अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमगर वह इतनी सर्दमेहरी से मिले थे कि मुझे बहुत दुख हुआ था।
जिसकी वह माफी अक्सर माँग लिया करते थे।'' चाहे जो हो अशफाक
का प्रयास रंग लाया और वे राम प्रसाद बिस्मिल के सम्पर्क में अच्छी
तरह आ गये।
ऐसी परिस्थितियों में किसी को भी निराशा हो सकती है। जब वह
उत्तेजना और ओज से भरा हो और मन मुताबिक बात न बने। हर
उत्साही अपने अनुसार उत्तर चाहता है। वह अपना मन ऊँचा उठाना
चाहता है। यदि देखा जाय तो राम प्रसाद बिस्मिल ने ठीक ही किया कि
वे निराशा जनक उत्तर दिये। विचारणीय यह है कि, भला वह कैसे एक
ऐसे विद्यार्थी से जो सर्वथा अपरिचित और मैनपुरी षड्यंत्र के विषय में पूछ
रहा है, राम प्रसाद निराश न करते तो क्या करते, जबकि पुलिस हाथ
धोकर पीछे पड़ी है। यह भी संदेह था कि कोई भी व्यक्ति पुलिस का
मुखबिर हो सकता है। लेकिन बाद की स्थिति पर विचार करें तो स्पष्ट
दिख जायेगा कि राम प्रसाद ने ठोंक-बजाकर इस बात का विश्वास कर
लिया कि यह अशफाक सच्चा देश भक्त है, तब उन्होंने अशफाक को
अपना अभिन्नमित्र बना लिया। अब तो दोस्ती एक प्राण हो गयी। एक
हिन्दू एक मुसलमान जिसकी मिसाल दी जाने लगी।
राम प्रसाद बिस्मिल कट्टर आर्य समाजी थे और अशफाक कट्टर
मुस्लिम परिवार के, लेकिन धार्मिकता का लबादा कही रुकावट नही बना
क्योंकि दोनों सच्चे देशभक्त थे। दो दोस्तों के बीच कभी भेद भाव की
दूषित भावना नही रही। दोनो का उद्देश्य भी था कि सामाजिक बुराइयों
को दूर किया जाय और इस प्रकार के भेदभाव को समाप्त किया जाय
और दोनों ने मुकाबला भी किया।
राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ''मुझे भली
भाँति याद है जब मैं बादशाही एलान के बाद शाहजहाँपुर आया था, तो
तुमसे स्कूल में भेट हुई थी। तुम्हारी मुझसे मिलने की बड़ी हार्दिक इच्छा
थी।
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