अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
इस डकैती में राम प्रसाद बिस्मिल, राजाराम भारतीय, गंगा सिंह चन्देल आदि
सम्मिलित थे। यह संयोग ही था कि राजाराम बाजपेई की नकली मूंछें छूट
गई। जब वे पकड़े गये तो पुलिस ने उनके कमरे से वैसी ही मूंछें प्राप्त
की थी।¹
3. ढकिया हमीदनगर (पुवायाँ, शाहजहाँपुर) : - शाहजहाँपुर जनपद की
पुवायाँ तहसील के सिंधौली थानान्तर्गत ग्राम-ढकिया हमीदपुर में
क्रांतिकारियों ने डकैती डाली। डकैती डालने की तिथि थी 29 सितम्बर
1918। क्रांतिकारी एक ऊँट गाड़ी पर हथियारों का बक्सा रखकर वापस आ
रहे थे। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 30 सितम्बर 1918 को दल के दो
सदस्य जलालपुर चुंकी चौकी पर ऊँट गाड़ी छोड़कर भाग गये। उक्त
बाक्स से एक 450 बोर की दोनाली राइफल, एक नली बन्दूक, 3 छः
नम्बर के रिवाल्वर, 30 कारतूस तथा दो पैकेट गोला बारूद निकला।
राजाराम बाजपेई पर उक्त डकैती में शामिल होने का आरोप लगाया गया
था।²
4. बमरौली (पीलीभीत) : - ग्राम बमरौली जो पीलीभीत के अन्तर्गत है,
के निवासी बलदेव प्रसाद के घर क्रांतिकारियों ने डकैती डाली। बलदेव
प्रसाद सूदखोरी व शक्कर की खांडसार का काम करते थे। इस डकैती में
क्रांतिकारियों के हाथ 600 रूपये नकद एवं 4000 रूपये के आभूषण हाथ
लगे थे।³ मन्मथनाथ गुप्त के अनुसार, धन का उपयोग ‘दि रिबोल्युशनरी’
नामक पर्चे के छपवाने में खर्च किया गया। क्रांतिकारियों को चुनौती देने
वाला एक ग्रामवासी क्रांतिकारियों की गोली से मारा गया।
- स्वतंत्रता आंदोलन में जनपद शाहजहाँपुर का योगदान, एन०सी०
मेहरोत्रा पृष्ठ -115 - स्वतंत्रता आंदोलन में जनपद शाहजहाँपुर का योगदान, एन०सी०
मेहरोत्रा पृष्ठ -116 - पूर्वो, एच-डब्लू-हेल, पृष्ठ-57
65
- बिचपुरी (पीलीभीत) : - 9 मार्च 1925 को टोटी नामक कुर्मी के घर
क्रांतिकारियों ने डकैती डाली। टोटी बिचपुरी जो पीलीभीत जिले के
अन्तर्गत गाँव था, वहीं का वह निवासी था। उसके पास 36 एकड़ जमीन
थी। इस डकैती में क्रांतिकारियों ने 800-900 रूपये लूट लिये। दुर्भाग्य से
इस डकैती में भी श्यामलाल नाम का एक ग्रामवासी मारा गया। मुखबिर
बनारसी लाल के अनुसार इस डकैती में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक
उल्ला खाँ, मन्मथनाथ गुप्त, राम कृष्ण खत्री, चन्द्रशेखर आजाद
सम्मिलित हुए थे। क्योंकि ये लोग शहबाजनगर स्टेशन पर एकत्र हुए थे।
इस डकैती में राम प्रसाद बिस्मिल ने कुछ पेशेवर डाकुओं को भी शामिल
किया था।¹ - द्वारकापुर (प्रतापगढ़) :- क्रांतिकारियों ने प्रतापगढ़ के द्वारकापुर गाँव
में शिवरतन वैश्य के मकान में 24 मई 1925 को डकैती डाली। इस डकैती
में ग्रामवासियों पर भी गोलियाँ चलाई गयी थी, जिससे रामसरन नाम
का एक बालक भी मारा गया था। जिसमें एक रिवाल्वर भी खो गया
था। राम प्रसाद बिस्मिल ग्राम वासियों पर गोली चलाये जाने से दुखी
और निराश थे।² यह डकैती आर्थिक दृष्टि से लाभ दायक नहीं थी।
क्रांतिकारियों पर मुकदमा भी हुआ। लेकिन जब यह ग्राम वासियों को
ज्ञात हुआ कि डाकू कोई और नही भारत के क्रांतिकारी थे तो ग्रामीणों ने
कहा-'पहले क्यों नही बताया कि आप लोग क्रांतिकारी हैं। यदि हमें
मालूम होता तो हम सेठ के लिए नहीं लड़ते। ' '
- टैरारिज्म इन इंडिया, 1917-36, गृह विभाग, भारत सरकार क्रम
संख्या बी 38/3 पृष्ठ - 79 - दे लिव्ड डैन्जरसली, मन्मथनाथ गुप्त- पृष्ठ 111
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ग्रामवासियों ने बाद में गवाही नहीं दी।$^1$ इस डकैती से निराशा ही
हाथ लगी। सुधीर विद्यार्थी ने लिखा है-'ऐसी डकैती के बाद बिस्मिल का
मन भारी बोझ से दब गया। वे सोचने लगे कि इस तरह देशवासियों को
सताना उचित नहीं है। इनसे खतरा उठाकर भी न तो दल को आर्थिक
रूप से सुदृढ़ता मिलती है और न ही दल की प्रतिष्ठा को ही लाभ होता
है। बिस्मिल इन कामों से अब थक गये थे और वे दूसरे साधनों व
तरीकों पर गम्भीरता से सोचने लगे थे, ताकि जनता के बीच क्रांतिकारियों
के कार्यों पर उंगली न उठ सके।$^2$ इस प्रकार काफी विचार-विमर्श के बाद
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की प्रान्तीय समिति ने तय किया कि
