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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 530 में से

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पृष्ठ 131

८२ आत्मतत्त्वविवेके
यो यत्राशक्तः स तदपेक्षया नास्तीति व्यवह्रियते। न हि रासभा-
पेक्षया धूमो जगति नास्ति। तत् कस्य हेतोः ? न ह्यशक्तस्य
स्वरूपं निवर्तत इति।
द्वितीये तु यदि कालान्तराधाराऽशक्तिः, कथं तदात्मिका ?
तदाधारा चेत्, तदैवासत्त्वप्रसङ्गः। कालान्तरे तु विपर्ययः।
तस्मात्—
विधिरात्माऽस्य भावस्य निषेधस्तु ततः परः।
सोऽपि चात्मेति कः प्रेतः शृण्वन्नपि न लज्जते ॥
अनिर्वचनीयवृत्तिवादखण्डनम्
अस्तु तर्हि 'भावस्वरूपातिरिक्ता निवृत्तिर्नास्ति' इति
दूसरे पक्षके अनुसार यदि उस अशक्तिको अन्य कालमे मानो तो
क्षणिकवादीके मतमे अन्य कालमें उस प्रतियोगी वस्तुके नहीं रहनेसे
वह अशक्ति प्रतियोगीस्वरूप कैसे हो सकती है ? अर्थात् प्रतियोगीका
विनाश प्रतियोगीस्वरूप ही है, यह तुम्हारा कथन गिर जाता है।
यदि कहो कि—यह अशक्ति उस प्रतियोगी वस्तुके कालमे ही है—
तो अशक्तिके कारण वह प्रतियोगी अपने सत्ताकालमें ही असत् होने
लगेगा। इस प्रकार विरोध आ जाता है। साथ ही अपने कालमे असन्
होनेपर दूसरे क्षणोमे इसके विपरीत सत् होने लगेगा।
इसलिए अस्तित्व ही इस भावपदार्थका स्वरूप है, निषेध तो इससे
भिन्न वस्तु है। अतः अस्तित्वके समान निषेध भी वस्तुका स्वरूप
है, ऐसा सुनकर कौन बुद्धिमान् लज्जित नहीं हो जायगा।
विधि स्वरूप है भावका, नहि निषेध विधिरूप।
को नहि सुन लज्जित बने, दोनोंको विधिरूप॥
अनिर्वचनीयवृत्तिवादखण्डन
(शङ्का) यदि प्रथम पक्ष सम्भव नहीं है तो धर्मकीर्तिके "भाव-
स्वरूपातिरिक्ता निवृत्तिर्नास्ति" इस वाक्यमे "सोपाख्या" शब्द जोड़-
कर द्वितीय पक्ष ही रहे। अर्थात् "भावस्वरूपातिरिक्ता सोपाख्या