आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयाथार्थ्यभङ्गवाद २०७
विषयोपधानमात्रं प्रामाण्यम्, तदाभाससाधारण्यात्, अपि
स्त्वनुभवस्य सतो भूतार्थानुसन्धानम् । न चार्थानुसन्धानेऽपि
तस्य भूतत्वमनुसन्धीयते, आरोपितत्वव्यावर्तकविशेषणाननु-
सन्धानात् , अननुसंहितस्य चारोपसाधारण्यात् ।
क्वचिद् विशेषोऽप्यनुसन्धीयत इति चेत् , न क्वापि प्राथ-
मिकेन । अन्यथाऽनभ्यासशायां तत्रापि संशयो न स्यात् ।
अभ्यासदशोल्पन्ने तु अनुसन्धानं व्याप्तिग्रहजनितसंस्कार-
क्योंकि ज्ञानके प्रमात्मक होनेमें विशेष्यावृत्त्यप्रकारकत्व ( विशेष्यमे
नहीं रहने वाला जो धर्म, उसका ज्ञानमें प्रकार नहीं होना ) उपाधि है ।
अतः उस उपाधिका भान हुए बिना प्रामाण्योपहित ज्ञानका भान नहीं
हो सकता है। केवल विषयका भान हो जाना ही प्रामाण्य नहीं है,
क्योंकि विषयके अभावमे भी विषयका भान हो जाया करता है।
किन्तु अनुभव होते हुए यथार्थभान होना ही प्रामाण्य है। केवल अर्थ
का (विषयका) भान होनेपर उसके वास्तविकत्वका भान तब तक
नहीं होता है, जब तक कि उसकी अवास्तविकताको दूर करने वाले
विशेषणों ( विशेष्यावृत्त्यप्रकारकत्व आदि ) का भान नहीं हो जाता ।
विशेषणका भान हुए बिना तो वह आरोपात्मक मिथ्याज्ञानके तुल्य है ।
यदि कहो कि - कहीं करतलादिज्ञानमे विशेष ( वास्तविकत्व ) भी
भासित ही हो जाता है - तो कहीं भी प्राथमिक ज्ञानके द्वारा अर्थात्
अनुव्यवसाय या ज्ञातता लिङ्गक अनुमानके द्वारा नहीं भासित होता ।
अन्यथा (प्राथमिकज्ञानसे ही यदि प्रामाण्यका भान हो तो ) अनभ्यास
दशामें ( पहले पहल ) उत्पन्न ज्ञानमें भी प्रामाण्यका संशय नहीं होना
चाहिये । अर्थात् जिस व्यक्तिको अग्निका परिचय बिल्कुल न है,
उसको किसीके कहनेपर जब अग्निज्ञान होता है, तब उसे उस ज्ञानके
प्रामाण्यका भी स्वयं ज्ञान हो जाना चाहिये । तथा उसे “यह ज्ञान
प्रमा है या अप्रमा है” ऐसा संशय नहीं होना चाहिये ।
यदि कहो कि - अभ्यासदशामें उत्पन्न जो करतलादि उसमे तो
प्रामाण्यका स्वतः ही निश्चय हो जाता है न कि प्रामाण्यका संशय होता