आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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न प्रमाणगोचर इति चेत्, न, तस्य तद्विविक्तेतरस्वभावस्यापि
प्रमाणात् एव सिद्धेः१, असिद्धौ वा तत्राप्यव्यवहार एव ।
घटस्तावत् स्वाभावविरहस्वभावः प्रमाणसिद्धः ताद्रूप्येण
कदाचिदप्यनुपलम्भात् । एतावतैव तदभावोऽपि घटविरहस्वभावः
सिद्ध इति चेन्न, घटभावस्य तदभावविरहस्वभावत्वानभ्युपगमात् ।
न चान्यस्य स्वभावे प्रमाणगोचरे तदन्योऽपि सिद्धः स्यादति-
प्रसङ्गात् ।
यदि कहो कि—शशविषाणके अप्रामाणिक होनेसे यदि उसमे
क्रमयौगपद्याभाव या तत्स्वरूपत्व न बन सके तो घटाभाव भी (बौद्धके
यहाँ) प्रामाणिक नहीं है । अर्थात् अप्रामाणिक होनेपर भी भूतलादिमे
जैसे घटाभावादिका व्यवहार होता है, वैसे अप्रामाणिक भी शश-
विषाणमे क्रमयौगपद्याभावका व्यवहार होनेमे कोई अनुपपत्ति नहीं
होगी—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि घटाभाव भी अपने से
भिन्न जो भूतलादि उससे इतर स्वभावका है, यह प्रमाणसे ही सिद्ध
है । यदि न सिद्ध हो तो उसमे (घटाभावमे) भी व्यवहार नहीं ही
होगा, क्योंकि प्रमाणसिद्ध वस्तुका ही व्यवहार होता है ।
यदि कहो कि—घट घटाभावके अभावरूपसे सिद्ध ही है, क्योंकि
उसकी कभी भी घटाभावरूपमें उपलब्धि नहीं होती है । इतनेसे ही
घटाभाव भी घटविरहरूपसे सिद्ध है । अर्थात् बौद्धमतमे स्वतन्त्र-
रूपसे घटकी प्रमिति न होनेपर भी जैसे उसमें सभी लौकिक व्यवहार
होते हैं, वैसे ही घटाभाव भी यद्यपि स्वतन्त्ररूपसे प्रमाणसिद्ध वस्तु
नहीं है, तथापि उसमे लौकिक व्यवहार हो ही सकता है—तो यह ठीक
नहीं है । क्योंकि भावभूत घट घटाभावका अभावस्वभाववाला है,
ऐसा तुम नहीं मान सकते हो । कारण, तुम्हारे मतमे अभावके अलीक
होनेसे घट भी मिथ्या होने लगेगा । साथ ही यह भी नहीं हो सकता
कि एकके प्रमाणसे सिद्ध होनेपर दूसरी वस्तु भी सिद्ध हो जाय ।
१. प्रतियोगिसद्भावस्यापि अतद्व्यावृत्तिस्वभावस्य प्रमाणसिद्धत्वादिति
दीधितिः ।