गाँव में डकैती डालने के अभियान को समाप्त किया जाय और केवल
बैंक और सरकारी सम्पत्ति ही लूटी जाय।$^3$ समिति ने यह निर्णय खास
तौर पर इसलिए लिया कि इस प्रकार की लगातार डकैतियों से क्षेत्र की
जनता राम प्रसाद बिस्मिल को पहचान लेगी। इसी समय पिस्तौल हेतु
नकद रूपयों की जरूरत थी जो जर्मन की थी और रूपये देकर कलकत्ता
से प्राप्त करना था। यह योजना गुप्त थी और यह भी था कि ऐसा मौका
हाथ से जाने नहीं दिया जा सकता, परन्तु रूपयों की बहुत कमी थी। ऐसे
समय में गाँव में डकैती डालने का विचार छोड़ा जा चुका था।$^4$ निश्चित
ही यह भी कारण था जो काकोरी काण्ड के रूप में सम्पादित हुआ। यह
सत्य था कि संघर्ष हेतु भारत के क्रांतिकारी संगठित होने लगे थे और
घटनाएँ कहीं न कहीं घटती रहती थीं।
- क्रांतिकारी रामकृष्ण खत्री से विश्वमित्र उपाध्याय की भेंटवार्ता -29 अगस्त 1982
- शहीद रोशन सिंह -सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ-23
- पूर्वो टरारिज्म इन इण्डिया, रिपोर्ट - पृष्ठ 79
- अमर शहीद अशफाक उल्ला खाँ, बनारसी दास चतुर्वेदी, पृष्ठ-128
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नेतृत्व की क्षमता वाले नेता थे रामप्रसाद बिस्मिल, योगेश चटर्जी,
शचीन्द्रनाथ सन्याल, गेंदालाल दीक्षित। शचीन्द्र नाथ सन्याल की पुस्तक
'बंदीजीवन' तो क्रांतिकारी आन्दोलन के लिए पाठ्य पुस्तक ही बन गयी
थी।¹ अक्टूबर 1924 में क्रांतिकारी युवकों का कानपुर में एक सम्मेलन
हुआ। इसके तहत 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' का गठन किया
गया। इसका उद्देश्य था सशस्त्र क्रांति के माध्यम से औपनिवेशिक सत्ता
को उखाड़ फेंकना और एक संघीय गणतंत्र 'संयुक्त राज्य भारत' की
स्थापना करना था।² इसके लिए बड़े पैमाने पर प्रचार की जरूरत थी।
नवयुवकों को अपने दल में मिलाना, प्रशिक्षित करना और हथियार जुटाने
जैसे कार्य मुख्यतः थे। इस सब कार्यों के लिए पैसे की आवश्यकता थी।
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी ने पैसा एकत्र करने के उद्देश्य से काकोरी
जैसी बड़ी घटना को सम्पादित किया। सरकारी खजाना लूटने की यह
घटना 'काकोरी काण्ड' के नाम से प्रसिद्ध है।³
9 अगस्त 1925 को उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारियों ने सहारनपुर
लखनऊ लाइन पर काकोरी जाने वाली गाड़ी को सफलता पूर्वक लूट
लिया। इस काकोरी काण्ड के अभियोग में जनता ने बहुत सी सहानुभूति
का प्रदर्शन किया। विधान परिषद में प्रस्ताव रखे गये। उनके नेता राम
प्रसाद बिस्मिल यह कहते हुए कि - 'मैं अंग्रेजी राज्य के पतन की इच्छा
करता हूँ प्रसन्नता पूर्वक फाँसी पर लटक गये।
- भारत का स्वतंत्रता संघर्ष - बिपिन चन्द्र, पृष्ठ-190
- भारत का स्वतंत्रता संघर्ष - बिपिन चन्द्र, पृष्ठ-190
- भारत का स्वतंत्रता संघर्ष - बिपिन चन्द्र, पृष्ठ-190
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रोशन लाल वंदेमातरम् गाते हुए शहीद हो गये।¹ इस लूट में
सरकारी खजाना लूटा गया था। अशफाक उल्ला खाँ, राम प्रसाद
बिस्मिल, रोशन सिंह, राजेन्द्र लाहिड़ी को फाँसी दे दी गयी। चार
क्रांतिकारियों को आजीवन कारावास की सजा देकर अंडमान भेज दिया
गया। 17 अन्य क्रांतिकारियों को भी लम्बी सजाएं हुई। चन्द्रशेखर आजाद
फरार हो गये।²
आज भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारी उन शहीदों
के रूप में याद किये जाते हैं, जिन्होंने मातृभूमि के लिए जान दे दी।
''शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही नामों निशा होगा।''
- आधुनिक भारत का इतिहास, बी०एल० ग्रोवर पृष्ठ 314
- भारत का स्वतंत्रता संघर्ष, बिपिन चन्द्र, पृष्ठ 190
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अध्याय-पाँच
अध्याय-पांच
अशफाक के क्रांतिकारी जीवन की पृष्ठभूमि :
समाजवादी विचारधारा का प्रभाव - क्रांति पथ का वरण
आज भारत देश स्वतंत्र है। हम सब स्वतंत्रता के विशाल वृक्ष की
शीतल छाया का आनन्द ले रहे हैं, उसके मधुर फलों का स्वाद ले रहे हैं।
लेकिन स्वतंत्रता का बीज बोने में तमाम देश भक्त क्रांतिकारियों के साथ
अपने रक्त से सींचने वाले अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल और
