आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवाह्यार्थभङ्गवादः २०३
स्तिरित्येव व्यवहारः कुत इति चेत्, मा भूत्, न ह्यव्यवहारा-
देव निष्पन्नस्य वस्तुनो निवृत्तिः । तथा च तन्निबन्धनोऽर्थ-
व्यवहारो दुर्वार एव१ ।
न चानवस्था, अवश्यवेद्यत्वानभ्युपगमात्, निश्चयवत् ।
अन्यथा त्वनिश्चितनिश्चयस्यार्थनिश्चयोऽपि न सिध्येत् । न
यह भले ही मत हो, उससे कोई हानि नहीं है। क्योंकि केवल अव्यव-
हारके कारण उत्पन्न वस्तुकी निवृत्ति नहीं हो जाती है। अर्थात् ज्ञानका
ज्ञान नहीं होनेसे उस ज्ञानकी उत्पत्तिमे कोई रुकावट नहीं आती तथा
अर्थज्ञान उत्पन्न होनेके बाद होनेवाले अर्थसम्बन्धी ग्रहण या परित्यागरूप
व्यवहारमें भी कोई रुकावट नहीं हो सकती है। अर्थात् अर्थसम्बन्धी
व्यवहारके लिए भी अर्थज्ञान ही अपेक्षित है न कि अर्थज्ञानकी प्रतीति ।
यदि ज्ञात ज्ञान ही अर्थसम्बन्धी व्यवहारके योग्य माना जाय तो भी
ईश्वरद्वारा ज्ञात होनेसे ही काम चल जायगा, हम लोगोंके द्वारा ज्ञानका
ज्ञात होना व्यवहारके लिये आवश्यक नहीं है।
ज्ञानको परतो ग्राह्य माननेमे जो अनवस्था दोष दिये हो, वह भी
दोष नहीं हो सकता है। क्योंकि "सभी ज्ञान अवश्य वेद्य ही हैं"
यह मैं नहीं मानता।२ एवं ज्ञानका ज्ञान हुए बिना यदि अर्थका ज्ञान
भी असिद्ध हो जाय तो निश्चयका निश्चय नहीं होनेसे अर्थका भी
निश्चय नहीं हो सकेगा। क्योंकि स्वप्रकाशवादीके मतमे भी निश्चया-
त्मक ज्ञान अपने निश्चयत्वका निश्चय नहीं करता है। अर्थात् स्थाणु-
पुरुषादिके सन्देहस्थलमे स्थाणुत्व सूचक विशेषका दर्शन होनेपर जो
निश्चयात्मक ज्ञान होता है, वह अपने निश्चयत्वका निश्चय नहीं कराता
१. इति इति २ पु०, पा०
२. यद्यपि स्वसंयुक्तसमवायरूप-प्रत्यासत्तिके रहनेसे ज्ञानके अवश्य वेद्य होनेमे
कोई बाधा नहीं है, फिर भी सुखादि-सामग्रीके बलवती होनेसे सदा
ज्ञानका ज्ञान नहीं हो सकेगा । यदि हो तो सुखादिका अनुभव ही
कभी न हो पायेगा । एव, जैसे रूपादि विशेषगुण उद्भूत और अनुद्भूत
दोनो होते हैं, वैसे ही ज्ञान भी विशेषगुण होनेके कारण उद्भूत (ज्ञात)
और अनुद्भूत (अज्ञात) दोनों ही होगा ।