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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 530 में से

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पृष्ठ 126

च न सिद्धेति कुतस्तस्य हेतुत्वम् ? एवं प्रामाणिके शब्दे पक्षी-
कृते प्रामाणिक एव हेतुमद्भावो वक्तव्यः । न चासौ चाक्षुष-
त्वस्यास्तीति सोऽपि कथं हेतुः ? एवं कृतकत्वस्यापि वस्त्वेक-
नियतस्य धर्मस्य वास्तव एवान्वयो वक्तव्यः, वस्तुनो विपक्षाच्च
वास्तव एव व्यतिरेकः । न च तस्य तौ स्तः, तत् कथमसावपि
हेतुरिति¹ ।
प्रमाणके आधार पर हैं, वहां तो हेतुका रहना या न रहना प्रामाणिक ही
है, ऐसी व्यवस्था है। अतः काल्पनिक निरग्नि स्थान से प्रमेयत्वादि हेतु-
की व्यावृत्ति भी काल्पनिकरूपमें भले ही सिद्ध हो जाती है, तो भी अग्नि-
रहित प्रामाणिक जल ह्रदसे तो प्रमेयत्वहेतुकी व्यावृत्ति भी प्रामाणिक ही
होनी चाहिये । किन्तु वैसा तो सिद्ध नहीं है । ऐसी दशामें
“अग्निमान् प्रमेयत्वात्” इस अनुमानमें प्रमेयत्व कैसे हेतु बनेगा ?
ऐसे ही “शब्दो नित्यः चाक्षुषत्वात्” इस असिद्ध अनुमानमें भी
प्रामाणिक शब्दके पक्ष किये जानेपर उसमे हेतु की सत्ता भी
प्रामाणिक ही अपेक्षित है। किन्तु शब्दमें चाक्षुषत्व तो वस्तुतः
है नहीं, तब वह भी कैसे हेतु होगा ? इसी प्रकार
“नित्यः शब्दः कृतकत्वात्” इस विरुद्ध अनुमानमे भी तात्त्विक
कृतकत्वधर्मका सपक्षमें रहना भी तात्त्विक ही होगा और वास्तविक
विपक्षमे न रहना भी वास्तविक ही होगा। किन्तु कृतकत्व हेतुमें
उक्त बातें नहीं हैं। अर्थात् प्रकृत अनुमानमे सपक्षभूत नित्य पदार्थमें
कृतकत्वका रहना (अन्वय) और विपक्षभूत अनित्यमें न रहना
(व्यतिरेक) दोनों ही असिद्ध हैं। ऐसी दशामें वह भी कैसे हेतु हो
सकता है ? अर्थात् पूर्वोक्त व्यभिचारी, असिद्ध और विरुद्ध हेतुओंसे
अनुमितिकी आपत्ति नहीं होगी।
(उत्तर) उक्त कथन भी प्रलापमात्र है। क्योंकि जबतक कोई
नियामक न हो, यह नहीं कहा जासकता कि अपने अभीष्टकी ओर
१. नन्वित्यादिः हेतुरित्यन्तः पूर्वपक्षः ।