आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 127, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें७८ आत्मतत्त्वविवेके
प्रलपितमेतत् , नहि नियामकमन्तरेण सम्पदं प्रति कल्पना
त्वरते विपदं प्रति तु विलम्बत इति शक्यं वक्तुम् , तथा च
निर्वह्निकमपि कूर्मरोम सधूममिति कल्पनामात्रेण विपक्षवृत्तित्वात्
धूमोऽपि नाग्निं गमयेत् ।
वास्तव्यां रूपसम्पत्तौ किमनेन काल्पनिकेन दोषेणेति चेत् ,
तर्हि वास्तव्यामसम्पत्तौ किं काल्पनिक्या तथेति समानम् ।
विरोधा विरोधौ विशेष इति चेत्, कुत एषः ? उभयोरेकत्र वस्त्व-
वस्तुत्वादन्यत्रावस्तुत्वादिति चेत् , तत् किं काल्पनिकोऽपि धूमो
कल्पना तीव्र हो जाती है, और अनिष्टके प्रति तो मन्द पड़ जायगी ।
ऐसा मानने पर "अग्निरहित भी कूर्मरोम धूमवान् है" इस व्यभिचार-
कल्पनामात्रसे ही धूम विपक्षगामी हो जायगा तथा उससे पर्वतमे अग्नि-
की अनुमिति नहीं होनी चाहिये ।
यदि कहो कि—वस्तुतः तो धूम विपक्षगामी नहीं है, अतः कल्पना-
द्वारा उसे विपक्षगामी बनानेमे क्या हानि है ? सत्त्व और क्षणि-
कत्वकी भी शशशृङ्गमे वास्तविक व्यतिरेकव्याप्ति नहीं है, तब काल्प-
निक व्यतिरेकव्याप्तिसे आपको क्या लाभ है ? इस तरह हम दोनों
समान हैं ।
यदि कहो कि—कूर्मरोम मिथ्या है और उसमें वास्तविक धूमका
रहना विरुद्ध है, किन्तु काल्पनिक कूर्मरोम या शशशृङ्गमे क्षणिकत्व
क्रमयौगपद्यका अभाव भी काल्पनिक ही रहे, तो इसमें कोई विरोध
नहीं है, यही हम दोनोंमें अन्तर है—तो बताओ, क्यों एक जगह विरोध
है और दूसरी जगह अविरोध है ?
यदि कहो कि—दोनों स्थलोंमे एक जगह तो वस्तु ( धूम ) और
अवस्तु ( कूर्मरोम ) का सम्बन्ध होनेमे विरोध है तथा दूसरी जगह
अवस्तु अवस्तुका सम्बन्ध होनेमे अविरोध है—तो क्या काल्पनिक भी
धूम वस्तुभूत ( वास्तविक ) है कि कूर्मरोमको उसके साथ विरोध
हो जाय ?