रमाके रूपमें
भासित करायेगी—तो यह कोई नियम नहीं है कि जिस ज्ञानको हम प्रमा-
रूपमे समझेंगे, वह वस्तुतः यथार्थ ही हो, क्योंकि अप्रमामे भी प्रमाका
अभिमान हो जाया करता है। यदि ऐसा न होता तो भ्रमात्मक ज्ञानसे
कभी भी प्रवृत्ति नहीं होती। अर्थात् भ्रमात्मक ज्ञानमें जब प्रमात्वका
निश्चय हो जाता है तब वहाँ प्रवृत्ति देखी जाती है। यदि अप्रमामें
प्रमात्वका अभिमान असंभव होता तो उक्त भ्रमस्थलमें प्रवृत्ति होती ही
नहीं। अतः ज्ञानग्राहक सामग्रीके द्वारा प्रामाण्यका निश्चय नहीं हो
सकता है।
यदि ज्ञानग्राहक सामग्रीसे प्रामाण्यका आपाततः स्फुरण हो भी जाय
३०६ आत्मतत्त्वविवेके
पारलौकिकव्यवहाराङ्गत्वात्¹ । शङ्कानिवर्तनेन तदप्रत्यूहं
निश्चितमेवेति चेत्, तन्निवृत्तिरेव कुतः ? प्रमाणान्तरादिति
चेत्, तदपि निश्चयफलमन्यथा वेति । अन्यथात्वे न शङ्कावि-
च्छेदो निश्चयसाध्यत्वात्तस्य । निश्चयफलत्वे तु यो मृग्यते
नासौ स्वत इति ।
स्फुरणमात्रमपि तावदस्तु स्वत इति चेत्, किं तेन ?
न चैतदपि, अननुसंहितोपाधेरुपहितप्रत्ययायोगात् । न च
तो भी प्रामाण्य नियामक हेतुके बिना "यह प्रमात्मक ही है" यह निश्चय
कैसे होगा ? और प्रामाण्य निश्चयकी ही अपेक्षा है। क्योंकि प्रामाण्य-
निश्चय ही पारलौकिक व्यवहारोंका अङ्ग है। अर्थात् लौकिक प्रवृत्ति
जैसे तैसे (प्रामाण्य सन्देहमें भी) भले ही हो जाय, किन्तु पारलौकिक
प्रवृत्ति, जो बहुत व्यय और आयाससे साध्य है, प्रामाण्य निश्चयके बिना
कैसे हो सकेगी ?
यदि कहो कि-ज्ञानग्राहक सामग्रीसे ही प्रामाण्यका ज्ञान होगा, तथा
जिस किसी प्रकारसे अप्रामाण्यशङ्काकी भी निवृत्ति हो जानेसे निर्विघ्न-
रूपसे प्रामाण्य भी निश्चित ही हो जायगा-तो बताओ, अप्रामाण्य शङ्का
की निवृत्ति ही कैसे होगी ? यदि कहो-दूसरे प्रमाणसे-तो वह शङ्का-
निवर्तक प्रमाणान्तर प्रामाण्यका निश्चय करायेगा या नहीं ? यदि नहीं
कराये तो शङ्काकी निवृत्ति भी नहीं हो सकेगी। क्योंकि प्रामाण्य-
निश्चय होनेपर ही अप्रामाण्य शङ्का निवृत्त हो सकती है। यदि तो
वह प्रमाणान्तर ज्ञान प्रामाण्यका निश्चय कराये तो स्पष्ट ही है कि
जिस प्रामाण्य निश्चयकी अपेक्षा है, वह स्वतः (ज्ञानग्राहक सामग्री,
अनुव्यवसाय या ज्ञाततालिङ्गक अनुमानसे) न होकर प्रमाणान्तरसे
होता है।
यदि कहो कि-प्रामाण्यका निश्चय न हो सकनेपर भी प्रामाण्यका
स्फुरणमात्र भी स्वतः हुआ, उतनेसे ही प्रामाण्यमें स्वतःग्राह्यत्व सिद्ध हो
गया-तो उस प्रामाण्य स्फुरणसे क्या लाभ है ? जब कि उससे निष्कम्प
प्रवृत्ति नहीं होती है। साथ ही यह स्फुरण भी नहीं हो सकता है।
याथार्थ्यभङ्गवाद २०७
विषयोपधानमात्रं प्रामाण्यम्, तदाभाससाधारण्यात्, अपि
स्त्वनुभवस्य सतो भूतार्थानुसन्धानम् । न चार्थानुसन्धानेऽपि
तस्य भूतत्वमनुसन्धीयते, आरोपितत्वव्यावर्तकविशेषणाननु-
सन्धानात् , अननुसंहितस्य चारोपसाधारण्यात् ।
क्वचिद् विशेषोऽप्यनुसन्धीयत इति चेत् , न क्वापि प्राथ-
मिकेन । अन्यथाऽनभ्यासशायां तत्रापि संशयो न स्यात् ।
अभ्यासदशोल्पन्ने तु अनुसन्धानं व्याप्तिग्रहजनितसंस्कार-
क्योंकि ज्ञानके प्रमात्मक होनेमें विशेष्यावृत्त्यप्रकारकत्व ( विशेष्यमे
नहीं रहने वाला जो धर्म, उसका ज्ञानमें प्रकार नहीं होना ) उपाधि है ।
अतः उस उपाधिका भान हुए बिना प्रामाण्योपहित ज्ञानका भान नहीं
हो सकता है। केवल विषयका भान हो जाना ही प्रामाण्य नहीं है,
क्योंकि विषयके अभावमे भी विषयका भान हो जाया करता है।
किन्तु अनुभव होते हुए यथार्थभान होना ही प्रामाण्य है। केवल अर्थ
