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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 530 में से

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पृष्ठ 128

क्षणभङ्गवादः ७९
वस्तुभूतो येन कूर्मरोम्णस्तेन सह विरोधः स्यात् ? क्वचिद्-
वस्तुभूत एवेति निर्धूमत्वमपि क्वचिद्वस्तुभूतमिति तेनापि विरोध
एव । तस्माद् यथा काल्पनिकी विपत्तिर्न दोषाय तथा काल्प-
निकी सम्पत्तिरपि न गुणायेति व्यतिरेकभङ्गः ।
क्षणभङ्गसिद्धौ प्रकारान्तरखण्डनम्
अस्तु तर्हि ध्रुवभावित्वेन विनाशस्याहेतुकत्वे सिद्धे¹ क्षण-
भङ्गः, न, विकल्पानुपपत्तेः । तद्धि तादात्म्यं वा, निरुपाख्यत्वं
वा, तत्कार्यत्वं वा, तद्व्यापकत्वं वा, अभावत्वमेव वेति ।
यदि कहो कि—वहाँ तो वह धूम वास्तविक ही है, अतः उस
वास्तविक धूमका अवास्तविक कूर्मरोमसे विरोध है ही—तो निर्धूमत्व
भी कहीं ( जलादिमे ) वास्तविक ही है, इस प्रकार निर्धूमत्वसे भी
कूर्मरोमको विरोध ही होगा । अर्थात् कूर्मरोममे धूमाभाव भी नहीं
रह सकेगा और उसमे धूमवत्ताका आपादन किया ही जा सकता है ।
अत जैसे, काल्पनिक व्यभिचारसे अनुमानमे कोई दोष नहीं आता
है, वैसे ही सत्त्व और क्षणिकत्वके व्यतिरेकके काल्पनिक सहचारसे
भी कोई लाभ नहीं है । इस तरह तुम्हारे सत्त्व और क्षणिकत्वमें
व्यतिरेकव्याप्तिका भङ्ग हो गया ।
क्षणभङ्गसिद्धिमें प्रकारान्तरका खण्डन
( शङ्का ) क्षणिकत्वकी सिद्धि दूसरे ही प्रकारसे की जायगी । वह
यों है—चूँकि वस्तुओंका विनाश अवश्यभावी है, इसलिए वह विनाश
बिना हेतुका ही होगा । क्योंकि जो अवश्यभावी होता है, उसमे किसी
हेतुकी अपेक्षा नहीं रहती है । इस प्रकार जब विनाश होनेमें किसी
हेतुकी अपेक्षा नहीं है, तब तो कोई भी वस्तु उत्पन्न होते ही नष्ट होती
रहेगी और क्षणिकत्व स्वतः सिद्ध हो जायगा ।
( उत्तर ) क्षणिकत्व सिद्ध करनेका उक्त प्रकार भी ठीक नहीं है ।
क्योंकि यहाँ आगे दिये जानेवाले पाँच विकल्पोंमे कोई भी सम्भव नहीं
१. ध्रुवभावित्वाद विनाशस्याहेतुकत्वेन—१ पु० पा०