आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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चाध्यक्षमेवात्र प्रमाणम्, सन्दिग्धभेदत्वात् ।
अप्रत्यक्षोपलम्भस्य नार्थदृष्टिः प्रसिध्यति, परेण परवेदने
ऽनवस्था स्यात् । न च क्रिया स्वसजातीयक्रियाकर्मभाव-
मश्नुते छिदावदिति तर्कपुरस्कारान्नैष दोष इति चेन्न—
उपलम्भापरपर्यायाया दृष्टेः सिद्धिर्निष्पत्तिर्वा स्यात् प्रती-
तिर्वा । आद्येऽनागतोपलम्भवेदनप्रसङ्गः, अनुपलब्धस्यानि-
रूपमें भासित होता है—तो उक्त अनुभव ग्राह्यज्ञानसे भिन्नरूप है ? या
ग्राह्यज्ञान ही है ? यह सन्दिग्ध होनेसे ज्ञानका स्वप्रकाशत्व भी सन्दिग्ध
ही है । अर्थात् "घटोऽयम्" इस ज्ञानसे उसका ग्राहक "जानामि"
यह ज्ञान भिन्न है, इसलिये "घटोऽयम्" इत्यादि ज्ञान स्वतोग्राह्य न
सिद्ध होकर परतोग्राह्य ही सिद्ध होता है ।
यदि कहो कि-ज्ञानका प्रत्यक्ष नहीं होनेसे अर्थदृष्टि ही (विषय-
ज्ञान ) असिद्ध हो जायगी और विषयमें प्रवृत्ति-निवृत्ति नहीं हो सकेगी ।
यदि दूसरे ज्ञानके द्वारा ज्ञानकी प्रतीति मानी जाय तो उस दूसरे ज्ञान-
की प्रतीति किसी तीसरे ज्ञानसे और तीसरेकी किसी चौथेसे, इस
प्रकार अनवस्था-दोष होनेसे वह प्रथम भी ज्ञान (घटोऽयम् इत्यादि )
सर्वथा असिद्ध हो जायगा और ज्ञानके बिना विषयकी ओर प्रवृत्ति नहीं
हो सकेगी । एवं कोई भी क्रिया अपनी सजातीय क्रियाका कर्म नहीं
होती है । जैसे, छिदाक्रियाका कर्म छिदा क्रिया नहीं होती किन्तु काष्ठ ही
कर्म होता है । क्योंकि "छिदां छिनत्ति" यह व्यवहार नहीं होता है ।
इस तर्कके आधारपर ज्ञानक्रिया भी किसी अन्य ज्ञानक्रियाका अर्थात्
अनुव्यवसायादिका कर्म नहीं हो सकेगी । इसलिये "जानामि" यह अनु-
भव ग्राह्यज्ञानसे अभिन्न ही है, ऐसा मानना चाहिये । अतः पूर्वमे जो
"जानामि" अनुभव तथा ग्राह्यज्ञानमें भेदको सन्दिग्ध बताकर दोष दिया
गया था, अर्थात् ज्ञानको परतोग्राह्य सिद्ध किया था, यह दोष नहीं है—
तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि अर्थदृष्टिका मानी है—अर्थका
उपलम्भ । अतः अर्थदृष्टिकी सिद्धिसे आपका क्या अभिप्राय है ?
अर्थोपलम्भकी उत्पत्ति या अर्थोपलम्भकी प्रतीति । प्रथम अभिप्राय