का (विषयका) भान होनेपर उसके वास्तविकत्वका भान तब तक
नहीं होता है, जब तक कि उसकी अवास्तविकताको दूर करने वाले
विशेषणों ( विशेष्यावृत्त्यप्रकारकत्व आदि ) का भान नहीं हो जाता ।
विशेषणका भान हुए बिना तो वह आरोपात्मक मिथ्याज्ञानके तुल्य है ।
यदि कहो कि - कहीं करतलादिज्ञानमे विशेष ( वास्तविकत्व ) भी
भासित ही हो जाता है - तो कहीं भी प्राथमिक ज्ञानके द्वारा अर्थात्
अनुव्यवसाय या ज्ञातता लिङ्गक अनुमानके द्वारा नहीं भासित होता ।
अन्यथा (प्राथमिकज्ञानसे ही यदि प्रामाण्यका भान हो तो ) अनभ्यास
दशामें ( पहले पहल ) उत्पन्न ज्ञानमें भी प्रामाण्यका संशय नहीं होना
चाहिये । अर्थात् जिस व्यक्तिको अग्निका परिचय बिल्कुल न है,
उसको किसीके कहनेपर जब अग्निज्ञान होता है, तब उसे उस ज्ञानके
प्रामाण्यका भी स्वयं ज्ञान हो जाना चाहिये । तथा उसे “यह ज्ञान
प्रमा है या अप्रमा है” ऐसा संशय नहीं होना चाहिये ।
यदि कहो कि - अभ्यासदशामें उत्पन्न जो करतलादि उसमे तो
प्रामाण्यका स्वतः ही निश्चय हो जाता है न कि प्रामाण्यका संशय होता
३०८ आत्मतत्त्वविवेके
समुद्बुद्धस्मरणबलेन भवन् प्रमाणान्तरशरीर एव प्रविशतीति
परत एवावशिष्यते ।
तत्राप्यनवस्थेति चेत्, न तावदसौ दृष्टान्तद्वारिका,
प्रागेव तन्निश्चयात् । फलद्वारिका तु स्यादपि, यदि प्रामाण्य-
है—तो यहाँ भी बार-बार सहचारदर्शनसे उत्पन्न जो व्याप्तिज्ञान, उससे
उत्पन्न जो संस्कार, उसके द्वारा होने वाले व्याप्तिस्मरणके बलसे ही
प्रामाण्यका निश्चय होता है अर्थात् यहाँ भी तज्जातीयत्व-हेतुसे ही
प्रामाण्यका ग्रहण होता है । जैसे, अयं पृथिवीत्वेनानुभवः, पृथिवीत्ववति
पृथिवीत्वप्रकारक, गन्धवद्विशेष्यकपृथिवीत्वप्रकारकनिश्चयजातीयतत्-
त्वात्, पूर्वपृथिवीत्वप्रकारकनिश्चयवत्, इत्यादि । क्योंकि तद्वति
प्रकारक अनुभव ही तो प्रमा है । अतः यह भी अनुमानप्रमाणमें ही
अन्तर्भूत हो जाता है । इससे यही निष्कर्ष आता है कि प्रामाण्य
परतोग्राह्य ही है, स्वतोग्राह्य नहीं ।
यदि कहो कि- तज्जातीयत्वरूप लिङ्गसे प्रामाण्यका ज्ञान (अनुमान)
करनेमें भी तो अनवस्थानामक दोष आ जाता है—तो क्या यहाँ दृष्टान्तके
द्वारा कारणमुखी अनवस्था होगी ? या अनुमितिरूप फलके द्वारा फल-
मुखी ? यहाँ दृष्टान्तको लेकर अनवस्था नहीं हो सकती है । क्योंकि
दृष्टान्तमे तो प्रामाण्यका निश्चय वर्तमान अनुमितिसे पूर्व ही हो चुका
है । तभी तो वह दृष्टान्त बना है । अतः पक्षभूत ज्ञानमें प्रमाण्यकी
अनुमिति करनेके समय दृष्टान्तभूत ज्ञानमें प्रामाण्यानुमितिकी अपेक्षा
ही नहीं रहती है कि उसमें भी प्रामाण्यानुमिति करनी पड़े और उसके
लिये जो दूसरा दृष्टान्त दिया जाय, उसमे भी प्रामाण्यानुमिति करनी
पड़े । तथा ऐसे ही अनवस्थितरूपसे जो जो दृष्टान्त बनता जाय, उन
सभीमें प्रामाण्यानुमिति करनी पड़ जाय । अर्थात् दृष्टान्तभूत ज्ञानमें
पूर्वसे ही प्रामाण्यज्ञान हुए रहनेसे दृष्टान्तकृत अनवस्था नहीं हो
सकती है ।
अनुमितिरूप फलको लेकर तो तभी अनवस्था होती यदि जिस अनु-
मितिसे वर्तमान ज्ञानमें प्रामाण्यका निश्चय करते हैं, उस अनुमितिमें भी
प्रामाण्यका निश्चय करना आवश्यक माना जाय । अर्थात् अनुमिति-
मवश्यनिश्चेयमभ्युपेयते । अज्ञातप्रामाण्येन कथं परप्रामाण्य-
वेदनमिति चेत्, यथा विषयसंवेदनम् ।
अस्तु तर्हि धर्मिलिङ्गद्वारिका, ताभ्यामनिश्चिताभ्याम-
ननुमानात्, तन्निश्चयस्य च प्रामाण्यनिश्चयमन्तरेणानुपपत्तेः,
द्वारा वर्तमान ज्ञानमें प्रामाण्य निश्चय कर लेनेपर पुनः उस अनुमितिमे
प्रामाण्य-निश्चय करने के लिये अनुमानान्तर करना कोई आवश्यक
