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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 351, कुल 530 में से

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पृष्ठ 351

३०२ आत्मतत्त्वविवेके
ष्पत्तेः । न चाविद्यमानेनाविद्यमानस्योपलम्भ¹ इति स्वसंवि-
त्तावसंवित्तिरेवेति ।
द्वितीये तु सिद्धसाधनम् । न ह्यनुपलब्ध उपलब्धो
भवति । न चैवं सत्यर्थोऽपि नोपलभ्येत । न ह्युपलम्भप्रतीति-
रर्थवेदनमपि तूपलम्भनिष्पत्तिः । उपलम्भादृष्टावुपलम्भनिष्प-
लेनेपर जो उपलम्भ अभी अनागत हे (अभी उत्पन्न नहीं हुआ है),
उसका भी प्रत्यक्ष होने लगेगा । क्योंकि आपके अभिप्रायानुसार उप-
लम्भका प्रत्यक्ष हुए बिना उपलम्भकी उत्पत्ति ही नहीं हो सकती है।
अर्थात् विषयज्ञानकी उत्पत्तिके लिये पूर्वमें विषयज्ञानका प्रत्यक्ष होना
आवश्यक है, जो सर्वथा असंगत बात है । क्योंकि जो ज्ञान अभी पैदा
ही नहीं हुआ है, उसका पहले ही प्रत्यक्ष कैसे हो सकेगा ? कारण,
जिस ज्ञानका प्रत्यक्ष करना है, वह ज्ञान अभी अविद्यमान है तथा
स्वतोग्राह्यवादीके मतानुसार उस अविद्यमान ज्ञानका ग्राहक भी स्वयं
वही है । अतः अविद्यमान (स्वयं) से अविद्यमान (स्वयं) का ज्ञान
नहीं हो सकता है । इसलिए स्वतोग्राह्य माननेमे सर्वथा अग्राह्य हो जाने-
की स्थिति आ जाती है ।
द्वितीय अभिप्रायमें तो सिद्धसाधनदोष हो जायगा । अर्थात् अर्थ-
दृष्टिकी सिद्धिसे आपका अभिप्राय अर्थोपलम्भकी प्रतीतिसे हो तो
“अप्रत्यक्षोपलम्भस्य” इस कथनका यह अर्थ होगा कि - जब तक उप-
लम्भका प्रत्यक्ष (प्रतीति) नहीं होगा, तब तक अर्थोपलम्भकी प्रतीति
नहीं होगी—तो इसे मैं भी मानता ही हूँ । इस प्रकार सिद्धसाधनदोष
आ जाता है । क्योंकि अनुपलब्ध को हम भी उपलब्ध नहीं बताते हैं।
अर्थात् प्रतीतिकी दशामें ही हम भी प्रतीति मानते हैं, न कि अप्रतीति-
की दशा में । यहाँ यह नहीं कह सकते कि—अर्थज्ञानका ज्ञान हुए
बिना अर्थका भी ज्ञान नहीं हो सकेगा—क्योंकि ज्ञानका ज्ञान होना
अर्थज्ञान नहीं है, किन्तु ज्ञानकी निष्पत्ति (उत्पत्ति) होना अर्थज्ञान है ।
यदि कहो कि—ज्ञानका ज्ञान हुए बिना ज्ञानोत्पत्ति हुई है, यह
व्यवहार ही कैसे होगा ?—तो ज्ञानकी उत्पत्तिका जो व्यवहार होना है,
१. वेदनमिति अ. ...