आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः ३१३
श्रावण्यभावात् । यदि तज्जातीयं व्यभिचरेत् , अव्यभिचारो
न क्वचिद् व्यवतिष्ठेत । तदव्यवस्थितौ व्यभिचारोऽपि न
स्यात् , अन्यथाख्यातिरूपत्वात्तस्य । तत्त्वस्थितौ च न्यथ त्वं
स्यात् , तदवधिकत्वात् ।
एतेन स्वप्नजागरावस्थयोरविशेष इति निरस्तम् । असत्-
ख्यातेश्च निराकृतत्वात्¹, अन्यथाख्यातेश्च तत्त्वख्यातिव्यव-
क॑र्मक भी नहीं हो सकेगा। अर्थात् वह घट आदि बाह्यविषयोंको
भासित नहीं कर सकेगा। क्योंकि अनुव्यवसायात्मक ज्ञान मानस है
और व्यवसायात्मक ज्ञानके विना मनकी सीधी पहुँच बाह्य विषयतक
नहीं है। अर्थात् इन्द्रियसन्निकर्षसे उत्पन्न व्यवसायात्मक ज्ञान अर्थको
विषय बनाता है और उस व्यवसायात्मक ज्ञानको विषय करनेके कारण
ही अनुव्यवसाय भी अर्थविषयक हो जाता है। अन्यथा अनुव्यवसाय
में अर्थभान होता ही नहीं। इससे सिद्ध हुआ कि अनुव्यवसाय ज्ञान
व्यवसायात्मक ज्ञानको अपना विषय बनानेके सम्बन्धमे सर्वथा अव्यभि-
चारी है। एवं, सजातीय ज्ञान भी यदि व्यभिचारी (अप्रमाण) हो जाय
तो अव्यभिचारनामकी वस्तु ही ससारसे उठ जायगी। और अव्यभि-
चारके अव्यवस्थित हो जाने पर व्यभिचार भी समाप्त हो जायगा।
क्योंकि अन्यथाख्याति ही तो व्यभिचार है। अतः जब तक कहीं
तात्त्विकता (अव्यभिचार) नहीं होगी, तब तक अन्यथात्वरूप व्यभि-
चारका भी व्यवहार नहीं हो सकता। क्योंकि अन्यथात्व तत्त्वसापेक्ष
होता है।
इस पूर्वोक्त तथ्यातथ्य विभागके व्यवस्थापनसे—स्वप्न और जागर
अवस्थाओंमें कोई भेद नहीं है—यह कथन भी खण्डित हो गया। अर्थात्
“जागरज्ञान भ्रान्त ज्ञानत्वात् स्वप्नज्ञानवत्” यह अनुमान भी खण्डित
हो गया। क्योंकि असत्ख्याति और आत्मख्याति का निराकरण किया
जा चुका है। अतः अन्यथाख्याति ही बच जाती है। तथा वह भी तत्त्व-
ख्यातिकी व्यवस्थाके बिना अनुपपन्न है। इसलिये तत्त्वख्याति (तथ्यज्ञान)
१. प्रतिषेधात् इति २ पु० पा०