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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 297 में से

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पृष्ठ 109

को क्रांतिकारी दल का प्रतिष्ठित सदस्य बना लिया। मेरे साथ तुमने जो
कार्य किये वे सराहनीय हैं। तुमने कभी भी मेरी आज्ञा की अवहेलना
नहीं की। एक आज्ञाकारी भक्त के समान मेरी आज्ञा पालन में तत्पर
रहते थे। तुम्हारा हृदय बड़ा विशाल था। तुम्हारे भाव ऊँचे थे। मुझे शान्ति
है तो यही कि तुमने संसार में मेरा मुख उज्जवल कर दिया। भारत के
इतिहास में यह घटना भी उल्लेखनीय हो गयी कि अशफाक उल्ला ने
क्रांतिकारी आन्दोलन में योगदान दिया। अपने भाई बन्धु तथा संबंधियों
के समझाने पर कुछ भी ध्यान न दिया। गिरफ्तार हो जाने पर भी अपने
विचारों में दृढ़ रहे। जैसे तुम शारीरिक बलशाली थे वैसे ही मानसिक वीर
तथा आत्मा से उच्च सिद्ध हुए। इन सबके परिणाम स्वरूप अदालत में
तुमको मेरा सहकारी (लेफ्टीनेन्ट) ठहराया गया और जज ने मुकदमें का
फैसला लिखते समय तुम्हारे गले में जयमाल (फाँसी की रस्सी) पहना
दी। प्यारे भाई, तुम्हें यह समझ कर संतोष होगा कि जिसने अपने
माता-पिता की धन-सम्पत्ति को देश सेवा में अर्पण करके उन्हें भिखारी
बना दिया, जिसने अपने सहोदर के भावी भाग्य को भी देश सेवा की भेंट
कर दिया, जिसने अपना तन-मन धन सर्वस्व मातृ सेवा में अर्पण करके
अपना अन्तिम बलिदान भी दे दिया, उसने अपने प्रिय सखा अशफाक को
भी उसी मातृभूमि की भेंट चढ़ा दिया।
'असगर' हरीम इश्क में हस्ती ही जुर्म है।
रखना कभी न पाँव यहाँ सर किये हुए।।''¹
राम प्रसाद बिस्मिल के उपरोक्त कथन से अशफाक के व्यक्तित्व को पूरी
तरह स्पष्टतः देखा जा सकता है। मुसलमानों में सबसे बड़ा दोष माना
जाता है जब कोई मुसलमान काफिर कहलाता है। काफिर धर्म से डिगने
वाला व्यक्ति होता है। अशफाक 'काफिर' शब्द सुनते हैं लेकिन यह शब्द

  1. राम प्रसाद बिस्मिल रचनावली, दिनेश शर्मा, पृष्ठ 101 से 103 तक
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