नहीं है ।
यदि कहो कि—उस अनुमितिमे प्रामाण्यका ज्ञान हुए बिना उसके
द्वारा वर्तमान ज्ञानमे प्रामाण्यका कैसे निश्चय हो सकता है ? क्योंकि
जो स्वयं अप्रमाण है वह दूसरेको प्रमाण कैसे सिद्ध कर सकता है ? तो
इसका उत्तर यह है कि जिस प्रकार 'अय घट " यह व्यवसायात्मक
ज्ञान अपना प्रामाण्य निश्चय हुए बिना ही घटवस्तुका निश्चय करा देता
है, वैसे ही अनुमिति भी अपना प्रामाण्य निश्चय हुए बिना ही पक्षभूत
ज्ञानमे प्रामाण्यका निश्चय करा देती है ।
यदि कहो कि—दृष्टान्तको या फलको लेकर भले ही अनवस्था न हो
किन्तु धर्मी और लिङ्ग (हेतु) कोलेकर तो अनवस्था होगी ही ।
क्योंकि धर्मी (पक्ष) का तथा लिङ्ग (हेतु) का निश्चय हुए बिना
प्रामाण्यानुमिति नहीं हो सकती है । एवं धर्मी और लिङ्गका निश्चय
तभी होगा जबकि धर्मिविषयक और लिङ्गविषयक ज्ञानमे भी प्रामाण्य
का निश्चय हो जाय । और वह प्रामाण्य निश्चय भी न्यायमतानुसार
स्वतः न होकर अनुमानान्तरसे होगा । तथा उस अनुमानान्तरमे भी
जो पक्ष और हेतु होगा, उसके निश्चयके लिये उसके ज्ञानमें भी
प्रामाण्यका निश्चय उसे अपेक्षित होगा तथा उस प्रामाण्यके निश्चयार्थ
भी नैयायिकको पुनः अनुमानान्तरकी शरण लेनी पडेगी । इस प्रकार
पक्ष और हेतुके निश्चयको ही लेकर अनवस्थादोष पहुँच जाता है—
यह आक्षेप नहीं दे सकते । क्योंकि प्रामाण्यानुमितिमे हर जगह ज्ञान ही
पक्ष और हेतु रहता है तथा उस ज्ञानका ज्ञान अनुव्यवसायरूप है और
अनुव्यवसायमें प्रामाण्य-अप्रामाण्यका द्वैत होता ही नहीं है । अर्थात्
अनुव्यवसाय सदा प्रमाण ही होता है । अत उस अनुव्यवसायमें
३१० आत्मतत्त्वविवेके
न, द्वैताभावात् । यत्र हि लिङ्गज्ञाने धर्मिज्ञाने वा तथ्यातथ्य-
भावेन द्वैतमुपलभ्यते तत्र तथात्वानिश्चये लिङ्गमाभासशङ्का-
क्रान्ततया न निश्चीयते । यत्र तु तज्ज्ञानं तदेकनियतं तत्र
तावतैव लिङ्गनिश्चयः, तदाभासशङ्कानुत्थानात् । एककोटि-
नियतो ह्यनुभवो निश्चयः । ज्ञानतद्धर्मग्राहिणि च ज्ञाने न
द्वैतमिति व्यवस्थितिरेव । प्रामाण्यनिश्चयस्तु तस्यापि परत
एवेति न्यायसंप्रदायः । इत एव विशेषात् तादृशस्य स्वतः
एवेति तात्पर्याचार्याः ।
अप्रामाण्यकी आशङ्का ही नहीं रहती है। इसीलिये उसमें न प्रामाण्य-
ग्रहकी अपेक्षा होती है और न उसके लिये अनुमानान्तर करनेकी
ही आवश्यकता पड़ती है। अतः अनवस्थादोष नहीं है।
जहाँपर लिङ्गज्ञान या धर्मिज्ञानमें प्रामाण्य-अप्रामाण्यका द्वैत होता
है, जैसे धूमादिज्ञानसे अग्निविषयक अनुमानस्थलमें, वहीं पर लिङ्गादि-
ज्ञानमें प्रामाण्यका निश्चय नहीं रहने पर अप्रामाण्यकी शङ्कासे ग्रस्त
होनेके कारण वहां लिङ्गका निश्चय नहीं हो पाता है। अतः वहां
लिङ्गादिके निश्चयार्थ प्रामाण्यानुमिति करनी पड़ेगी। किन्तु जहांपर
लिङ्गादिज्ञान नियतरूपसे प्रमाण ही रहता है, जैसे, ज्ञानपक्षक प्रामाण्या-
नुमिति स्थलमें ज्ञानविषयकज्ञानरूप अनुव्यवसाय सदा प्रमाण ही रहत
है, वहाँपर उस अनुव्यवसायसे ही लिङ्गका निश्चय हो जाता है,
क्योंकि वहाँपर अप्रामाण्यकी शङ्का ही नहीं उठती है। कारण, एक
कोटिसे नियत जो अनुभव, वही तो निश्चय है। ज्ञानको और उसके
धर्म (प्रत्यक्षत्व, अनुमितित्व, शाब्दत्व, स्मृतित्व आदि) को ग्रहण करने
वाले अनुव्यवसायात्मक ज्ञान (प्रत्यक्षयामि, अनुमिनोमि, शाब्दयामि,
स्मरामि इत्यादि) में प्रामाण्य-अप्रामाण्यरूप दो कोटियां नहीं होती हैं,
यह व्यवस्थिति ही है। यहाँ भी यदि हठात् प्रामाण्यका निश्चय करना
चाहें तो परतः ही अर्थात् अनुमानके द्वारा ही होगा न कि स्वतः, यह
