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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 361, कुल 530 में से

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पृष्ठ 361

३१२ आत्मतत्त्वविवेके
न च सामान्यतो नियमनिश्चये तदालिङ्गिते विशेषे द्वैत-
शङ्कावकाशः । यथा वाचकः शब्द इति स्वात्मनो वाचकत्वं
न साक्षाद् विधत्ते वृत्तिविरोधात्, तथापि सामान्येन यमु-
पाधिमधिकृत्य प्रवृत्तः शब्दस्तद्वशात् शब्दशब्दो वाचको न
वेति शङ्कया न परिभूयते, नाप्यनवस्थेत्येवमिहापीति ।
तर्काश्चात्र भवन्ति—यदि धर्मिज्ञानं व्यभिचरेत्, निरा-
लम्बनमसद्धालम्बनं वा भवेत्, निषिद्धं च तत् । यद्यनुव्यव-
सायो व्यभिचरेत्, तदार्थककर्मकोऽपि न स्यात्, ज्ञानेतरस्यार्थ-
सामान्यरूपसे प्रामाण्यकी व्याप्तिका निश्चय हो जानेपर सामान्या-
न्तर्गत विशेषमे प्रामाण्य अप्रामाण्यरूप द्वैतकी शङ्काका अवसर ही नहीं
रहता है। जैसे, 'शब्द वाचक होता है' यह नियम अपने ('शब्द' इस
शब्दके) वाचकत्वके बारेमे साक्षात् विधान नहीं करता है, क्योंकि
अपनेमे अपनी वृत्ति (स्थिति) का होना विरुद्ध है। फिर भी सामान्य-
रूपसे जिस उपाधिको (शब्दत्वको) लेकर घटपटादिशब्द वाचक
होता है, वही शब्दत्वरूप उपाधि स्वयं शब्दशब्दमे भी है, इसलिये
"शब्दशब्द वाचक है या नहीं" यह शङ्का नहीं उठती और न अन-
वस्था ही आती है। वैसे ही सभी अनुव्यवसाय प्रमाण ही होता है, इस
नियममें भी अप्रामाण्य की शङ्का नहीं होगी तथा इस नियमकी सिद्धिके
लिये अलग व्याप्तिका और अनुमितिकी अपेक्षा नहीं होनेसे अनवस्था
भी नहीं होगी।
यहां उक्त व्याप्तियोंके पोषक तर्क भी हैं। अर्थात् धर्मिज्ञान
(ज्ञानरूप पक्षका ज्ञान) प्रमाण ही है, अनुव्यवसायात्मक ज्ञान प्रमाण
ही है तथा सजातीयज्ञान भी प्रमाण ही है, इन व्याप्तियोंके अनुकूल तर्क
भी हैं। जैसे, यदि धर्मिज्ञान व्यभिचारी (अप्रमाण) हो तो वह
निर्विषयक (बिना विषयका) होगा या असद्विषयक होगा। किन्तु ये
दोनों ही प्रकार पूर्वमें खण्डित हो चुके हैं। क्योंकि बिना विषयका
कोई ज्ञान होता ही नहीं है। तथा सर्वथा अलीकविषयक भी ज्ञान
नहीं होता। अन्यथा शशशृङ्गका भी ज्ञान होने लगेगा।
एवं, अनुव्यवसाय यदि व्यभिचारी (अप्रमाण) हो तो वह अर्थ- ।