आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 369, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें३२० आत्मतत्त्वविवेके
नैकज्ञानसंसर्गित्वात्, तदधिकरणाः स्पर्शादयोऽपीति तु कस्य
प्रमाणस्य विषयः ? न हि स्पर्शादयश्चाक्षुषे चेतसि चकासति ।
त्वचोऽय व्यापार इत्यपि नास्ति, तथापि भूतलघटस्पर्शयो
राधाराधेयभावप्रतीते ।
न च समुदाययोस्तत्संभवः, परस्पराश्रयत्वप्रसङ्गात् ।
एकाधारतायां हि समुदायानुसन्धान समुदायानुसन्धाने
चैकाधारतानुसन्धानसम्भव इति । अनवस्थाप्रसङ्गाच्च, भूतल
भावसे दोनों ही एक चाक्षुष ज्ञानमें संपृक्त हैं। किन्तु "उसी भूतल-
रूप अधिकरणमे स्पर्शादि भी है" यह किस प्रमाणसे जान सकोगे ?
क्योंकि चाक्षुषज्ञानमे स्पर्शादिका भान हो ही नहीं सकता है। अत
भूतलरूप एकाधिकरणको लेकर रूप स्पर्शका एक समुदाय नहीं बन
सकता है।
यदि कहो कि-स्पर्शका भान त्वचाका व्यापार है-तो इससे भी
काम नहीं चलेगा। क्योंकि त्वचाके द्वारा भी भूतल और घटके स्पर्श
का ही अर्थात् स्पर्शविशेषात्मक भूतल और स्पर्शविशेषात्मक घटका ही
परस्पर आधाराधेयभाव प्रतीत होगा, न कि उनके रूपोंका भी। क्योंकि
रूपग्रहणमे त्वचा असमर्थ है। इसप्रकार पुनरपि रूप स्पर्शका एक
समुदाय नहीं बन सका।
यदि कहो कि-रूप स्पर्शादिका समुदायात्मक भूतल एव रूप
स्पर्शादिका समुदायात्मक घटमें परस्पर आधाराधेयभाव बन जायगा-
तो यह भी सम्भव नहीं है। क्योंकि तब अन्योन्याश्रयदोषका प्रसङ्ग हो
जायगा। कारण, एकाधारताकी प्रतीति होनेपर ही रूप स्पर्शका समुदाय
ही प्रतीत सकेगा और उक्त कथनानुसार जब रूप स्पर्शका समुदाय प्रतीत
हो लेगा तभी एकाधारताकी प्रतीति होगी, इस प्रकार अन्योन्याश्रयदोष हो
जाता है। साथ ही अनवस्थादोषका भी प्रसङ्ग हो जाता है। क्योंकि
जिस प्रकार भूतलात्मक एक आधारके कारण आधेयभूत घटको रूप
स्पर्शादिका समुदायात्मक सिद्ध करते हो, उसी प्रकार भूतलको भी रूप
स्पर्शादिका एक समुदाय मानते हो, सो किस आधारको लेकर वह (भूतल)