अशफाक उल्ला खाँ का स्थान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इन दोनों
क्रांतिकारियों में रेखांकित करने योग्य महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों
क्रांतिकारी होने के साथ-साथ रचनाकार भी थे, कवि थे। अशफाक और
बिस्मिल स्वतंत्रता आन्दोलन के क्रांतिकारी सिपाही ही नहीं वरन् वे कलम
के भी सिपाही थे। इनकी रचनाएं आग उगलती तो थी ही, संवेदना के
स्तर पर भी स्तरीय हुआ करती थीं। यह भी कहा जा सकता है कि दोनों
शस्त्र और शास्त्र में पारंगत थे जैसे एक माला के दो सुमन हो, एक से
बढ़कर एक सुगंध बिखेरने वाले। एक नदी के दो घाट, दोनों का पानी
एक, दिल एक, दिमाग एक, कर्म एक, धर्म एक। दोनों फाँसी पर चढ़े,
शहीद हुए, अमर हुए। राष्ट्र हित चिन्तन में दोनों का जीवन समर्पित हो
गया, धन्य हो गया।¹
अशफाक उल्ला खाँ के हृदय में मौलवी साहब की शिक्षाओं का
असर कभी गया नहीं। बाल्यकाल से ही अंग्रेजों के प्रति घृणा तो थी ही,
जिसका जिक्र पहले भी किया जा चुका है। लेकिन बाद में चलकर उनका
मानसिक रूप से समाजीकरण हो गया।
- साहित्य भारती, जुलाई-सितम्बर 1997, प्रधान सम्पादक - विनोद चन्द्र
पाण्डेय पृष्ठ 76 (लेख-जनार्दनदास)
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बाल्यकाल के बाद प्रथम विश्वयुद्ध के समय तुर्की साम्राज्य को भारी
नुकसान हुआ। तुर्की पर अंग्रेजों का अत्याचार था। तुर्की सम्राट जो
मुसलमानों का धर्म गुरु (खलीफा) हुआ करता था का पद समाप्त कर
दिया गया था, जिसके विरोध में आन्दोलन भी हुए। अशफाक तुर्की के
पतन का समाचार पढ़ते और अंग्रेजों के अत्याचार की सूचना पाते तो
बेचैन हो उठते। उस समय वे यह भी सोचते कि काश भारत पर भी
खलीफा या अफगानों का शासन हो जाता।¹
उन्हें क्या पता था कि यह उनकी अज्ञानता है। बाद में वे इस
अज्ञानता और मूर्खतापूर्ण बातों को स्वीकार करते हैं। वे लिखते हैं-‘‘जब
यूरोप की फिजा पर हिलाल के इर्द-गिर्द ईसाइयत का तूफान उठ रहा था
तब खिलाफत के झंडे को सरनगूं करने के लिए यूरोप के तसल्लीपरस्त
जमा हो रहे थे, जबकि आले उस्मान के कमजोर व नफीस बदन के चारों
तरफ ईसाई जागो जगन इकट्ठे हो रहे थे...अगर वहाँ अनवर व शकरी
दस्ते कयरस्त में तलवार लेकर मैदान में कूद पड़ते हैं, तो इधर भी अहले
दिल गर्दन में झोलियाँ डालकर दर-दर की भीख माँगते फिरते हैं और
रूपये से उनका खजाना पुर कर देते हैं। यों बाहमी उखवत और
इत्तहादे-इस्लामी की बुनियाद पड़ती है और भूला हुआ वायदा याद आता
है। खोई हुई मंजिल दिखायी देती है, भाई-भाई मिलते हैं। प्रोपेगण्डा
फैलता है, जिसका असर नौजवान मुसलमानों पर पड़ता है, कि इटली का
माल जला दिया जाता और उसके खिलाफ शोरिश पैदा की जाती, तुर्की
ख्वातीन की छुब्बुलवतनी, नौजवान तुर्की की सरफरोशिया तालिबाओं का
हिसाब, कॉलिज व स्कूल की कुर्बानियाँ एक नई स्प्रिट पैदा कर देती हैं।
- अशफाक उल्ला खाँ - भवान सिंह राणा, पृष्ठ-25
71
मेरी वालिदा जो बाकायदा तालीम हासिल किये हुए थीं, बराबर
अखबार की मुस्तकिल खरीदार बन गयी और मैं भी बराबर अखबार
पढ़ने लगा, तब मैंने जाना कि मुसलमान और भी कहीं हैं। क्योंकि उस
वक्त मैं जुगरफिया से नावाकिफ था और महज हिन्दुस्तान को ही
मुकम्मल दुनिया ख्याल करता था, जैसे मेंढ़क कुएं को तसव्वुर करता है।
चूँकि मैं पठान था और यह कौम आम तौर पर सेंटीमेंटल ख्याल की
जाती है। गो कि मैं अब ऐसा नहीं हूँ। इन ख्यालात में डूब गया और
रोजोशब इसी दुआ में रहता था कि तुर्क हिन्दुस्तान फतह कर लें और
यहाँ का बादशाह बन जाएँ तो हम खलीफये वक्त की रियाया बन जाएं
और अगर अफगानिस्तान से हुकूमत कायम कर ली तो फिर क्या है, फिर
हम भी हकदार ही हैं। अंग्रेज से नफरत पैदा हो गयी। मेरा यही ख्याल
था कि यही बालिये फसाद हैं और इनकी हुकूमत नेस्तनाबूद होनी
चाहिए।''¹
अशफाक उल्ला खाँ का यह कथन स्पष्ट करता है कि वे भावुक
खानदान के व्यक्ति हैं लेकिन खानदानी भावुकता की समझ आने पर वे
इसे त्याग देते हैं। यह त्यागना भी एक नई संवेदना को जन्म देता है,
वह है देश प्रेम की भावना और अंग्रेजों के प्रति घृणा। तुर्की के पतन से
उपजी अंग्रेजों के प्रति उनकी घृणा उनका मानसिक खाका तैयार करती