न्यायका सिद्धान्त है। न्यायवार्तिकतात्पर्यटीकाकार श्रीवाचस्पतिमिश्र-
ने जो अनुमानको स्वतः प्रमाण कहा है, उसका भी यही आशय है कि
बाह्यार्थभङ्गवादः ३१९
स्यान्मतम्, एतदेव तु कथं निश्चेयं यदेवम्भूतमेक-
कोटिनियतमेव, यावता तत्राप्यनवस्थितिरिति चेन्न, व्याप्ति
ज्ञानस्य साक्षादात्मन्यप्रवृत्तावपि सर्वोपसंहारेण यमुपाधिमा-
दाय प्रवृत्तिस्तद्धर्मवत्त्वात्। तज्जातीयत्वं हि तत्रोपाधिस्तच्च
तत्राप्यविशिष्टमनुव्यवसायत्वात्।
जहाँ अप्रामाण्यकी आशङ्का ही न रहे, वहा प्रामाण्यानुमितिकी आव-
श्यकता नहीं है।
यदि कहो कि उक्त सिद्धान्त रहे, किन्तु यही कैसे निश्चय है कि
अनुव्यवसायमें एकमात्र प्रमाणकोटि ही नियत रूपसे है, उसमे अप्रा-
माण्य कभी नहीं रहता। इसलिए अनुव्यवसाय सदा प्रमाण ही होता
है, इस व्याप्तिकी सिद्धि भी किसी अन्य अनुमानसे ही करनी होगी।
तथा उस अनुमानके लिए पुन व्याप्तिज्ञान लिङ्गज्ञानादिकी आवश्यकता
पड़ेगी। एव उस व्याप्तिज्ञान आदिमे भी बिना प्रामाण्यानुमिति किये
काम नहीं चल सकता, इस प्रकार पुन अनवस्थादोष आ ही जाता है—
तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि व्याप्तिज्ञानकी साक्षात् (सीधे)
अपने बारेमे प्रवृत्ति नहीं होनेपर भी सबको संगृहीत करनेवाले जिस
धर्मको लेकर प्रवृत्ति होती है, वह धर्म स्वय उस व्याप्तिज्ञानमें भी है।
तज्जातीयत्व ही तो यहाँ उपाधि (धर्म) है और वह उसमे भी समान
ही है। क्योंकि अन्य अनुव्यवसायोम रहनेवाला अनुव्यवसायत्व धर्म
उस व्याप्तिज्ञानमे भी है। इस प्रकार अन्य अनुव्यवसायोमे नियतरूपसे
एकमात्र प्रामाण्यकोटिको सिद्ध कराता हुआ अनुव्यवसायत्व धर्म अनु-
व्यवसाय होनेने नाते अपनेमे भी वह नियम लागू कर लेगा। अर्थात्
जो जो अनुव्यवसाय होता है वह सब प्रमाण ही होता है, ऐसी व्याप्ति
अनुव्यवसायत्वावच्छेदेन१ गृहीत है। तथा वह अनुव्यवसायत्व जाति
स्वय इस व्याप्तिज्ञानमें भी है, अत अन्य अनुव्यवसायोँमें प्रामाण्यानुमिति
कराता हुआ अपनेमें भी प्रामाण्यग्रह करा ही लेगा, उसके लिए अति-
रिक्त अनुमितिकी आवश्यकता नहीं है। अत अनवस्थादोष नहीं आता।
१. अनुव्यवसायमात्र म ।
३१२ आत्मतत्त्वविवेके
न च सामान्यतो नियमनिश्चये तदालिङ्गिते विशेषे द्वैत-
शङ्कावकाशः । यथा वाचकः शब्द इति स्वात्मनो वाचकत्वं
न साक्षाद् विधत्ते वृत्तिविरोधात्, तथापि सामान्येन यमु-
पाधिमधिकृत्य प्रवृत्तः शब्दस्तद्वशात् शब्दशब्दो वाचको न
वेति शङ्कया न परिभूयते, नाप्यनवस्थेत्येवमिहापीति ।
तर्काश्चात्र भवन्ति—यदि धर्मिज्ञानं व्यभिचरेत्, निरा-
लम्बनमसद्धालम्बनं वा भवेत्, निषिद्धं च तत् । यद्यनुव्यव-
सायो व्यभिचरेत्, तदार्थककर्मकोऽपि न स्यात्, ज्ञानेतरस्यार्थ-
सामान्यरूपसे प्रामाण्यकी व्याप्तिका निश्चय हो जानेपर सामान्या-
न्तर्गत विशेषमे प्रामाण्य अप्रामाण्यरूप द्वैतकी शङ्काका अवसर ही नहीं
रहता है। जैसे, 'शब्द वाचक होता है' यह नियम अपने ('शब्द' इस
शब्दके) वाचकत्वके बारेमे साक्षात् विधान नहीं करता है, क्योंकि
अपनेमे अपनी वृत्ति (स्थिति) का होना विरुद्ध है। फिर भी सामान्य-
रूपसे जिस उपाधिको (शब्दत्वको) लेकर घटपटादिशब्द वाचक
होता है, वही शब्दत्वरूप उपाधि स्वयं शब्दशब्दमे भी है, इसलिये
"शब्दशब्द वाचक है या नहीं" यह शङ्का नहीं उठती और न अन-
वस्था ही आती है। वैसे ही सभी अनुव्यवसाय प्रमाण ही होता है, इस
नियममें भी अप्रामाण्य की शङ्का नहीं होगी तथा इस नियमकी सिद्धिके
लिये अलग व्याप्तिका और अनुमितिकी अपेक्षा नहीं होनेसे अनवस्था
भी नहीं होगी।
