आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 355, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें३०६ आत्मतत्त्वविवेके
पारलौकिकव्यवहाराङ्गत्वात्¹ । शङ्कानिवर्तनेन तदप्रत्यूहं
निश्चितमेवेति चेत्, तन्निवृत्तिरेव कुतः ? प्रमाणान्तरादिति
चेत्, तदपि निश्चयफलमन्यथा वेति । अन्यथात्वे न शङ्कावि-
च्छेदो निश्चयसाध्यत्वात्तस्य । निश्चयफलत्वे तु यो मृग्यते
नासौ स्वत इति ।
स्फुरणमात्रमपि तावदस्तु स्वत इति चेत्, किं तेन ?
न चैतदपि, अननुसंहितोपाधेरुपहितप्रत्ययायोगात् । न च
तो भी प्रामाण्य नियामक हेतुके बिना "यह प्रमात्मक ही है" यह निश्चय
कैसे होगा ? और प्रामाण्य निश्चयकी ही अपेक्षा है। क्योंकि प्रामाण्य-
निश्चय ही पारलौकिक व्यवहारोंका अङ्ग है। अर्थात् लौकिक प्रवृत्ति
जैसे तैसे (प्रामाण्य सन्देहमें भी) भले ही हो जाय, किन्तु पारलौकिक
प्रवृत्ति, जो बहुत व्यय और आयाससे साध्य है, प्रामाण्य निश्चयके बिना
कैसे हो सकेगी ?
यदि कहो कि-ज्ञानग्राहक सामग्रीसे ही प्रामाण्यका ज्ञान होगा, तथा
जिस किसी प्रकारसे अप्रामाण्यशङ्काकी भी निवृत्ति हो जानेसे निर्विघ्न-
रूपसे प्रामाण्य भी निश्चित ही हो जायगा-तो बताओ, अप्रामाण्य शङ्का
की निवृत्ति ही कैसे होगी ? यदि कहो-दूसरे प्रमाणसे-तो वह शङ्का-
निवर्तक प्रमाणान्तर प्रामाण्यका निश्चय करायेगा या नहीं ? यदि नहीं
कराये तो शङ्काकी निवृत्ति भी नहीं हो सकेगी। क्योंकि प्रामाण्य-
निश्चय होनेपर ही अप्रामाण्य शङ्का निवृत्त हो सकती है। यदि तो
वह प्रमाणान्तर ज्ञान प्रामाण्यका निश्चय कराये तो स्पष्ट ही है कि
जिस प्रामाण्य निश्चयकी अपेक्षा है, वह स्वतः (ज्ञानग्राहक सामग्री,
अनुव्यवसाय या ज्ञाततालिङ्गक अनुमानसे) न होकर प्रमाणान्तरसे
होता है।
यदि कहो कि-प्रामाण्यका निश्चय न हो सकनेपर भी प्रामाण्यका
स्फुरणमात्र भी स्वतः हुआ, उतनेसे ही प्रामाण्यमें स्वतःग्राह्यत्व सिद्ध हो
गया-तो उस प्रामाण्य स्फुरणसे क्या लाभ है ? जब कि उससे निष्कम्प
प्रवृत्ति नहीं होती है। साथ ही यह स्फुरण भी नहीं हो सकता है।