आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः ७५
एवम्भूतावेव घटतदभावौ यदेकस्य परिच्छित्तिरपरस्य व्यव-
च्छित्तिरिति चेत्, न, घटवद् घटाभावस्यापि प्रामाणिकत्वानभ्यु-
पगमे स्वभाववादानवकाशात् । प्रमाणसिद्धे हि वस्तुनि स्वभाव-
वादावलम्बनं न तु स्वभाववादावलम्बनेनैव वस्तुसिद्धिरिति¹
भवतामेव तत्र तत्र जयदुन्दुभिः ।
तत् किमिदानीं स्वाभावविरहस्वभावो घटः प्रमाणानैव
सिद्धः ? तव दृष्ट्या एवमेतत्, घटो हि यादृक्तादृक्स्वभावस्तावत्
प्रमाणपथमतीर्णस्तस्य तु यदि परमार्थतोऽभावोऽपि कश्चित् स्यात्,
स्यात् परमार्थतः सोऽपि तद्विरहस्वभाव इति तथैव प्रमाणेनावे-
क्योंकि वैसा होनेपर वृक्ष सिद्ध करनेके लिये प्रवृत्त हुआ प्रमाण घड़ा
भी सिद्ध कर दे । यह अतिप्रसङ्ग हो जायगा ।
(शङ्का) और जगह भले ही न हो, तथापि घट और घटाभावका
तो यही स्वभाव है कि एकके निषेधमे दूसरेकी प्रतीति हो जाती है ।
(उत्तर) ऐसा कहना ठीक नहीं है । क्योंकि घटके समान
घटाभाव तुम्हारे मतसे प्रामाणिक वस्तु नहीं है । अतः उसमे किसी
प्रकारका स्वभाववर्णन नहीं हो सकता है, क्योंकि प्रमाणसिद्ध वस्तुमे
ही स्वभावका वर्णन किया जा सकता है, न कि स्वभाव वर्णन कर देनेसे
ही वस्तुकी सिद्धि हो जायगी । यह आपकी ही घोषणा है ।
(शङ्का) तो क्या, अब घड़ेमे अपने अभावका विरहस्वभावत्व
प्रमाणसे नहीं ही सिद्ध होगा ?
(उत्तर) हां, तुम्हारे दर्शनके अनुसार तो ऐसा ही है । क्योंकि
घड़ा तो परमाणुओंके समूहरूपमे या एक अवयवीके रूपमें प्रमाणसिद्ध
है । किन्तु उसका अभाव भी यदि कोई पारमार्थिक वस्तु हो तो घड़ा
भी वस्तुतः उस अभावका अभावरूप हो । और यह अभावाभावरूपसे
ही प्रमाण द्वारा जाना भी जाय । किन्तु आप तो ऐसा मानते नहीं ।
१. वस्तुव्यवस्थितिरिति—१ पु० पा० ।