है। आगे चलकर अशफाक का वैचारिक स्तर परिपक्व होता है। अब
उनको पूर्व की भावनाओं से लाज आती है। अशफाक ने स्वीकार किया
है -'गरज यह कि मेरा उस वक्त का ख्याल आज मुझे बहुत जलील
मालूम होता है कि हम एक का हलकमे गुलामी उतारकर दूसरे की
गुलामी का जुआ अपने कंधो पर रखने में मुसर्रत सी महसूस करते हैं।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -26
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खैर वह मेरी नासमझी का जमाना था।¹ उस समय के युग को हम
धारणाओं का युग भी कह सकते हैं। हिन्दुओं में एक बात बैठ गयी थी
कि मुसलमान इस देश से प्रेम नही करते। शायद ऐसी ही धारणा
मुसलमानों के दिमाग में भी थी कि हिन्दू उन्हें इस देश का स्थाई
निवासी नही समझते हैं। निश्चित यह धारणा एक नागरिक के लिए
सोचने पर मजबूर करती है कि इतने दिनों तक साथ रहने के बाद भी
हमारी धारणाएं इतनी संकीर्ण क्यों बनी हैं? अशफाक ने स्पष्ट रूप से
स्वीकार किया है कि विचारों की परिपक्वता के पूर्व वह भी हिन्दुओं के
विरुद्ध थे। कारण हिन्दू मानसिकता ही थी, वह भी एक हिन्दू अध्यापक
की संकीर्ण मनोवृत्ति। अशफाक जब स्कूल के छात्र थे तो एक हिन्दू
अध्यापक की संकीर्ण एवं भेदभाव परक मनोवृत्ति के कारण दुखी थे।
अशफाक ने बाकायदा इसका जिक्र किया है - "चूँकि हमारे करम फरमा
एक मास्टर साहब थे। जिनका अगर मैं नाम लिखूँगा तो उन्हें मुफ्त में
शर्मिन्दगी हासिल होगी, और वह मेरे मास्टर थे। जब मैं गवर्नमेन्ट स्कूल
में पढ़ता था, वह हमेशा हिन्दू-मुस्लिम में बहुत इम्तियाज करते थे। जो मैं
अब कहूँगा कि उस्ताद का कमीनापन है और यही लोग मुल्क के असल
दुश्मन हैं। मगर आज मेरा दिल ऐसा ही कुशादा एक हिन्दू के लिए भी है
जैसा एक मुसलमान के लिए । खैर उस वक्त के लीडर अब भी इत्तिहादे
इस्लामी पर आमिल हैं। गो कि एक हद तक मैं भी उनसे इत्तिफाक करता
हूँ कि भाई समझने में कोई नुकसान नहीं है। मदद करना हमारा फर्ज है,
क्योंकि हम फैयाज मुल्क के फैयाज वाशिन्दे हैं। मगर किसी की हुकूमत
अपने ऊपर कुबूल करना हमारी पस्त हिम्मती और बद-किस्मती है। यह
किसी तरह हमारे शयानेशान नहीं।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-26
73
दुनिया में इन्कलाब का तगट्युरात कितनी तेजी से हुआ करते हैं।
कल मैं क्या था और आज मैं क्या हूँ। कल मैं तुर्की की हुकूमत अपने
ऊपर बायसेसद नाजो इफितखार और जरिए बख्शिश समझता था और
आज बदतरीन जिल्लत। आज मैं हर विदेशी हुकूमत को बुरा समझता
हूँ।'' अशफाक को अपने हिन्दू अध्यापक से शिकायत थी और संकीर्ण
विचारों से उन्हें दुख था। यही भावना उन्हें देश प्रेम की ओर ले जाती
है। भेदभाव की प्रदूषित मानसिकता को वे शत्रु समझते हैं। यही कारण
भी था हम गुलाम हुए। भेद-भाव हमारी विकास यात्रा का अवरोधक है,
यह अशफाक उल्ला जानते थे। शायद यही कारण था कि एक कट्टर
मुस्लिम परिवार के होते हुए भी अशफाक की मानसिक संरचना सामाजिक
हो सकी। सामाजिक विचारों के अंकुर फूटने लगे थे। साम्प्रदायिक एकता
के तो वे उदाहरण मात्र थे। आगे चलकर अशफाक की समझ में बढ़ोत्तरी
हुई तो पता चला कि अध्यापक ही राष्ट्र का निर्माता है। वह एक ऐसे
दिमाग में उपकरण सजाता है जहाँ रिक्त है सब कुछ और जब वही
संकीर्ण मानसिकता की बीमारी से राष्ट्र या पीढ़ी का निर्माता ग्रसित रहेगा
तो समाज का भविष्य कैसा होगा। जबकि अध्यापक को बिना किसी
भेदभाव के राष्ट्र की एकता के लिए मस्तिष्क तैयार करना चाहिए ताकि
एक सुसभ्य, सुसंस्कृत समाज बनाया जा सके। अशफाक की दृष्टि में
अध्यापक ही ऐसा प्राणी है जो सामाजिक बुराइयों को दूर कर सकता है।
यह ज्ञातव्य है कि अशफाक को युद्ध विषयक पुस्तकें पढ़ने का
बचपन से ही शौक था। आगे चलकर वे बंगाल के क्रांतिकारियों के विषय
में भी बाकायदा सुन रखे थे। वे समाचारों से अवगत होते रहते। यह भी
ज्ञातव्य है कि बंगाली क्रांतिकारी ही उ०प्र० की क्रांतिकारी गतिविधियों में
महत्वपूर्ण योगदान निभा रहे थे। अशफाक कन्हाई दत्त और खुदीराम
बोस के कार्यों से बहुत ज्यादा प्रभावित थे।
74
इन दोनों क्रांतिकारियों का पूरा असर अशफाक पर था। वे इन
क्रांतिकारियों की कहानियाँ सुनते। यही नहीं वे बंगाली बमों का भी हाल
