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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 368, कुल 530 में से

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पृष्ठ 368

गुणगुणिभेदभङ्गवादः ३१९

नापि द्वितीयः, स हि एकदेशतया वा ? एककालतया
वा ? एककार्यतया वा ? एककारणतया वेति ?
न तावदुपादानरूपैकदेशसंभव, तयोः प्रतिनियतोपादा-
नत्वात् । संभवे वा तदेव द्रव्यमिति पर्यवसितं विवादेन ।
नाप्यधिकरणीभूतभूतलाद्याधारतया तत्संभवः, चक्षुषा ह्युपल-
भ्यमाने भूतले रूपविशेषे घटोऽपि चक्षुषैवोपलभ्यमानो रूप-
विशेषस्तदाधार इति शक्यते निश्चेतुम्, तयोरधरोत्तरभावे-
यह भी नहीं हो सकता कि—उक्त दर्शन-स्पर्शन क्रियाद्वारा एक अर्थ
के ग्रहणका अभिप्राय है "रूप और स्पर्शके समुदायका ग्रहण" अर्थात्
उक्त प्रतीतियोंमें रूप और स्पर्शका समुदाय ही विषय बन रहा है-कारण,
यहाँ रूप और स्पर्शका समुदाय बन ही नहीं सकता है । क्योंकि वह
समुदाय उपादानरूप एकदेशके कारण होगा ? या एक कालके कारण ?
या उपादेयरूप एक कार्यके कारण होगा ? अथवा एक समुदाय इसलिये
होगा कि रूप और स्पर्श दोनोंका एक ही कारण है।
इन कल्पोंमें प्रथम कल्प कि—उपादानरूप एकदेशके कारण रूप-
स्पर्शका एक समूह बन जायगा--नहीं हो सकता । क्योंकि दोनोंके
भिन्न भिन्न उपादान नियत हैं । अर्थात् तुम्हारे मतमें रूपका रूप ही
और स्पर्शका स्पर्श ही उपादान होता है, अत दोनोंका एक उपादान
असंभव है । यदि दोनोंका एक उपादान मेरे ही समान तुम्हारे मतमें
भी हो तो फिर वही गुणी द्रव्य सिद्ध हो गया । इस प्रकार गुणातिरिक्त
गुणी होनेमे विवाद ही समाप्त हो गया ।
यदि कहो कि-एक उपादानके कारण नहीं, किन्तु भूतलादिस्वरूप
एक अधिकरणके कारण रूप और स्पर्शका एक समुदाय बन जायगा--तो
यह भी नहीं संभव है । क्योंकि तुम्हारे मतमें गुणातिरिक्त गुणी नहीं
होनेसे चक्षुद्वारा उपलभ्यमान भूतल पृथक् गुणी न होकर रूपविशेष है,
और उसपर चक्षुद्वारा उपलभ्यमान घट भी पृथक् गुणी न होकर रूप-
विशेष ही है । इसप्रकार "रूपविशेषात्मक भूतलमें रूपविशेषात्मक घट
आश्रित है" इसका निश्चय चक्षुद्वारा कर सकते है, क्योंकि आश्रयाश्रयि-