यहां उक्त व्याप्तियोंके पोषक तर्क भी हैं। अर्थात् धर्मिज्ञान
(ज्ञानरूप पक्षका ज्ञान) प्रमाण ही है, अनुव्यवसायात्मक ज्ञान प्रमाण
ही है तथा सजातीयज्ञान भी प्रमाण ही है, इन व्याप्तियोंके अनुकूल तर्क
भी हैं। जैसे, यदि धर्मिज्ञान व्यभिचारी (अप्रमाण) हो तो वह
निर्विषयक (बिना विषयका) होगा या असद्विषयक होगा। किन्तु ये
दोनों ही प्रकार पूर्वमें खण्डित हो चुके हैं। क्योंकि बिना विषयका
कोई ज्ञान होता ही नहीं है। तथा सर्वथा अलीकविषयक भी ज्ञान
नहीं होता। अन्यथा शशशृङ्गका भी ज्ञान होने लगेगा।
एवं, अनुव्यवसाय यदि व्यभिचारी (अप्रमाण) हो तो वह अर्थ- ।
बाह्यार्थभङ्गवादः ३१३
श्रावण्यभावात् । यदि तज्जातीयं व्यभिचरेत् , अव्यभिचारो
न क्वचिद् व्यवतिष्ठेत । तदव्यवस्थितौ व्यभिचारोऽपि न
स्यात् , अन्यथाख्यातिरूपत्वात्तस्य । तत्त्वस्थितौ च न्यथ त्वं
स्यात् , तदवधिकत्वात् ।
एतेन स्वप्नजागरावस्थयोरविशेष इति निरस्तम् । असत्-
ख्यातेश्च निराकृतत्वात्¹, अन्यथाख्यातेश्च तत्त्वख्यातिव्यव-
क॑र्मक भी नहीं हो सकेगा। अर्थात् वह घट आदि बाह्यविषयोंको
भासित नहीं कर सकेगा। क्योंकि अनुव्यवसायात्मक ज्ञान मानस है
और व्यवसायात्मक ज्ञानके विना मनकी सीधी पहुँच बाह्य विषयतक
नहीं है। अर्थात् इन्द्रियसन्निकर्षसे उत्पन्न व्यवसायात्मक ज्ञान अर्थको
विषय बनाता है और उस व्यवसायात्मक ज्ञानको विषय करनेके कारण
ही अनुव्यवसाय भी अर्थविषयक हो जाता है। अन्यथा अनुव्यवसाय
में अर्थभान होता ही नहीं। इससे सिद्ध हुआ कि अनुव्यवसाय ज्ञान
व्यवसायात्मक ज्ञानको अपना विषय बनानेके सम्बन्धमे सर्वथा अव्यभि-
चारी है। एवं, सजातीय ज्ञान भी यदि व्यभिचारी (अप्रमाण) हो जाय
तो अव्यभिचारनामकी वस्तु ही ससारसे उठ जायगी। और अव्यभि-
चारके अव्यवस्थित हो जाने पर व्यभिचार भी समाप्त हो जायगा।
क्योंकि अन्यथाख्याति ही तो व्यभिचार है। अतः जब तक कहीं
तात्त्विकता (अव्यभिचार) नहीं होगी, तब तक अन्यथात्वरूप व्यभि-
चारका भी व्यवहार नहीं हो सकता। क्योंकि अन्यथात्व तत्त्वसापेक्ष
होता है।
इस पूर्वोक्त तथ्यातथ्य विभागके व्यवस्थापनसे—स्वप्न और जागर
अवस्थाओंमें कोई भेद नहीं है—यह कथन भी खण्डित हो गया। अर्थात्
“जागरज्ञान भ्रान्त ज्ञानत्वात् स्वप्नज्ञानवत्” यह अनुमान भी खण्डित
हो गया। क्योंकि असत्ख्याति और आत्मख्याति का निराकरण किया
जा चुका है। अतः अन्यथाख्याति ही बच जाती है। तथा वह भी तत्त्व-
ख्यातिकी व्यवस्थाके बिना अनुपपन्न है। इसलिये तत्त्वख्याति (तथ्यज्ञान)
१. प्रतिषेधात् इति २ पु० पा०
३१४ आत्मतत्त्वविवेके
स्थानान्तरेणानुपपत्तेरिति । सा च यदि जागरेऽपि न स्यात्,
न स्यादेवेति ।
तथापि कथमनयोरवस्थयोर्विभागः कर्तव्य इति चेन्न,
लोकसिद्धत्वात् । किमनयोर्लक्षणमिति चेन्, कर्तृकर्मकरण-
कालप्रबन्धबाधः काकतालीयसंवादवान् स्वप्नस्य, प्रबन्धे
को भी मानना आवश्यक है । अत यदि वह तत्त्वख्याति जागर-अवस्था
में भी न हो तो वह कभी होगी ही नहीं । अर्थात् अन्यथाख्यातिकी
उपपत्तिके लिये जागरदशामें तत्त्वख्यातिको होना आवश्यक है । एवं
उक्त अनुमानके द्वारा क्या कुछ जागर-ज्ञानको भ्रान्त सिद्ध कर रहे
हो ? या सभी जागर ज्ञानको ? यदि कुछको भ्रान्त सिद्ध करो तो ऐसा
हम भी मानते हैं । अतः उक्त अनुमानमे सिद्धसाधनदोष आ जाता
है । यदि सभी जागर-ज्ञानोंको भ्रान्त सिद्ध करो तो स्वयं यह तुम्हारी
अनुमिति ही जागरकालीन होनेसे भ्रमात्मिका हो जायगी । ऐसी
स्थितिमे जो अनुमिति स्वयं भ्रमात्मक है, वह जागर-ज्ञानोंको भ्रान्त
कैसे सिद्ध कर सकेगी ?