सुनते रहते। अशफाक के हृदय में जिज्ञासा जागती कि कितना अच्छा
होता कि मैं भी ऐसा होता। उन्हें क्या पता कि वे भी उनकी तरह फाँसी
घर में कैद रहेंगे। एक दिन का समाचार है कि अशफाक स्कूल जा रहे थे
कि अचानक उन्होंने सुना कि दिल्ली में वायसराय बहादुर पर किसी ने
बम मार दिया और स्कूल बन्द हो गया। अब क्या था अशफाक की खुशी
का ठिकाना न रहा। वे बाजारों में होने वाली चर्चाएं सुनते रहते और
प्रभावित होते, प्रेरणा पाते, स्वप्न देखते कि मैं भी ऐसा काम करूँगा कि
लोग मेरे नाम की चर्चा आम बाजारों में करें। अशफाक के दिल में दबा
हुआ देशभक्ति का बीज अंकुरित होने लगा। वे देश में होने वाली
घटनाओं से परिचित होने लगे थे।
1918 में मैनपुरी षड्यंत्र की घटना जब प्रकाश में आई तो अशफाक
भला बिना सूचित हुए कैसे रह सकते थे। यही घटना अशफाक के
क्रांतिकारी अंकुरण को पल्लवित करने में सहायक बनी। मैनपुरी घटना ने
उर्वरक का काम किया। इस षड्यंत्र का भेद खुल जाने के बाद अशफाक
के स्कूल की तलाशी ली गयी, पहचान हुई और एक छात्र राजाराम
गिरफ्तार हुए। संदेह के आधार पर कुछ और छात्र पकड़े गये। बंगाल के
विद्यार्थी क्रांतिकारी संगठनों के सदस्य थे और खूब भाग लिया करते थे
लेकिन उत्तर प्रदेश के लिए यह घटना नई थी। जिस दिन स्कूल में
पुलिस पहुँची उस दिन अशफाक स्कूल देर से पहुँचे। वहाँ दहशत का
माहौल था। हर तरफ पगड़ियाँ ही नजर आ रही थी। कोई लड़का अन्दर
से बाहर नहीं निकल सकता था। हर कक्षा में पहचान हो रही थी। कोई
ऐसा छात्र नहीं था जो अपनी जान की खैर न मनाता हो। पहचान करने
वाले सरकारी गवाह पुलिस साथ लेकर आई थी।
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अशफाक अपने स्वभाव के कारण हालात पर नजर रखे हुए थे और
मामले को गहराई से जानने समझने के लिए बेचैन थे। अशफाक
खिलाड़ी थे (हाकी) और लगभग खिलाड़ियों को सभी पहचानते भी है
और खेलने वाले छात्र भी अपने अध्यापकों से बोल-बतिया लेते हैं।
अशफाक ने अपने एक अध्यापक से पूछा लेकिन वे डर के कारण कुछ
बता न सके। फिर एक स्कूली छात्र-मित्र ने अशफाक को सारा विवरण
सुनाया। वह छात्र भी देश भक्त था और भारत की बलिवेदी पर
मरने-मिटने को तैयार था। अशफाक को एक बार फिर स्वतंत्रता हेतु संघर्ष
करने की औषधि मिल गयी।
निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि मैनपुरी षड्यंत्र की
घटना ने अशफाक उल्ला खाँ को मातृभूमि का पुजारी बना दिया।
मैनपुरी षड्यंत्र से संबंधित घटना के बाद की कार्यवाहियों में से एक-दो के
वे प्रत्यक्ष दर्शक भी थे। सो ऊर्जा मिलती ही थी। अब अशफाक
क्रांतिकारी देशभक्तों को अपना आदर्श मानने लगे। अभी वे आठवीं कक्षा
के ही विद्यार्थी थे। आठवीं कक्षा की अंग्रेजी पुस्तक में सर वाल्टर स्काट
की लिखी एक कविता 'लव ऑफ कंट्री' और एक अन्य पाठ 'वीर
होरेशस' के विषय में था। अशफाक ने इन दोनों पाठों को कई बार पढ़ा।
उनकी भावनाएँ दृढ़ होती गयीं। सर वाल्टर स्काट की कविता से तो वे
इतने प्रभावित हुए कि मानो उनके तन-बदन में आग लग गई हो।
अशफाक ने लिखा है-"मेरे मास्टर साहब ने कुछ ऐसी तर्ज में इस सबक
को पढ़ाया कि तन-बदन में आग लग गई। कविता इस प्रकार थी -
" To every man upon the earth
Death cometh soon or late
Then how can a man die or better death,
Then faceing fearful odds
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For the ashes of his father
And the temples of his Gods."¹
अशफाक की भावुकता की हद इस प्रकार थी कि इस कविता को
पढ़कर वे रो पड़े। अशफाक की भावना को अध्यापक ने भी देखा। उनके
मनोभावों को अच्छी तरह समझते हुए अशफाक को श्छंतपवने र्वा जीमूतसकश
नामक पुस्तक पढ़ने को दी। इस पुस्तक का अशफाक पर गहरा असर
हुआ। बेचैन अशफाक क्रांतिकारियों से मिलने के लिये प्रयत्नशील हो
गये। उसी समय उनका सम्पर्क बनारसी लाल से हो गया। अशफाक को
क्या पता था कि बनारसी लाल पुलिस का मुखबिर है। उसके मुखबिर
होने की बात तो बाद में उन्हें मालुम हुई। राजाराम बनारसी लाल के घर
में ही रहता था। अशफाक की क्रांतिकारी आन्दोलन में गहरी रुचि देखकर
उसने राम प्रसाद बिस्मिल की चर्चा की। भ्रम में पड़े अशफाक बनारसी
