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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 366, कुल 530 में से

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पृष्ठ 366

अथ गुणगुणिभेदभङ्गवादः
अस्तु तर्हि गुणगुणिनोरभेदान्नैरात्म्यम्, क्षणिकज्ञान-
मात्रपरिशेषादिति चेत्, उच्यते । अस्ति तावदिह दर्शन-
स्पर्शनाभ्यामेकार्थानुसन्धानम् । तदिदमेकैकविषयं वा स्यात् १
गुणगुणिभेदभङ्गवाद खण्डन
पूर्वपक्ष—यदि क्षणभङ्गवादके आधारपर अथवा बाह्यार्थभङ्गवादके
आधारपर नैरात्म्य नहीं हो सकता तो गुण और गुणीमे अभेदके कारण
ही नैरात्म्यकी सिद्धि हो जायेगी। अर्थात् गुणसे अतिरिक्त गुणीकी
सत्ता ही नहीं है। अतः ज्ञानरूप गुणसे भिन्न कोई गुणी भूत आत्मा
नहीं है। यही नैरात्म्यवादका अभिप्राय है। एव, स्वयंप्रकाश क्षणिक
विज्ञानोंके अलावा वेदान्तियोंके नित्यविज्ञानमें भी कोई प्रमाण नहीं है।
इसलिये क्षणिकविज्ञानको ही आत्मा कह सकते हैं। उससे अतिरिक्त
ज्ञानादिका आधारभूत आत्मा नहीं है, यह पर्यवसित हुआ।
समाधान—दर्शनक्रिया और स्पर्शनक्रियाके द्वारा एक ही वस्तुकी
उपलब्धि होती है, यह बात हम व्यवहारमें पाते हैं। जैसे, पहले देखकर
हम कहते है "यह घट है" वैसे ही बादमें छू कर भी कहते हैं कि "यह
घट है"। इससे सिद्ध होता है कि ज्ञानरूप-गुणसे भिन्न दर्शन स्पर्शन-रूप
उभयविध ज्ञानोंका आश्रयभूत एक अतिरिक्त आत्मा है। क्योंकि यदि
ज्ञान ही आत्मा होता तो वहा दो प्रकारका ज्ञान होनेसे आत्मा भी दो
होता। क्योंकि वहां एक आत्माने देखा और दूसरेने स्पर्श किया। ऐसी
स्थितिमें दूसरेके देखनेका प्रतिसन्धान दूसरेको नहीं हो सकता। अत
"जिसे मैंने देखा उसे ही मैं छू रहा हूँ" इस प्रकारका वस्तुकी एकताका
भान यहां नहीं होता। अतिरिक्त आत्मा माननेपर तो ज्ञानोंमे भेद
होनेपर भी चूँकि स्थायी आत्मा एक है, इसलिये वही दर्शनकालमें भी
था और स्पर्शनकालमें भी है। अत उसे यह प्रतिसन्धान (प्रत्यभिज्ञा)
हो सकता है कि जिसे देखा था उमे अभी छू रहा हूँ।
यह जो दर्शन-स्पर्शनरूप भिन्न क्रियाओंके द्वारा एक वस्तुका ग्रहण