यदि कहो कि—यह अनुमिति भ्रान्त नहीं है—तो भी तुम्हारी
यह प्रतिज्ञा कि "सभी जागर-ज्ञान भ्रान्त ही होते हैं" इसीसे समाप्त
हो गयी ।
फिर भी यदि पूछो कि—इन स्वप्न-जागर अवस्थाओंमे भेद कैसे
किया जा सकेगा ?—तो यह नहीं पूछ सकते । क्योंकि स्वप्न-जागरका
भेद तो लोकसे ही सिद्ध है । यदि पूछो कि—इन दोनोंका लक्षण क्या
है ?—तो सुनो, कर्ता कर्म करण देश-काल आदि प्रबन्धों (उपकरणों)
का बाध होना और काकतालीय न्यायसे कुछका सही हो जाना यह
स्वप्नका लक्षण है । यहा काकतालीय इसलिये कहा कि सबका बाध हो
जाय तो स्वप्नकालमें निर्विषयक ज्ञान कैसे होगा ? उसके लिये कोई
विषय चाहिये । अन्यथाख्याति कैसे होगी ? उसके लिये कोई तत्त्व
भी चाहिये, आरोप कैसे होगा ? कोई आधार चाहिये । तथा जागने
पर कहीं कुछ सही भी क्यों निकल आता है ? इसी आशयसे
काकतालीय कहा ।
बाह्यार्थभङ्गवादः ३१५
काकतालीयः कस्यचिदेव विषयस्य बाधो जागरस्येति ।
एतेन बाध्यप्रबन्धोऽवस्थाविशेषः स्वप्नः, प्रबन्धबाधका-
दिर्बाध्यमानप्रबन्धान्तो जागरितमित्यपि द्रष्टव्यमित्येषा दिक् ।
तस्मात् तथ्यमेव विश्वम्, मन्दप्रयोजनत्वात्तु सत्वरैर्मु-
मुक्षुभिरुपेक्षितमिति युक्तमुत्पश्यामः ।
तर्हि नैयायिकानां जगत्परिरक्षणे कोऽयमभिनिवेशाति-
शय इति चेत्, सहसैव तदुपेक्षायां न्यायाभासावकाशे प्रमाण-
एवं, प्रायः सभी कुछ सही होना और काकतालीयन्यायसे कर्त्ता-कर्म
आदि उपकरणोंमें किसीका कभी बाध हो जाना—यह जागर-अवस्थाका
लक्षण है। यहां भी काकतालीयपद शुक्ति-रजत रज्जु-सर्प आदि भ्रमों
के अभिप्रायसे कहा।
इसी प्रकार—जिसमे कर्त्ता-कर्म आदि प्रबन्ध बाधित हों, ऐसी
विशेष अवस्था स्वप्न है। और पूर्व स्वप्नोपकरणोंका बाधक है
आदिमें जिसके, तथा भावी स्वप्नोंका प्रबन्ध बाध्यमानरूपसे है अन्तमें
जिसके, ऐसी विशेष अवस्था जागरित है—यह भी लक्षण समझना
चाहिये। इस प्रकार यह दिग्मात्र निर्देश किया गया। (किसी
किसी के मतानुसार नाडी और मनके संयोगसे उत्पन्न ज्ञान स्वप्न है
तथा उससे भिन्न ज्ञान जागर है। अथवा स्वप्नत्व मानसत्व व्याप्य
एक जाति है, ऐसे ही जागरत्व भी एक जाति-विशेष है।)
इसलिये निष्कर्ष यही हुआ कि संसार तथ्य ही है। उपनिषदभ्यास-
के द्वारा जिन्हें आत्मतत्त्वका साक्षात्कार हो गया है, ऐसे वेदान्ती तो
मोक्षकी शीघ्रतामें प्रपञ्चविचारको मन्द-प्रयोजन मानते हुए उससे
उदासीन हो गये—यह हम उचित समझते हैं। यदि पूछो कि—
नैयायिक भी मोक्षाभिलाषी हैं, फिर उनका जगत्की वास्तविकता सिद्ध
करनेमें यह विशेष आग्रह क्यों है?—तो यह आग्रह इस भयसे है कि
एक द्य एक विश्वकी उपेक्षा कर देनेपर असत् न्यायोंको अवसर मिल
३१६ आत्मतत्त्वविवेके
मात्र¹विप्लवो भवेत् । तथा च न्यायरुचिः प्रेक्षावान् न
तत्त्वमधिगच्छेदिति भियेति ॥
॥ इति बाह्यार्थभङ्गवादः ॥
जायगा और मननका आधारभूत प्रमाणमात्र ही विलुप्त हो जायगा ।
तथा श्रवणके बाद मनन करनेकी इच्छावाले बुद्धिमान् जन तत्त्वज्ञानको
नहीं प्राप्त कर सकेंगे ।
। इति बाह्यार्थभङ्गवादनिरास ।
१ 'न्यायमार्गविप्लवो इति १ पु० पा०
अथ गुणगुणिभेदभङ्गवादः
अस्तु तर्हि गुणगुणिनोरभेदान्नैरात्म्यम्, क्षणिकज्ञान-
मात्रपरिशेषादिति चेत्, उच्यते । अस्ति तावदिह दर्शन-
स्पर्शनाभ्यामेकार्थानुसन्धानम् । तदिदमेकैकविषयं वा स्यात् १
गुणगुणिभेदभङ्गवाद खण्डन
पूर्वपक्ष—यदि क्षणभङ्गवादके आधारपर अथवा बाह्यार्थभङ्गवादके
आधारपर नैरात्म्य नहीं हो सकता तो गुण और गुणीमे अभेदके कारण
ही नैरात्म्यकी सिद्धि हो जायेगी। अर्थात् गुणसे अतिरिक्त गुणीकी
