अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंखैर वह मेरी नासमझी का जमाना था।¹ उस समय के युग को हम
धारणाओं का युग भी कह सकते हैं। हिन्दुओं में एक बात बैठ गयी थी
कि मुसलमान इस देश से प्रेम नही करते। शायद ऐसी ही धारणा
मुसलमानों के दिमाग में भी थी कि हिन्दू उन्हें इस देश का स्थाई
निवासी नही समझते हैं। निश्चित यह धारणा एक नागरिक के लिए
सोचने पर मजबूर करती है कि इतने दिनों तक साथ रहने के बाद भी
हमारी धारणाएं इतनी संकीर्ण क्यों बनी हैं? अशफाक ने स्पष्ट रूप से
स्वीकार किया है कि विचारों की परिपक्वता के पूर्व वह भी हिन्दुओं के
विरुद्ध थे। कारण हिन्दू मानसिकता ही थी, वह भी एक हिन्दू अध्यापक
की संकीर्ण मनोवृत्ति। अशफाक जब स्कूल के छात्र थे तो एक हिन्दू
अध्यापक की संकीर्ण एवं भेदभाव परक मनोवृत्ति के कारण दुखी थे।
अशफाक ने बाकायदा इसका जिक्र किया है - "चूँकि हमारे करम फरमा
एक मास्टर साहब थे। जिनका अगर मैं नाम लिखूँगा तो उन्हें मुफ्त में
शर्मिन्दगी हासिल होगी, और वह मेरे मास्टर थे। जब मैं गवर्नमेन्ट स्कूल
में पढ़ता था, वह हमेशा हिन्दू-मुस्लिम में बहुत इम्तियाज करते थे। जो मैं
अब कहूँगा कि उस्ताद का कमीनापन है और यही लोग मुल्क के असल
दुश्मन हैं। मगर आज मेरा दिल ऐसा ही कुशादा एक हिन्दू के लिए भी है
जैसा एक मुसलमान के लिए । खैर उस वक्त के लीडर अब भी इत्तिहादे
इस्लामी पर आमिल हैं। गो कि एक हद तक मैं भी उनसे इत्तिफाक करता
हूँ कि भाई समझने में कोई नुकसान नहीं है। मदद करना हमारा फर्ज है,
क्योंकि हम फैयाज मुल्क के फैयाज वाशिन्दे हैं। मगर किसी की हुकूमत
अपने ऊपर कुबूल करना हमारी पस्त हिम्मती और बद-किस्मती है। यह
किसी तरह हमारे शयानेशान नहीं।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-26
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