अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 102, कुल 297 में से
संदर्भ में पढ़ेंअशफाक अपने स्वभाव के कारण हालात पर नजर रखे हुए थे और
मामले को गहराई से जानने समझने के लिए बेचैन थे। अशफाक
खिलाड़ी थे (हाकी) और लगभग खिलाड़ियों को सभी पहचानते भी है
और खेलने वाले छात्र भी अपने अध्यापकों से बोल-बतिया लेते हैं।
अशफाक ने अपने एक अध्यापक से पूछा लेकिन वे डर के कारण कुछ
बता न सके। फिर एक स्कूली छात्र-मित्र ने अशफाक को सारा विवरण
सुनाया। वह छात्र भी देश भक्त था और भारत की बलिवेदी पर
मरने-मिटने को तैयार था। अशफाक को एक बार फिर स्वतंत्रता हेतु संघर्ष
करने की औषधि मिल गयी।
निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि मैनपुरी षड्यंत्र की
घटना ने अशफाक उल्ला खाँ को मातृभूमि का पुजारी बना दिया।
मैनपुरी षड्यंत्र से संबंधित घटना के बाद की कार्यवाहियों में से एक-दो के
वे प्रत्यक्ष दर्शक भी थे। सो ऊर्जा मिलती ही थी। अब अशफाक
क्रांतिकारी देशभक्तों को अपना आदर्श मानने लगे। अभी वे आठवीं कक्षा
के ही विद्यार्थी थे। आठवीं कक्षा की अंग्रेजी पुस्तक में सर वाल्टर स्काट
की लिखी एक कविता 'लव ऑफ कंट्री' और एक अन्य पाठ 'वीर
होरेशस' के विषय में था। अशफाक ने इन दोनों पाठों को कई बार पढ़ा।
उनकी भावनाएँ दृढ़ होती गयीं। सर वाल्टर स्काट की कविता से तो वे
इतने प्रभावित हुए कि मानो उनके तन-बदन में आग लग गई हो।
अशफाक ने लिखा है-"मेरे मास्टर साहब ने कुछ ऐसी तर्ज में इस सबक
को पढ़ाया कि तन-बदन में आग लग गई। कविता इस प्रकार थी -
" To every man upon the earth
Death cometh soon or late
Then how can a man die or better death,
Then faceing fearful odds
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