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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 530 में से

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पृष्ठ 359

३१० आत्मतत्त्वविवेके
न, द्वैताभावात् । यत्र हि लिङ्गज्ञाने धर्मिज्ञाने वा तथ्यातथ्य-
भावेन द्वैतमुपलभ्यते तत्र तथात्वानिश्चये लिङ्गमाभासशङ्का-
क्रान्ततया न निश्चीयते । यत्र तु तज्ज्ञानं तदेकनियतं तत्र
तावतैव लिङ्गनिश्चयः, तदाभासशङ्कानुत्थानात् । एककोटि-
नियतो ह्यनुभवो निश्चयः । ज्ञानतद्धर्मग्राहिणि च ज्ञाने न
द्वैतमिति व्यवस्थितिरेव । प्रामाण्यनिश्चयस्तु तस्यापि परत
एवेति न्यायसंप्रदायः । इत एव विशेषात् तादृशस्य स्वतः
एवेति तात्पर्याचार्याः ।
अप्रामाण्यकी आशङ्का ही नहीं रहती है। इसीलिये उसमें न प्रामाण्य-
ग्रहकी अपेक्षा होती है और न उसके लिये अनुमानान्तर करनेकी
ही आवश्यकता पड़ती है। अतः अनवस्थादोष नहीं है।
जहाँपर लिङ्गज्ञान या धर्मिज्ञानमें प्रामाण्य-अप्रामाण्यका द्वैत होता
है, जैसे धूमादिज्ञानसे अग्निविषयक अनुमानस्थलमें, वहीं पर लिङ्गादि-
ज्ञानमें प्रामाण्यका निश्चय नहीं रहने पर अप्रामाण्यकी शङ्कासे ग्रस्त
होनेके कारण वहां लिङ्गका निश्चय नहीं हो पाता है। अतः वहां
लिङ्गादिके निश्चयार्थ प्रामाण्यानुमिति करनी पड़ेगी। किन्तु जहांपर
लिङ्गादिज्ञान नियतरूपसे प्रमाण ही रहता है, जैसे, ज्ञानपक्षक प्रामाण्या-
नुमिति स्थलमें ज्ञानविषयकज्ञानरूप अनुव्यवसाय सदा प्रमाण ही रहत
है, वहाँपर उस अनुव्यवसायसे ही लिङ्गका निश्चय हो जाता है,
क्योंकि वहाँपर अप्रामाण्यकी शङ्का ही नहीं उठती है। कारण, एक
कोटिसे नियत जो अनुभव, वही तो निश्चय है। ज्ञानको और उसके
धर्म (प्रत्यक्षत्व, अनुमितित्व, शाब्दत्व, स्मृतित्व आदि) को ग्रहण करने
वाले अनुव्यवसायात्मक ज्ञान (प्रत्यक्षयामि, अनुमिनोमि, शाब्दयामि,
स्मरामि इत्यादि) में प्रामाण्य-अप्रामाण्यरूप दो कोटियां नहीं होती हैं,
यह व्यवस्थिति ही है। यहाँ भी यदि हठात् प्रामाण्यका निश्चय करना
चाहें तो परतः ही अर्थात् अनुमानके द्वारा ही होगा न कि स्वतः, यह
न्यायका सिद्धान्त है। न्यायवार्तिकतात्पर्यटीकाकार श्रीवाचस्पतिमिश्र-
ने जो अनुमानको स्वतः प्रमाण कहा है, उसका भी यही आशय है कि