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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 367, कुल 530 में से

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पृष्ठ 367

३१८ आत्मतत्त्वविवेके
समुदायविषयं वा ? तदतिरिक्तविषयं वा ? वस्त्वनुरोध्याकार-
विषयं वा ? अलीकविषयं वा ?
न तावदाद्यः, न हि यदेव रूपं तदेव स्पर्श इति । न
च रूप त्वगिन्द्रियग्राह्यम् , अन्धस्यापि नीलादिप्रत्ययप्रस-
ङ्गात् । न चैकमेव वस्तु करणभेदेनान्यथा प्रथत इति युक्तम् ,
अनात्मकत्वप्रसङ्गात् , भेदाभेदव्यवस्थानुपपत्तेश्च ।
होता है, उसके सम्बन्धमें पूछना है कि यह चाक्षुष और स्पार्शन प्रत्यक्ष
केवल रूपको या केवल स्पर्शको विषय बनाता है ? अथवा रूप और स्पर्श
दोनोंके समुदायको ? अथवा इन दोनोंसे अतिरिक्त अवयवी को ? अथवा
वस्तुसे रहित ज्ञानका आकारविशेष वहा भासित होता है ? या शश-
शृङ्गवत् अलीकको विषय बनाता है ?
इनमें प्रथम कल्प नहीं हो सकता है । क्योंकि जो ही रूप है, वही
स्पर्श नहीं है, जिससे कि चाक्षुष और स्पार्शन उभयविध प्रत्यक्षावस्था-
में केवलरूपका ही या केवल स्पर्शका ही भान हो सके ! क्योंकि रूप
त्वगिन्द्रियका विषय नहीं है और स्पर्श चक्षुरिन्द्रियको विषय नहीं है ।
यदि वैसा होता तो अन्धेको भी नीलपीतादिका ज्ञान हो जाता और
दूरसे किसी वस्तुके शुक्लादिरूपके ग्रहणकालमे बिना छुये नेत्रसे ही
उसके उष्णत्व आदि का भी ज्ञान हो जाता ।
यह भी ठीक नहीं है कि—एक ही वस्तु इन्द्रियभेदसे भिन्न स्वरूपमें
भासित होती है । अर्थात् एक ही वस्तु चक्षुरिन्द्रियके द्वारा रूपत्वेन
और त्वगिन्द्रियके द्वारा स्पर्शत्वेन भासित होती है—क्योंकि रूपत्व और
स्पर्शत्व परस्पर विरोधी धर्म हैं, वे एक वस्तुमें साथ रह नहीं सकते,
बारी बारीसे रहेंगे—इसका कोई नियामक नहीं है । इसप्रकार उभय-
स्वरूपसे रहित होकर वह वस्तु शून्यात्मक हो जायगी । एव, यदि
परस्पर विरोधी धर्म एक जगह रहे तो वह धर्मी भी भिन्न हो जायगा ।
फिर भी यदि धर्मी अभिन्न ही रहे तो ससारसे भेदमात्रका उच्छेद हो
जायगा और भेद-अभेदकी व्यवस्था ही समाप्त हो जायगी ।