आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः [८१]
मेव, नूनमनवरमिदमुक्तं यदयमेव देशान्तरकालान्तरानुपङ्गीति ।
यदि वा स्वदेशकालवत् कालान्तरदेशान्तरयोरपि नास्तिताननु-
षङ्गेऽस्तित्वप्रसङ्गः । अशक्तेः कथमस्तु ? शक्तेः सत्तालक्षणत्वा-
दिति चेत्, अथ कालान्तरकार्यं प्रति स्वकालेऽशक्तिरसत्त्वं ? किं
वा स्वकार्यमपि प्रति कालान्तरेऽशक्तिरसत्त्वम् ?
आद्ये स्वकालेऽप्यसत्त्वप्रसङ्गः, तदानीमपि तस्य ताद्रूप्यात् ।
कालान्तरकार्यं प्रत्येवमेतदिति चेत्, किमयं मन्त्रपाठः ? न हि
क्षणोंमें भी रहनेवाला वह अभाव यदि प्रतियोगी (भाव) रूप ही
हो तो निश्चय ही यह कथन भी तुम्हारे मतानुसार असंगत ही होगा ।
क्योंकि यह भाव ही देशान्तर और कालान्तरतक रहनेवाला सिद्ध
हो गया ।
यदि दूसरे देश और दूसरे क्षणोंमें भी अभावका अनुवर्तन न मानो
तो वहाँ भावका अस्तित्व सिद्ध हो जायगा ।
यदि कहो कि—दूसरे क्षणोंमें वह भाव वस्तु अर्थक्रियाके प्रति
अशक्त है, अतः उसका दूसरे क्षणोंमें अस्तित्व कैसे होगा ? क्योंकि
शक्ति ही अस्तित्वका लक्षण है—तो बताओ, अन्यकालीन कार्यके प्रति
अपने कालमें जो असमर्थता है, उसे असत्त्व मानते हो ? अथवा अपने
कार्यके प्रति भी दूसरे कालमें असमर्थताको असत्त्व कहते हो ?
प्रथम पक्षमें अपने कालमे भी वह वस्तु असत् होने लगेगी, क्योंकि
उस कालमे भी उसमें असक्ति है ही।
यदि कहो कि—अन्यकालीन कार्यकी दृष्टिसे वह अपने कालमे भी
असत् ही है—तो क्या यह मन्त्रपाठ है कि आँख मूंदकर सत्को भी
दूसरी दृष्टिसे असत् मान लिया जाय ? ऐसा व्यवहार तो कहीं नहीं होता
कि जो जिस कार्यमें अशक्त है, वह उस कार्यकी दृष्टिसे है ही नहीं ।
यह नहीं होता कि गर्दभकी दृष्टिसे धूम संसारमें है ही नही। ऐसा
क्यों होता है ? इसीलिए कि अशक्त होनेसे उसका स्वरूप नहीं
निवृत्त हो जाता है ।