आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः ७३
भवतु वा असत्ख्यातिस्तथापि न ततो व्यतिरेकः प्रामा-
णिकः । तथाहि कोऽयं व्यतिरेको नाम ? यद्यतो व्यतिरिच्यते
तस्य तत्राभावो वा ? तदभावस्वभावत्वं वा ? तन्न न तावत्
क्रमयौगपद्ययोः शशविषाणे अभावः प्रमाणगोचरः, वृक्षरहितभूभृत्-
कटकवत् क्रमयौगपद्यरहितस्य शशविषाणस्य प्रमाणागोचरत्वात् ।
नापि क्रमयौगपद्याभावरूपत्वं शशविषाणस्य प्रामाणिकं
घटाभाववच्छशविषाणस्य प्रमाणेनानुपलम्भात् । घटाभावोऽपि
प्रकार शशविषाणप्रतीतिके अनुरोधसे भी अवस्तुमें निषेध व्यवहार नहीं
हो सकता है ।
अथवा शशविषाण आदिकी प्रतीति असत्ख्याति ही हो तथापि उस
असद् वस्तुमें क्रमयौगपद्यका या अर्थक्रियाकारित्वरूप सत्ताका व्यतिरेक
( अभाव ) सिद्ध नहीं हो सकता है । कारण, यह व्यतिरेक क्या
वस्तु है, यह प्रश्न उठता है । क्या जो जिससे व्यतिरिक्त ( भिन्न )
है उसका उसमें अभाव व्यतिरेक है ? अर्थात् अधिकरण से भिन्न
और उसमें रहने वाला अभाव व्यतिरेक है । अथवा प्राभाकर मतके
अनुसार उसका अभावरूप दूसरेका होना ही व्यतिरेक है ? अर्थात्
भूतलादि अधिकरणसे अतिरिक्त घटाभाव कोई वस्तु नहीं है, किन्तु
अधिकरणस्वरूप ही है । इन दोनों पक्षोंमें प्रथम पक्षके अनुसार
शशशृङ्गमें क्रमयौगपद्यका अभाव अप्रामाणिक है । क्योंकि जैसे, वृक्ष-
रहित पर्वतकी तराई प्रत्यक्ष प्रमाणसे देखी जाती है, वैसे क्रमयौगपद्यसे
रहित शशशृङ्ग किसी भी प्रमाण से नहीं जाना जाता है ।
दूसरा पक्ष अर्थात् शशविषाणका क्रमयौगपद्याभावरूप होना भी
प्रामाणिक नहीं है । क्योंकि घटाभावके समान शशविषाण किसी
प्रमाणसे उपलब्ध नहीं है । अर्थात् शशविषाण क्रमयौगपद्याभावरूप
तब होता जबकि "शशविषाणे क्रमयौगपद्याभावः" ऐसी प्रतीति किसी
प्रमाणसे होती, किन्तु ऐसा होता नहीं है । घटाभाव तो यदि
अधिकरणस्वभाव भी हो तो भी "भूतले घटाभाव " यहां घटाभावकी
स्वतन्त्ररूपसे प्रतीति होती है ।