को सच्चा देशभक्त और मैनपुरी षड़यंत्र का क्रांतिकारी समझने लगे थे।
बनारसी लाल अभी और मानसिक अधिकार अशफाक पर करना चाहता
था, विश्वास पात्र होने की गरज से उसने 'आनन्दमठ' नामक पुस्तक
अशफाक को पढ़कर सुनाई।²
अशफाक अभी तक हिन्दी नहीं जानते थे। अब अशफाक को यह
लगने लगा था कि अब उनकी सारी समस्याएँ हल हो जायेंगी और वे
क्रांतिकारियों की जमात में सम्मिलित हो जायेंगे, उन्हें बनारसी लाल पर
पूरा विश्वास था। देखने में बनारसी हमेशा कुछ परेशान सा रहता था।
अशफाक ने समझा कि शायद साथियों के बिछुड़ जाने के कारण मन
बैचेन हो बनारसी का।
1920 में प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति पर सभी राजनीतिक बंदियों को
क्षमा कर दिया गया, लगभग सभी कैदी रिहा कर दिये गये।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवानसिंह राणा, पृष्ठ-35
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-36
77
अभियोग के दौरान राम प्रसाद बिस्मिल फरार थे। मैनपुरी षड्यंत्र
के कैदी मुकुन्दीलाल को क्षमा नही किया गया। उन्हें पूरी सजा काटनी
पड़ी, वे 1923 में जेल से रिहा हुए। क्षमा की घोषणा होने के बाद
बिस्मिल शाहजहाँपुर आ गये। यहाँ आने पर राम प्रसाद बिस्मिल ने
समाज के बदले हुए तेवर को देखा। उनके पास कोई खड़ा भी नहीं होता
था। कोई बात भी नही करता था, पुलिस की निगाह हर जगह गड़ी
रहती थी। राम प्रसाद बिस्मिल ने लिखा है -
‘‘राजकीय घोषणा के पश्चात् जब मैं शाहजहाँपुर आया तो शहर की
अद्भुत दशा देखी। कोई पास तक खड़े होने का साहस न करता था।
जिसके पास मैं जाकर खड़ा हो जाता था, वह नमस्ते कर चल देता था।
पुलिस वालों का बड़ा प्रकोप था। प्रत्येक समय छाया की भाँति पीछे-पीछे
छिपा करती थी। इस प्रकार का जीवन कब तक व्यतीत किया जावें।’’¹
राम प्रसाद बिस्मिल को निराशा तब हुई जब ‘‘मातृवेदी’’ संगठन
बिखर गया। यह संगठन स्थानीय क्रांतिकारियों का प्राण था। इसी समय
वे साथी क्रांतिकारियों से कटु अनुभव भी प्राप्त किये। अब बिस्मिल स्वतंत्र
रूप से रेशमी कपड़ा बुनने का उद्योग चलाने लगे। अशफाक को यह पता
चला कि शाहजहाँपुर के एक क्रांतिकारी राम प्रसाद वर्मा के नाम का भी
गिरफ्तारी का वारन्ट है। राम प्रसाद बिस्मिल के प्रशंसक अशफाक की
खुशी का ठिकाना न रहा। बिस्मिल के शाहजहाँपुर आने पर अशफाक
उनसे मिलने का यत्न करने लगे और वह दिन आया-एक दिन अशफाक
राम प्रसाद बिस्मिल से मिले किन्तु यह क्या! स्कूल का एक सामान्य
मुसलमान विद्यार्थी समझकर बिस्मिल ने कोई उत्साहजनक या प्रेरणादायक
बात नहीं की।
- राम प्रसाद बिस्मिल रचनावली, सम्पादक दिनेश शर्मा, पृष्ठ-73
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वह तो अशफाक को एक सामान्य विद्यार्थी ही समझ रहे थे। उनके
उत्साह का उन्हें ज्ञान नहीं। बिना संज्ञान में लिए क्रांतिकारी बात करना
उचित भी नहीं था। इससे अशफाक निराश हुए, उन्हें दुख हुआ। परन्तु
अशफाक का उत्साह मरा नहीं था। बनारसी लाल अभी भी अशफाक के
सम्पर्क में थे। अशफाक ने बनारसी लाल से अनुरोध किया कि वह राम
प्रसाद से मिला दे। अशफाक के बड़े भाई और बिस्मिल साथ-साथ पढ़े भी
थे। भाई के सहपाठी होने के कारण बनारसी लाल ने राम प्रसाद बिस्मिल
से अशफाक को अच्छी तरह से परिचित करा दिया। अशफाक उल्ला खाँ
स्वयं लिखते हैं - "फिर मैंने बनारसी लाल से कहा कि राम प्रसाद के
पास चलो और मुझको उनसे इण्ट्रोड्यूस करा दो। क्योकि राम प्रसाद मेरे
बड़े भाई के क्लासफेलो उर्दू स्कूल में रह चुके थे और आपस में दोस्त भी
थे। मेरे भी स्कूलफेलो रह चुके थे मगर मेरे ताल्लुकात कम थे। चूँकि
राम प्रसाद शुरू से ही खासी शख्सियत रखने वाले इन्सान थे और
कसरती व होशियार तलिबेइल्म समझे जाते थे, आम तौर पर मशहूर भी
थे। मैंने ख्याल किया कि राम प्रसाद से मिलो शायद वहाँ दवा मिल
जाय और कोई तस्कीन कल्ब की सूरत निकल आये। गरज यह कि एक
दिन खन्नौत के किनारे जलसा हुआ। राम प्रसाद ने उसमें एक मुख्तसर
सा लेक्चर दिया और शुरू में यह शेर पढ़ा -
बहे बहरे फना में जल्द या रब लाश बिस्मिल की,
कि भूखी मछलियाँ है जौहरे शमशीरे कातिल की।¹
जो मुझे अब भी याद है इसे मैंने कण्डेम्ड सेल में मुलाकात के वक्त
