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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 360, कुल 530 में से

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पृष्ठ 360

बाह्यार्थभङ्गवादः ३१९
स्यान्मतम्, एतदेव तु कथं निश्चेयं यदेवम्भूतमेक-
कोटिनियतमेव, यावता तत्राप्यनवस्थितिरिति चेन्न, व्याप्ति
ज्ञानस्य साक्षादात्मन्यप्रवृत्तावपि सर्वोपसंहारेण यमुपाधिमा-
दाय प्रवृत्तिस्तद्धर्मवत्त्वात्। तज्जातीयत्वं हि तत्रोपाधिस्तच्च
तत्राप्यविशिष्टमनुव्यवसायत्वात्।
जहाँ अप्रामाण्यकी आशङ्का ही न रहे, वहा प्रामाण्यानुमितिकी आव-
श्यकता नहीं है।
यदि कहो कि उक्त सिद्धान्त रहे, किन्तु यही कैसे निश्चय है कि
अनुव्यवसायमें एकमात्र प्रमाणकोटि ही नियत रूपसे है, उसमे अप्रा-
माण्य कभी नहीं रहता। इसलिए अनुव्यवसाय सदा प्रमाण ही होता
है, इस व्याप्तिकी सिद्धि भी किसी अन्य अनुमानसे ही करनी होगी।
तथा उस अनुमानके लिए पुन व्याप्तिज्ञान लिङ्गज्ञानादिकी आवश्यकता
पड़ेगी। एव उस व्याप्तिज्ञान आदिमे भी बिना प्रामाण्यानुमिति किये
काम नहीं चल सकता, इस प्रकार पुन अनवस्थादोष आ ही जाता है—
तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि व्याप्तिज्ञानकी साक्षात् (सीधे)
अपने बारेमे प्रवृत्ति नहीं होनेपर भी सबको संगृहीत करनेवाले जिस
धर्मको लेकर प्रवृत्ति होती है, वह धर्म स्वय उस व्याप्तिज्ञानमें भी है।
तज्जातीयत्व ही तो यहाँ उपाधि (धर्म) है और वह उसमे भी समान
ही है। क्योंकि अन्य अनुव्यवसायोम रहनेवाला अनुव्यवसायत्व धर्म
उस व्याप्तिज्ञानमे भी है। इस प्रकार अन्य अनुव्यवसायोमे नियतरूपसे
एकमात्र प्रामाण्यकोटिको सिद्ध कराता हुआ अनुव्यवसायत्व धर्म अनु-
व्यवसाय होनेने नाते अपनेमे भी वह नियम लागू कर लेगा। अर्थात्
जो जो अनुव्यवसाय होता है वह सब प्रमाण ही होता है, ऐसी व्याप्ति
अनुव्यवसायत्वावच्छेदेन१ गृहीत है। तथा वह अनुव्यवसायत्व जाति
स्वय इस व्याप्तिज्ञानमें भी है, अत अन्य अनुव्यवसायोँमें प्रामाण्यानुमिति
कराता हुआ अपनेमें भी प्रामाण्यग्रह करा ही लेगा, उसके लिए अति-
रिक्त अनुमितिकी आवश्यकता नहीं है। अत अनवस्थादोष नहीं आता।
१. अनुव्यवसायमात्र म ।