सत्ता ही नहीं है। अतः ज्ञानरूप गुणसे भिन्न कोई गुणी भूत आत्मा
नहीं है। यही नैरात्म्यवादका अभिप्राय है। एव, स्वयंप्रकाश क्षणिक
विज्ञानोंके अलावा वेदान्तियोंके नित्यविज्ञानमें भी कोई प्रमाण नहीं है।
इसलिये क्षणिकविज्ञानको ही आत्मा कह सकते हैं। उससे अतिरिक्त
ज्ञानादिका आधारभूत आत्मा नहीं है, यह पर्यवसित हुआ।
समाधान—दर्शनक्रिया और स्पर्शनक्रियाके द्वारा एक ही वस्तुकी
उपलब्धि होती है, यह बात हम व्यवहारमें पाते हैं। जैसे, पहले देखकर
हम कहते है "यह घट है" वैसे ही बादमें छू कर भी कहते हैं कि "यह
घट है"। इससे सिद्ध होता है कि ज्ञानरूप-गुणसे भिन्न दर्शन स्पर्शन-रूप
उभयविध ज्ञानोंका आश्रयभूत एक अतिरिक्त आत्मा है। क्योंकि यदि
ज्ञान ही आत्मा होता तो वहा दो प्रकारका ज्ञान होनेसे आत्मा भी दो
होता। क्योंकि वहां एक आत्माने देखा और दूसरेने स्पर्श किया। ऐसी
स्थितिमें दूसरेके देखनेका प्रतिसन्धान दूसरेको नहीं हो सकता। अत
"जिसे मैंने देखा उसे ही मैं छू रहा हूँ" इस प्रकारका वस्तुकी एकताका
भान यहां नहीं होता। अतिरिक्त आत्मा माननेपर तो ज्ञानोंमे भेद
होनेपर भी चूँकि स्थायी आत्मा एक है, इसलिये वही दर्शनकालमें भी
था और स्पर्शनकालमें भी है। अत उसे यह प्रतिसन्धान (प्रत्यभिज्ञा)
हो सकता है कि जिसे देखा था उमे अभी छू रहा हूँ।
यह जो दर्शन-स्पर्शनरूप भिन्न क्रियाओंके द्वारा एक वस्तुका ग्रहण
३१८ आत्मतत्त्वविवेके
समुदायविषयं वा ? तदतिरिक्तविषयं वा ? वस्त्वनुरोध्याकार-
विषयं वा ? अलीकविषयं वा ?
न तावदाद्यः, न हि यदेव रूपं तदेव स्पर्श इति । न
च रूप त्वगिन्द्रियग्राह्यम् , अन्धस्यापि नीलादिप्रत्ययप्रस-
ङ्गात् । न चैकमेव वस्तु करणभेदेनान्यथा प्रथत इति युक्तम् ,
अनात्मकत्वप्रसङ्गात् , भेदाभेदव्यवस्थानुपपत्तेश्च ।
होता है, उसके सम्बन्धमें पूछना है कि यह चाक्षुष और स्पार्शन प्रत्यक्ष
केवल रूपको या केवल स्पर्शको विषय बनाता है ? अथवा रूप और स्पर्श
दोनोंके समुदायको ? अथवा इन दोनोंसे अतिरिक्त अवयवी को ? अथवा
वस्तुसे रहित ज्ञानका आकारविशेष वहा भासित होता है ? या शश-
शृङ्गवत् अलीकको विषय बनाता है ?
इनमें प्रथम कल्प नहीं हो सकता है । क्योंकि जो ही रूप है, वही
स्पर्श नहीं है, जिससे कि चाक्षुष और स्पार्शन उभयविध प्रत्यक्षावस्था-
में केवलरूपका ही या केवल स्पर्शका ही भान हो सके ! क्योंकि रूप
त्वगिन्द्रियका विषय नहीं है और स्पर्श चक्षुरिन्द्रियको विषय नहीं है ।
यदि वैसा होता तो अन्धेको भी नीलपीतादिका ज्ञान हो जाता और
दूरसे किसी वस्तुके शुक्लादिरूपके ग्रहणकालमे बिना छुये नेत्रसे ही
उसके उष्णत्व आदि का भी ज्ञान हो जाता ।
यह भी ठीक नहीं है कि—एक ही वस्तु इन्द्रियभेदसे भिन्न स्वरूपमें
भासित होती है । अर्थात् एक ही वस्तु चक्षुरिन्द्रियके द्वारा रूपत्वेन
और त्वगिन्द्रियके द्वारा स्पर्शत्वेन भासित होती है—क्योंकि रूपत्व और
स्पर्शत्व परस्पर विरोधी धर्म हैं, वे एक वस्तुमें साथ रह नहीं सकते,
बारी बारीसे रहेंगे—इसका कोई नियामक नहीं है । इसप्रकार उभय-
स्वरूपसे रहित होकर वह वस्तु शून्यात्मक हो जायगी । एव, यदि
परस्पर विरोधी धर्म एक जगह रहे तो वह धर्मी भी भिन्न हो जायगा ।
फिर भी यदि धर्मी अभिन्न ही रहे तो ससारसे भेदमात्रका उच्छेद हो
जायगा और भेद-अभेदकी व्यवस्था ही समाप्त हो जायगी ।
गुणगुणिभेदभङ्गवादः ३१९
नापि द्वितीयः, स हि एकदेशतया वा ? एककालतया
वा ? एककार्यतया वा ? एककारणतया वेति ?
