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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 530 में से

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पृष्ठ 364

बाह्यार्थभङ्गवादः ३१५
काकतालीयः कस्यचिदेव विषयस्य बाधो जागरस्येति ।
एतेन बाध्यप्रबन्धोऽवस्थाविशेषः स्वप्नः, प्रबन्धबाधका-
दिर्बाध्यमानप्रबन्धान्तो जागरितमित्यपि द्रष्टव्यमित्येषा दिक् ।
तस्मात् तथ्यमेव विश्वम्, मन्दप्रयोजनत्वात्तु सत्वरैर्मु-
मुक्षुभिरुपेक्षितमिति युक्तमुत्पश्यामः ।
तर्हि नैयायिकानां जगत्परिरक्षणे कोऽयमभिनिवेशाति-
शय इति चेत्, सहसैव तदुपेक्षायां न्यायाभासावकाशे प्रमाण-
एवं, प्रायः सभी कुछ सही होना और काकतालीयन्यायसे कर्त्ता-कर्म
आदि उपकरणोंमें किसीका कभी बाध हो जाना—यह जागर-अवस्थाका
लक्षण है। यहां भी काकतालीयपद शुक्ति-रजत रज्जु-सर्प आदि भ्रमों
के अभिप्रायसे कहा।
इसी प्रकार—जिसमे कर्त्ता-कर्म आदि प्रबन्ध बाधित हों, ऐसी
विशेष अवस्था स्वप्न है। और पूर्व स्वप्नोपकरणोंका बाधक है
आदिमें जिसके, तथा भावी स्वप्नोंका प्रबन्ध बाध्यमानरूपसे है अन्तमें
जिसके, ऐसी विशेष अवस्था जागरित है—यह भी लक्षण समझना
चाहिये। इस प्रकार यह दिग्मात्र निर्देश किया गया। (किसी
किसी के मतानुसार नाडी और मनके संयोगसे उत्पन्न ज्ञान स्वप्न है
तथा उससे भिन्न ज्ञान जागर है। अथवा स्वप्नत्व मानसत्व व्याप्य
एक जाति है, ऐसे ही जागरत्व भी एक जाति-विशेष है।)
इसलिये निष्कर्ष यही हुआ कि संसार तथ्य ही है। उपनिषदभ्यास-
के द्वारा जिन्हें आत्मतत्त्वका साक्षात्कार हो गया है, ऐसे वेदान्ती तो
मोक्षकी शीघ्रतामें प्रपञ्चविचारको मन्द-प्रयोजन मानते हुए उससे
उदासीन हो गये—यह हम उचित समझते हैं। यदि पूछो कि—
नैयायिक भी मोक्षाभिलाषी हैं, फिर उनका जगत्की वास्तविकता सिद्ध
करनेमें यह विशेष आग्रह क्यों है?—तो यह आग्रह इस भयसे है कि
एक द्य एक विश्वकी उपेक्षा कर देनेपर असत् न्यायोंको अवसर मिल