आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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समुद्बुद्धस्मरणबलेन भवन् प्रमाणान्तरशरीर एव प्रविशतीति
परत एवावशिष्यते ।
तत्राप्यनवस्थेति चेत्, न तावदसौ दृष्टान्तद्वारिका,
प्रागेव तन्निश्चयात् । फलद्वारिका तु स्यादपि, यदि प्रामाण्य-
है—तो यहाँ भी बार-बार सहचारदर्शनसे उत्पन्न जो व्याप्तिज्ञान, उससे
उत्पन्न जो संस्कार, उसके द्वारा होने वाले व्याप्तिस्मरणके बलसे ही
प्रामाण्यका निश्चय होता है अर्थात् यहाँ भी तज्जातीयत्व-हेतुसे ही
प्रामाण्यका ग्रहण होता है । जैसे, अयं पृथिवीत्वेनानुभवः, पृथिवीत्ववति
पृथिवीत्वप्रकारक, गन्धवद्विशेष्यकपृथिवीत्वप्रकारकनिश्चयजातीयतत्-
त्वात्, पूर्वपृथिवीत्वप्रकारकनिश्चयवत्, इत्यादि । क्योंकि तद्वति
प्रकारक अनुभव ही तो प्रमा है । अतः यह भी अनुमानप्रमाणमें ही
अन्तर्भूत हो जाता है । इससे यही निष्कर्ष आता है कि प्रामाण्य
परतोग्राह्य ही है, स्वतोग्राह्य नहीं ।
यदि कहो कि- तज्जातीयत्वरूप लिङ्गसे प्रामाण्यका ज्ञान (अनुमान)
करनेमें भी तो अनवस्थानामक दोष आ जाता है—तो क्या यहाँ दृष्टान्तके
द्वारा कारणमुखी अनवस्था होगी ? या अनुमितिरूप फलके द्वारा फल-
मुखी ? यहाँ दृष्टान्तको लेकर अनवस्था नहीं हो सकती है । क्योंकि
दृष्टान्तमे तो प्रामाण्यका निश्चय वर्तमान अनुमितिसे पूर्व ही हो चुका
है । तभी तो वह दृष्टान्त बना है । अतः पक्षभूत ज्ञानमें प्रमाण्यकी
अनुमिति करनेके समय दृष्टान्तभूत ज्ञानमें प्रामाण्यानुमितिकी अपेक्षा
ही नहीं रहती है कि उसमें भी प्रामाण्यानुमिति करनी पड़े और उसके
लिये जो दूसरा दृष्टान्त दिया जाय, उसमे भी प्रामाण्यानुमिति करनी
पड़े । तथा ऐसे ही अनवस्थितरूपसे जो जो दृष्टान्त बनता जाय, उन
सभीमें प्रामाण्यानुमिति करनी पड़ जाय । अर्थात् दृष्टान्तभूत ज्ञानमें
पूर्वसे ही प्रामाण्यज्ञान हुए रहनेसे दृष्टान्तकृत अनवस्था नहीं हो
सकती है ।
अनुमितिरूप फलको लेकर तो तभी अनवस्था होती यदि जिस अनु-
मितिसे वर्तमान ज्ञानमें प्रामाण्यका निश्चय करते हैं, उस अनुमितिमें भी
प्रामाण्यका निश्चय करना आवश्यक माना जाय । अर्थात् अनुमिति-