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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 530 में से

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पृष्ठ 354

बाह्यार्थभङ्गवादः ३०५
स्वयमपि स्मृत्यादिगोचरत्वाच्च। स्वकर्मत्वे साध्ये दृष्टान्तस्य
साध्यविकलतया हेतोर्विरुद्धत्वादिति।
नापि स्वग्राहकेण, विवेचनानुपपत्तेः। न हि प्रमाण-
ग्रहणं यथार्थत्वैकनियतम्, अप्रमाणेऽपि प्रमाणाभिमानात्।
अन्यथा विपर्ययज्ञानादप्रवृत्तिप्रसङ्गाच्च।
ततो यदि प्रामाण्यमापाततः स्फुरेदपि, तथापि नियम-
हेतोरभावात् प्रमाणमेवेदमिति निश्चयः कुतः ? स च मृग्यते,
इसलिये वहाँका हेतु विरुद्धनामक हेत्वाभास हो जायगा। अर्थात् यह
ज्ञान उसी ज्ञानका विषय है, क्रिया होनेसे, छिदाके समान। इस
अनुमानमें दिया गया 'क्रियात्व' हेतु साध्यके विरुद्ध है। क्योंकि कोई
भी क्रिया अपना ही कर्म (विषय) नहीं होती है। जैसे, अपने ही
कन्धेपर कोई नहीं चढ़ सकता। इसलिये ज्ञान स्वप्रकाश (स्वतोग्राह्य)
नहीं हो सकता है।
यदि कहो कि—ज्ञानका ग्राहक जो अनुव्यवसाय या ज्ञाततारूप
लिङ्ग है, उसीके द्वारा ज्ञानगत प्रामाण्यका भी ग्रहण होता है—तो यह भी
नहीं कह सकते। क्योंकि अनुव्यवसायके द्वारा अथवा ज्ञाततारूप लिङ्ग
के द्वारा ज्ञानका ग्रहण होनेपर भी "वह ज्ञान प्रमाण ही है" ऐसा
निश्चयात्मक विवेचन नहीं हो सकता है। यदि कहो कि—अनुव्यवसाय
या ज्ञाततारूप हेतुसे उत्पन्न होनेवाली अनुमिति ही ज्ञानको प्रमाके रूपमें
भासित करायेगी—तो यह कोई नियम नहीं है कि जिस ज्ञानको हम प्रमा-
रूपमे समझेंगे, वह वस्तुतः यथार्थ ही हो, क्योंकि अप्रमामे भी प्रमाका
अभिमान हो जाया करता है। यदि ऐसा न होता तो भ्रमात्मक ज्ञानसे
कभी भी प्रवृत्ति नहीं होती। अर्थात् भ्रमात्मक ज्ञानमें जब प्रमात्वका
निश्चय हो जाता है तब वहाँ प्रवृत्ति देखी जाती है। यदि अप्रमामें
प्रमात्वका अभिमान असंभव होता तो उक्त भ्रमस्थलमें प्रवृत्ति होती ही
नहीं। अतः ज्ञानग्राहक सामग्रीके द्वारा प्रामाण्यका निश्चय नहीं हो
सकता है।
यदि ज्ञानग्राहक सामग्रीसे प्रामाण्यका आपाततः स्फुरण हो भी जाय