पढ़ा था। मैंने भी कुछ कहा था। गरज कि बनारसी ने हम दोनों का
इन्ट्रोडक्शन करा दिया। गो कि इससे कब्ल भी एक दिन मैं राम प्रसाद से
मिला था।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-38
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मगर वह इतनी सर्दमेहरी से मिले थे कि मुझे बहुत दुख हुआ था।
जिसकी वह माफी अक्सर माँग लिया करते थे।'' चाहे जो हो अशफाक
का प्रयास रंग लाया और वे राम प्रसाद बिस्मिल के सम्पर्क में अच्छी
तरह आ गये।
ऐसी परिस्थितियों में किसी को भी निराशा हो सकती है। जब वह
उत्तेजना और ओज से भरा हो और मन मुताबिक बात न बने। हर
उत्साही अपने अनुसार उत्तर चाहता है। वह अपना मन ऊँचा उठाना
चाहता है। यदि देखा जाय तो राम प्रसाद बिस्मिल ने ठीक ही किया कि
वे निराशा जनक उत्तर दिये। विचारणीय यह है कि, भला वह कैसे एक
ऐसे विद्यार्थी से जो सर्वथा अपरिचित और मैनपुरी षड्यंत्र के विषय में पूछ
रहा है, राम प्रसाद निराश न करते तो क्या करते, जबकि पुलिस हाथ
धोकर पीछे पड़ी है। यह भी संदेह था कि कोई भी व्यक्ति पुलिस का
मुखबिर हो सकता है। लेकिन बाद की स्थिति पर विचार करें तो स्पष्ट
दिख जायेगा कि राम प्रसाद ने ठोंक-बजाकर इस बात का विश्वास कर
लिया कि यह अशफाक सच्चा देश भक्त है, तब उन्होंने अशफाक को
अपना अभिन्नमित्र बना लिया। अब तो दोस्ती एक प्राण हो गयी। एक
हिन्दू एक मुसलमान जिसकी मिसाल दी जाने लगी।
राम प्रसाद बिस्मिल कट्टर आर्य समाजी थे और अशफाक कट्टर
मुस्लिम परिवार के, लेकिन धार्मिकता का लबादा कही रुकावट नही बना
क्योंकि दोनों सच्चे देशभक्त थे। दो दोस्तों के बीच कभी भेद भाव की
दूषित भावना नही रही। दोनो का उद्देश्य भी था कि सामाजिक बुराइयों
को दूर किया जाय और इस प्रकार के भेदभाव को समाप्त किया जाय
और दोनों ने मुकाबला भी किया।
राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ''मुझे भली
भाँति याद है जब मैं बादशाही एलान के बाद शाहजहाँपुर आया था, तो
तुमसे स्कूल में भेट हुई थी। तुम्हारी मुझसे मिलने की बड़ी हार्दिक इच्छा
थी।
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तुमने मुझसे मैनपुरी काण्ड के सम्बन्ध में कुछ बातचीत करनी चाही
थी। मैंने वह समझकर कि एक स्कूल का मुसलमान विद्यार्थी मुझसे इस
तरह की बातचीत क्यों करता है, तुम्हारी बातों का उत्तर उपेक्षा की दृष्टि
से दिया था। तुम्हें उस समय बड़ा खेद हुआ था। तुम्हारे मुख से हार्दिक
भावों का प्रकाश हो रहा था। तुमने अपने इरादे को यों ही नहीं छोड़
दिया, अपने निश्चय पर डटे रहे। जिस प्रकार हो सका काँग्रेस में
बातचीत की। अपने इष्ट मित्रों द्वारा इस बात का विश्वास दिलाने की
कोशिश की कि तुम बनावटी आदमी नहीं, तुम्हारे दिल में मुल्क की
खिदमतकरने की ख्वाहिश थी। अन्त में तुम्हारी विजय हुई। तुम्हारी
कोशिशों ने मेरे दिल में जगह पैदा कर ली। तुम्हारे बड़े भाई मेरे उर्दू
मिडिल के सहपाठी तथा मित्र थे। यह जानकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई।
थोड़े दिनों में ही तुम मेरे छोटे भाई के समान हो गये थे, किन्तु छोटे
भाई बनकर तुम्हें संतोष न हुआ। तुम समानता के अधिकार चाहते थे,
मित्र की श्रेणी में अपनी गणना चाहते थे, वही हुआ। तुम सच्चे मित्र बन
गये। सबको आश्चर्य था कि एक कट्टर आर्य समाजी और मुसलमान का
मेल कैसा? मैं मुसलमानों की शुद्धि करता था। आर्य समाज मंदिर में
मेरा निवास था, किन्तु तुम इन बातों की किंचित मात्र चिन्ता न करते
थे। मेरे कुछ साथी तुम्हारे मुसलमान होने के कारण कुछ घृणा की दृष्टि
से देखते थे, किन्तु तुम अपने निश्चय में दृढ़ थे। मेरे साथ आर्य समाज
मंदिर में आते जाते थे। हिन्दू-मुस्लिम झगड़ा होने पर तुम्हारे मुहल्ले के
सब कोई तुम्हे खुल्लम खुल्ला गालियाँ देते थे, काफिर के नाम से पुकारते
थे, पर तुम कभी भी उनके विचारों से सहमत न हुए। सदैव हिन्दू-मुस्लिम
ऐक्य के पक्षपाती रहे। तुम एक सच्चे मुसलमान तथा सच्चे स्वदेश भक्त
थे। तुम्हें यदि जीवन में कोई विचार था, तो यही कि मुसलमानों को
खुदा अक्ल देता, कि वे हिन्दुओं के साथ मिल करके हिन्दुस्तान की
