आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 121, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंचदुपदेशः । न च यथा गौस्तथा गवय इतिवदुपलक्षणातिदेशः । न
चेह प्रभिन्नकमलोदरे मधूनि मधुकरः पिबतीतिवत् प्रसिद्धपदसामा-
नाधिकरण्यम् ।
तदमूः शशविषाणादिकल्पाः¹ नासत्ख्यातिरूपास्तथात्वे
कारणाभावात् मूकस्वप्नवदाम व्यावहारिकत्व²प्रसङ्गाच्च । तस्मा
दन्यथाख्यातिरूपा एवेति नैतदनुरोधे³नाप्यवस्तुनो निषेधव्यव-
हारगोचरत्वमिति ।
प्रति उस शब्दका व्यवहार नहीं किया जा सकता है। ओर यह भी
नहीं हो सकता कि प्रवृत्तिरूप व्यवहार अथवा शब्दोपदेश के बिना ही
सङ्केतका ग्रह हो जाय। अत शशविषाणशब्दका सङ्केतग्रह नहीं
हो सकता है।
क्योंकि गौमें बाधना आदि व्यवहार जैसे होता है वैसे शशशृङ्ग
पदार्थम कोई व्यवहार नहीं होता। एव “इसे अश्व कहते हैं' इसके
समान “इसे शशशृङ्ग कहते ह' ऐसा शब्दोपदेश भी नहीं होता है।
और न तो 'गो के सदृश गवय होता है' इसके समान किसी वस्तुकी
सदृशता ही शशशृङ्ग मे बतलाई जा सकती है। एव जैसे, प्रभिन्न
कमलोदरे मधूनि मधुकर पिबति' इस वाक्यमे आये मधुकरपदका
सङ्केत वह व्यक्ति आसानीसे जान जाता है, जिसे कमलका खिलना
और उसके द्वारा इसके रसका पान किया जाना आदि पहलेसे विदित
है। अर्थात् प्रसिद्ध पदोंके साहचर्यसे भी अप्रसिद्ध पदका सङ्केतग्रह
हो जाता है। किन्तु शशशृङ्गशब्द तो मधुकरशब्दके समान प्रसिद्ध
पदोंके साथ कहीं व्यवहृत होता हुआ भी नहीं पाया जाता है।
अत शशविषाण कूर्मरोम आदि प्रतीतिया असत्ख्यातिरूप नहीं
हो सकती हैं, क्योंकि वैसा होनेका कोई कारण नहीं है। यदि हो भी
सकें तो भी गूँगेके स्वप्नके समान उनका व्यवहारमें उपयोग नहीं हो
सकता है। इसलिये उक्त प्रतीतिया अन्यथाख्यातिरूप ही हैं। इस
१. कल्पना — इति युक्त पाठ ।
२ अव्यावहारिकत्व इति पाठो युक्तो भाति ।
३ न तदनुरोधेन—२ पु० पा० ।