आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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न पूर्वः—निषेध्यनिषेधयोरेकत्वानुपपत्तेः । उपपत्तौ वा
विश्वस्य वैश्वरूप्यानुपपत्तेः ।
ननु कालान्तरेऽर्थक्रियां * प्रत्यशक्तिरेवास्य नास्तिता, सा
च कालान्तरे समर्थेतरस्वभावत्वमेवेति चेत्, नन्वयमेव क्षण-
भङ्गस्तथा चासिद्धमसिद्धेन साधयतः कस्ते प्रतिनन्दः ? १
अपि च देशान्तरकालान्तरानुषङ्गिणस्तस्य नास्तिता यद्य-
है । जैसे—"विनाश अहेतुक है" इस कथनका क्या अभिप्राय है ?
क्या विनाश प्रतियोगीस्वरूप है ? या निरुपाख्य अर्थात् अलीक है ?
या प्रतियोगीका ही कार्य है ? या उसका व्यापक है ? अथवा अभाव-
स्वरूप ही होता हुआ प्रागभावके समान अहेतुक है ?
इनमें प्रथम विकल्प नहीं हो सकता है । क्योंकि निषेधकी जाने-
वाली वस्तु और उसका निषेध दोनों एक नहीं हो सकते हैं । यदि
परस्पर विरोधी स्वरूपवाले भी निषेध्य और निषेध एक हो जायें तो
संसारमें वही विचित्रता ही नहीं रह जायगी और गौ एवं अश्व भी एक
होने लगेंगे ।
यदि कहो कि—उत्तरकालमें अर्थक्रियाके प्रति भाववस्तुगत जो
असमर्थता है, वही उसका अभाव कहा जाता है । अर्थात् समर्थसे भिन्न
स्वभाववाला यही भाव अभाव कहा जाता है तथा उस असमर्थताको ही
भावका नाश भी कहते हैं—तो यह कथन ठीक नहीं है । क्योंकि प्रथम
क्षणमें सामर्थ्य और दूसरे क्षणमें असामर्थ्य रूप विरोधी धर्म बताकर
यदि एक ही वस्तुको दोनों क्षणोंमें भिन्न भिन्न सिद्ध करना चाहते हो, तो
यही तुम्हारा क्षणभङ्ग है और यह स्वयं असिद्ध है । एवं इस क्षणभङ्गको
सिद्ध करनेके लिये जो क्षणभेदसे सामर्थ्य और असामर्थ्यरूप प्रमाण
उपस्थित कर एक ही वस्तुको भिन्न भिन्न बताते हो, वह भी असिद्ध ही है ।
इस प्रकार असिद्धको असिद्धसे ही सिद्ध करते हुए तुम्हें कौनसा आनन्द
प्राप्त हो रहा है ?
एवं उस स्थान और उस क्षणके अतिरिक्त अन्य स्थान तथा अन्य
१. प्रतिमन्दः—१, ३ पु० पा०