भलाई करते। जब मैं हिन्दी में कोई लेख या पुस्तक लिखता तो तुम
सदैव यही अनुरोध करते कि उर्दू में क्यों नहीं लिखते, जो मुसलमान भी
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पढ़ सके? तुमने स्वदेश-भक्ति के भावों को भलीभांति समझने के लिए
हिन्दी का अच्छा अध्ययन किया। अपने घर पर जब माता जी तथा भ्राता
जी से बातचीत करते थे, तो तुम्हारे मुँह से हिन्दी शब्द निकल जाते थे,
जिससे सबको बड़ा आश्चर्य होता था।"
राम प्रसाद बिस्मिल अशफाक के बारे में आगे लिखते हैं -
"तुम्हारी इस प्रकार की प्रवृत्ति देखकर बहुतो को संदेह होता था, कि
कही इस्लाम धर्म त्यागकर शुद्धि न करा लो। पर तुम्हारा हृदय तो किसी
प्रकार अशुद्ध न था, फिर तुम शुद्धि किस वस्तु का कराते? तुम्हारी इस
प्रकार की प्रगति ने मेरे हृदय पर पूर्ण विजय पा ली। बहुधा मित्र मण्डली
में बात छिड़ती कि कहीं मुसलमान पर विश्वास करके धोखा न खाना।
तुम्हारी जीत हुई, मुझमें तुममें कोई भेद न था। बहुधा मैंने तुमने एक
थाली में भोजन किए। मेरे हृदय से यह विचार ही जाता रहा कि
हिन्दू-मुसलमान में कोई भेद है। तुम मुझ पर अटल विश्वास तथ अगाध
प्रीति रखते थे। हाँ तुम मेरा नाम लेकर नही पुकार सकते थे। तुम मुझे
सदैव 'राम' कहा करते थे। एक समय जब तुम्हें हृदय कम्प का दौरा हुआ
था, तुम अचेत थे, तुम्हारे मुँह से बराबर 'राम' 'हाय राम' शब्द निकल
रहे थे। पास खड़े हुए भाई बांधवों को आश्चर्य हुआ कि 'राम' 'राम'
कहता है। कहते कि 'अल्लाह' 'अल्लाह' कहो, पर तुम्हारी 'राम-राम' की
रट थी। उसी समय किसी मित्र का आगमन हुआ, जो राम के भेद को
जानते थे। तुरन्त मैं बुलाया गया। मुझसे मिलने पर तुम्हें शान्ति हुई।
तब सब लोग 'राम! राम!' के भेद को समझे।
अन्त में इस प्रेम, प्रीति तथ्य मित्रता का परिणाम क्या हुआ? मेरे
विचारों के रंग में तुम भी रंग गये। तुम भी एक कट्टर क्रांतिकारी बन
गये। अब तो तुम्हारा दिन रात प्रयत्न यही था कि, कि किस प्रकार हो
मुसलमान नवयुवकों में भी क्रांतिकारी भावों का प्रवेश हो। वे भी
क्रांतिकारी आन्दोलन में सहयोग दें। जितने तुम्हारे बन्धु तथा मित्र थे सब
पर तुमने अपने विचारों का प्रभाव डालने का प्रयत्न किया। बहुधा
क्रांतिकारी सदस्यों को भी बड़ा आश्चर्य होता कि मैंने कैसे एक मुसलमान
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को क्रांतिकारी दल का प्रतिष्ठित सदस्य बना लिया। मेरे साथ तुमने जो
कार्य किये वे सराहनीय हैं। तुमने कभी भी मेरी आज्ञा की अवहेलना
नहीं की। एक आज्ञाकारी भक्त के समान मेरी आज्ञा पालन में तत्पर
रहते थे। तुम्हारा हृदय बड़ा विशाल था। तुम्हारे भाव ऊँचे थे। मुझे शान्ति
है तो यही कि तुमने संसार में मेरा मुख उज्जवल कर दिया। भारत के
इतिहास में यह घटना भी उल्लेखनीय हो गयी कि अशफाक उल्ला ने
क्रांतिकारी आन्दोलन में योगदान दिया। अपने भाई बन्धु तथा संबंधियों
के समझाने पर कुछ भी ध्यान न दिया। गिरफ्तार हो जाने पर भी अपने
विचारों में दृढ़ रहे। जैसे तुम शारीरिक बलशाली थे वैसे ही मानसिक वीर
तथा आत्मा से उच्च सिद्ध हुए। इन सबके परिणाम स्वरूप अदालत में
तुमको मेरा सहकारी (लेफ्टीनेन्ट) ठहराया गया और जज ने मुकदमें का
फैसला लिखते समय तुम्हारे गले में जयमाल (फाँसी की रस्सी) पहना
दी। प्यारे भाई, तुम्हें यह समझ कर संतोष होगा कि जिसने अपने
माता-पिता की धन-सम्पत्ति को देश सेवा में अर्पण करके उन्हें भिखारी
बना दिया, जिसने अपने सहोदर के भावी भाग्य को भी देश सेवा की भेंट
कर दिया, जिसने अपना तन-मन धन सर्वस्व मातृ सेवा में अर्पण करके
अपना अन्तिम बलिदान भी दे दिया, उसने अपने प्रिय सखा अशफाक को
भी उसी मातृभूमि की भेंट चढ़ा दिया।
'असगर' हरीम इश्क में हस्ती ही जुर्म है।
रखना कभी न पाँव यहाँ सर किये हुए।।''¹
राम प्रसाद बिस्मिल के उपरोक्त कथन से अशफाक के व्यक्तित्व को पूरी
तरह स्पष्टतः देखा जा सकता है। मुसलमानों में सबसे बड़ा दोष माना
जाता है जब कोई मुसलमान काफिर कहलाता है। काफिर धर्म से डिगने
वाला व्यक्ति होता है। अशफाक 'काफिर' शब्द सुनते हैं लेकिन यह शब्द
- राम प्रसाद बिस्मिल रचनावली, दिनेश शर्मा, पृष्ठ 101 से 103 तक
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