आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 358, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंमवश्यनिश्चेयमभ्युपेयते । अज्ञातप्रामाण्येन कथं परप्रामाण्य-
वेदनमिति चेत्, यथा विषयसंवेदनम् ।
अस्तु तर्हि धर्मिलिङ्गद्वारिका, ताभ्यामनिश्चिताभ्याम-
ननुमानात्, तन्निश्चयस्य च प्रामाण्यनिश्चयमन्तरेणानुपपत्तेः,
द्वारा वर्तमान ज्ञानमें प्रामाण्य निश्चय कर लेनेपर पुनः उस अनुमितिमे
प्रामाण्य-निश्चय करने के लिये अनुमानान्तर करना कोई आवश्यक
नहीं है ।
यदि कहो कि—उस अनुमितिमे प्रामाण्यका ज्ञान हुए बिना उसके
द्वारा वर्तमान ज्ञानमे प्रामाण्यका कैसे निश्चय हो सकता है ? क्योंकि
जो स्वयं अप्रमाण है वह दूसरेको प्रमाण कैसे सिद्ध कर सकता है ? तो
इसका उत्तर यह है कि जिस प्रकार 'अय घट " यह व्यवसायात्मक
ज्ञान अपना प्रामाण्य निश्चय हुए बिना ही घटवस्तुका निश्चय करा देता
है, वैसे ही अनुमिति भी अपना प्रामाण्य निश्चय हुए बिना ही पक्षभूत
ज्ञानमे प्रामाण्यका निश्चय करा देती है ।
यदि कहो कि—दृष्टान्तको या फलको लेकर भले ही अनवस्था न हो
किन्तु धर्मी और लिङ्ग (हेतु) कोलेकर तो अनवस्था होगी ही ।
क्योंकि धर्मी (पक्ष) का तथा लिङ्ग (हेतु) का निश्चय हुए बिना
प्रामाण्यानुमिति नहीं हो सकती है । एवं धर्मी और लिङ्गका निश्चय
तभी होगा जबकि धर्मिविषयक और लिङ्गविषयक ज्ञानमे भी प्रामाण्य
का निश्चय हो जाय । और वह प्रामाण्य निश्चय भी न्यायमतानुसार
स्वतः न होकर अनुमानान्तरसे होगा । तथा उस अनुमानान्तरमे भी
जो पक्ष और हेतु होगा, उसके निश्चयके लिये उसके ज्ञानमें भी
प्रामाण्यका निश्चय उसे अपेक्षित होगा तथा उस प्रामाण्यके निश्चयार्थ
भी नैयायिकको पुनः अनुमानान्तरकी शरण लेनी पडेगी । इस प्रकार
पक्ष और हेतुके निश्चयको ही लेकर अनवस्थादोष पहुँच जाता है—
यह आक्षेप नहीं दे सकते । क्योंकि प्रामाण्यानुमितिमे हर जगह ज्ञान ही
पक्ष और हेतु रहता है तथा उस ज्ञानका ज्ञान अनुव्यवसायरूप है और
अनुव्यवसायमें प्रामाण्य-अप्रामाण्यका द्वैत होता ही नहीं है । अर्थात्
अनुव्यवसाय सदा प्रमाण ही होता है । अत उस अनुव्यवसायमें