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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 530 में से

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पृष्ठ 363

३१४ आत्मतत्त्वविवेके

स्थानान्तरेणानुपपत्तेरिति । सा च यदि जागरेऽपि न स्यात्,
न स्यादेवेति ।
तथापि कथमनयोरवस्थयोर्विभागः कर्तव्य इति चेन्न,
लोकसिद्धत्वात् । किमनयोर्लक्षणमिति चेन्, कर्तृकर्मकरण-
कालप्रबन्धबाधः काकतालीयसंवादवान् स्वप्नस्य, प्रबन्धे
को भी मानना आवश्यक है । अत यदि वह तत्त्वख्याति जागर-अवस्था
में भी न हो तो वह कभी होगी ही नहीं । अर्थात् अन्यथाख्यातिकी
उपपत्तिके लिये जागरदशामें तत्त्वख्यातिको होना आवश्यक है । एवं
उक्त अनुमानके द्वारा क्या कुछ जागर-ज्ञानको भ्रान्त सिद्ध कर रहे
हो ? या सभी जागर ज्ञानको ? यदि कुछको भ्रान्त सिद्ध करो तो ऐसा
हम भी मानते हैं । अतः उक्त अनुमानमे सिद्धसाधनदोष आ जाता
है । यदि सभी जागर-ज्ञानोंको भ्रान्त सिद्ध करो तो स्वयं यह तुम्हारी
अनुमिति ही जागरकालीन होनेसे भ्रमात्मिका हो जायगी । ऐसी
स्थितिमे जो अनुमिति स्वयं भ्रमात्मक है, वह जागर-ज्ञानोंको भ्रान्त
कैसे सिद्ध कर सकेगी ?
यदि कहो कि—यह अनुमिति भ्रान्त नहीं है—तो भी तुम्हारी
यह प्रतिज्ञा कि "सभी जागर-ज्ञान भ्रान्त ही होते हैं" इसीसे समाप्त
हो गयी ।
फिर भी यदि पूछो कि—इन स्वप्न-जागर अवस्थाओंमे भेद कैसे
किया जा सकेगा ?—तो यह नहीं पूछ सकते । क्योंकि स्वप्न-जागरका
भेद तो लोकसे ही सिद्ध है । यदि पूछो कि—इन दोनोंका लक्षण क्या
है ?—तो सुनो, कर्ता कर्म करण देश-काल आदि प्रबन्धों (उपकरणों)
का बाध होना और काकतालीय न्यायसे कुछका सही हो जाना यह
स्वप्नका लक्षण है । यहा काकतालीय इसलिये कहा कि सबका बाध हो
जाय तो स्वप्नकालमें निर्विषयक ज्ञान कैसे होगा ? उसके लिये कोई
विषय चाहिये । अन्यथाख्याति कैसे होगी ? उसके लिये कोई तत्त्व
भी चाहिये, आरोप कैसे होगा ? कोई आधार चाहिये । तथा जागने
पर कहीं कुछ सही भी क्यों निकल आता है ? इसी आशयसे
काकतालीय कहा ।