न तावदुपादानरूपैकदेशसंभव, तयोः प्रतिनियतोपादा-
नत्वात् । संभवे वा तदेव द्रव्यमिति पर्यवसितं विवादेन ।
नाप्यधिकरणीभूतभूतलाद्याधारतया तत्संभवः, चक्षुषा ह्युपल-
भ्यमाने भूतले रूपविशेषे घटोऽपि चक्षुषैवोपलभ्यमानो रूप-
विशेषस्तदाधार इति शक्यते निश्चेतुम्, तयोरधरोत्तरभावे-
यह भी नहीं हो सकता कि—उक्त दर्शन-स्पर्शन क्रियाद्वारा एक अर्थ
के ग्रहणका अभिप्राय है "रूप और स्पर्शके समुदायका ग्रहण" अर्थात्
उक्त प्रतीतियोंमें रूप और स्पर्शका समुदाय ही विषय बन रहा है-कारण,
यहाँ रूप और स्पर्शका समुदाय बन ही नहीं सकता है । क्योंकि वह
समुदाय उपादानरूप एकदेशके कारण होगा ? या एक कालके कारण ?
या उपादेयरूप एक कार्यके कारण होगा ? अथवा एक समुदाय इसलिये
होगा कि रूप और स्पर्श दोनोंका एक ही कारण है।
इन कल्पोंमें प्रथम कल्प कि—उपादानरूप एकदेशके कारण रूप-
स्पर्शका एक समूह बन जायगा--नहीं हो सकता । क्योंकि दोनोंके
भिन्न भिन्न उपादान नियत हैं । अर्थात् तुम्हारे मतमें रूपका रूप ही
और स्पर्शका स्पर्श ही उपादान होता है, अत दोनोंका एक उपादान
असंभव है । यदि दोनोंका एक उपादान मेरे ही समान तुम्हारे मतमें
भी हो तो फिर वही गुणी द्रव्य सिद्ध हो गया । इस प्रकार गुणातिरिक्त
गुणी होनेमे विवाद ही समाप्त हो गया ।
यदि कहो कि-एक उपादानके कारण नहीं, किन्तु भूतलादिस्वरूप
एक अधिकरणके कारण रूप और स्पर्शका एक समुदाय बन जायगा--तो
यह भी नहीं संभव है । क्योंकि तुम्हारे मतमें गुणातिरिक्त गुणी नहीं
होनेसे चक्षुद्वारा उपलभ्यमान भूतल पृथक् गुणी न होकर रूपविशेष है,
और उसपर चक्षुद्वारा उपलभ्यमान घट भी पृथक् गुणी न होकर रूप-
विशेष ही है । इसप्रकार "रूपविशेषात्मक भूतलमें रूपविशेषात्मक घट
आश्रित है" इसका निश्चय चक्षुद्वारा कर सकते है, क्योंकि आश्रयाश्रयि-
३२० आत्मतत्त्वविवेके
नैकज्ञानसंसर्गित्वात्, तदधिकरणाः स्पर्शादयोऽपीति तु कस्य
प्रमाणस्य विषयः ? न हि स्पर्शादयश्चाक्षुषे चेतसि चकासति ।
त्वचोऽय व्यापार इत्यपि नास्ति, तथापि भूतलघटस्पर्शयो
राधाराधेयभावप्रतीते ।
न च समुदाययोस्तत्संभवः, परस्पराश्रयत्वप्रसङ्गात् ।
एकाधारतायां हि समुदायानुसन्धान समुदायानुसन्धाने
चैकाधारतानुसन्धानसम्भव इति । अनवस्थाप्रसङ्गाच्च, भूतल
भावसे दोनों ही एक चाक्षुष ज्ञानमें संपृक्त हैं। किन्तु "उसी भूतल-
रूप अधिकरणमे स्पर्शादि भी है" यह किस प्रमाणसे जान सकोगे ?
क्योंकि चाक्षुषज्ञानमे स्पर्शादिका भान हो ही नहीं सकता है। अत
भूतलरूप एकाधिकरणको लेकर रूप स्पर्शका एक समुदाय नहीं बन
सकता है।
यदि कहो कि-स्पर्शका भान त्वचाका व्यापार है-तो इससे भी
काम नहीं चलेगा। क्योंकि त्वचाके द्वारा भी भूतल और घटके स्पर्श
का ही अर्थात् स्पर्शविशेषात्मक भूतल और स्पर्शविशेषात्मक घटका ही
परस्पर आधाराधेयभाव प्रतीत होगा, न कि उनके रूपोंका भी। क्योंकि
रूपग्रहणमे त्वचा असमर्थ है। इसप्रकार पुनरपि रूप स्पर्शका एक
समुदाय नहीं बन सका।
यदि कहो कि-रूप स्पर्शादिका समुदायात्मक भूतल एव रूप
स्पर्शादिका समुदायात्मक घटमें परस्पर आधाराधेयभाव बन जायगा-
तो यह भी सम्भव नहीं है। क्योंकि तब अन्योन्याश्रयदोषका प्रसङ्ग हो
जायगा। कारण, एकाधारताकी प्रतीति होनेपर ही रूप स्पर्शका समुदाय
ही प्रतीत सकेगा और उक्त कथनानुसार जब रूप स्पर्शका समुदाय प्रतीत
हो लेगा तभी एकाधारताकी प्रतीति होगी, इस प्रकार अन्योन्याश्रयदोष हो
जाता है। साथ ही अनवस्थादोषका भी प्रसङ्ग हो जाता है। क्योंकि
जिस प्रकार भूतलात्मक एक आधारके कारण आधेयभूत घटको रूप
स्पर्शादिका समुदायात्मक सिद्ध करते हो, उसी प्रकार भूतलको भी रूप
स्पर्शादिका एक समुदाय मानते हो, सो किस आधारको लेकर वह (भूतल)