अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
यह डाकू संगठन ग्वालियर राज्य में डाका डालने से संबंधित कार्य
में ही उलझ गया और एक दिन ऐसी ही योजना में पुलिस से मुठभेड़ हो
गयी और दल के पैंतीस सदस्य मारे गये। गेंदालाल दीक्षित बन्दी बनाकर
पकड़ लिए गये। दीक्षित जी को ग्वालियर किलें में भेज दिया। अब पं०
गेंदालाल दीक्षित को मुक्त कराने के लिए 'मातृवेदी' के सदस्य राम प्रसाद
बिस्मिल, मुकुन्दी लाल, शिवकृष्ण आदि सदस्यों ने योजना बनायी।
लेकिन अपने ही साथियों की अल्पज्ञता के कारण भेद खुल गया और
क्रांतिकारियों की धर-पकड़ शुरू हो गयी। राम प्रसाद बिस्मिल तो फरार
हो गये थे। मैनपुरी षडयंत्र के नाम से पकड़े गये सदस्यों पर मुकदमा
चला।¹
यह वही समय था जब अशफाक उल्ला खाँ शाहजहाँपुर के मिशन
स्कूल में सातवीं कक्षा के छात्र थे। षड्यंत्र के सिलसिले में गिरफ्तारियाँ
करने पुलिस मिशन स्कूल में भी जा पहुँची। सरकारी गवाह की पहचान
पर उनके स्कूल का एक छात्र राजाराम भारती भी बन्दी बनाया गया।
राजाराम उस समय दसवीं कक्षा का छात्र था। संदेह के आधार पर
दो-तीन विद्यार्थी और हिरासत में लिये गये। जिस दिन मिशन स्कूल में
षड्यंत्र के विषय में पुलिस पहुँची, वहाँ भय का वातावरण व्याप्त हो गया।
अशफाक ने इसका उल्लेख किया है-'मैं मिशन स्कूल का एक छोटे दर्जे
का तालिबे इल्म था, जबकि मैनपुरी साजिश का मुकदमा चला, हमारे
स्कूल में भी इस केस का अप्रूवर शिनाख्त की गरज से लाया गया था
और उसने दसवें दर्जे से राजाराम भारती को गिरफ्तार कराया और उस
समय वह भी हिरासत में ले लिए गये। गरज यह कि वह दिन भी अजीब
दिन था, पुलिस की लाल पगड़ियाँ स्कूल के चारों ओर दिखाई पड़ती
थीं।
- राम प्रसाद 'बिस्मिल' रचनावली, दिनेश शर्मा, पृष्ठ-160
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HRA में सक्रियता, काकोरी एक्शन एवं गिरफ्तारी का रोमांचक इतिहास
यह एक नयी बात थी कि स्कूल का तालिबेइल्म इस सूरत में
गिरफ्तार हुआ है। क्योंकि बंगाल में यह मामूली बात और आये दिन का
मामला है। मगर यू०पी० में यह बात कहाँ थी? गरज की अजीब दहशत
व खौफ स्कूल पर छाया हुआ था और हर एक लड़का अपनी जान की
खैर मनाता था। मैं उस रोज स्कूल जरा देर से गया था। कोई लड़का
अन्दर से बाहर नहीं निकल सकता था और हर दर्जे में शिनाख्त हो रही
थी। मैं भी अपने दर्जे में खामोशी से जा बैठा, मगर नफ्से मामला
मालूम करने के लिए बेचैन था, जो मेरे नेचर में था। चूंकि मैं स्कूल का
एक हाकी खेलने वाला आजाद खयाल तालिबेइल्म था, मास्टर साहब से
पूछने को झुका, मगर मास्टर साहब बताने से डरे कि एक लड़के ने कहा
राजाराम ने कहीं डाका मारा है और वह गिरफ्तार किये गये है। साथ ही
और भी लड़के गिरफ्तार हुए हैं।¹ सबसे अलग-थलग रहने वाले विद्यार्थी थे
राजाराम। अशफाक उल्ला को सहसा विश्वास ही नही हुआ था कि
राजाराम जैसे एकान्त प्रिय शान्त प्रकृति के व्यक्ति जो छात्र हैं क्रांतिकारी
भी हो सकते हैं। अशफाक ने तो पहले यही सोचा कि राजाराम ने कहीं
डाका डाला होगा। जब उनके एक साथी ने बताया कि राजाराम किसी
खुफिया सोसायटी का मेम्बर है न तो राजाराम कातिल है न डाकू। यह
सुनकर अशफाक को आश्चर्य हुआ। अशफाक ने उस मित्र में भी
क्रांतिकारी होने के गुण देखे। जब उस मित्र ने निर्भीकता से कहा कि मैं
भी देश के लिए मरने को तैयार हूँ अशफाक बहुत प्रभावित हुए। अशफाक
पर हुए प्रभाव का इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि वे इसी
समय राम प्रसाद बिस्मिल से मिलने को बेताब हो गये। बिस्मिल
शाहजहाँपुर के ही थे और वे इस समय फरार थे।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवानी सिंह राणा, पृष्ठ-33
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उनके साथ ही कई क्रांतिकारी फरार हो गये थे।¹ शाहजहाँपुर के जो
क्रांतिकारी मैनपुरी षड्यंत्र केस में सम्मिलित थे, उनका विवरण निम्नवत्
है।
फरार होने वाले व्यक्तियों में पं० कालीचरन भी थे। अशफाक की
हाकी टीम में कालीचरन खिलाड़ी के रूप में भी थे। निश्चित ही उनका
असर अशफाक पर पड़ा होगा। पं० कालीचरन के धोखे में पुलिस ने
अशफाक से भी पूछताछ की थी। पंडित कालीचरन, जानकी प्रसाद के पुत्र
थे, जो बद्रीपुर हदीश, पुवायां के निवासी थे। अशफाक के खिलाड़ी साथी
कालीचरन मिशन हाई स्कूल के छात्र थे। उन्हें पुलिस ने 18 जनवरी 1919
को गिरफ्तार किया।² जिस समय कालीचरन को गिरफ्तार किया गया वे
बरेली कालेज बरेली के छात्र थे। पुलिस ने कालीचरन पर आरोप लगाया
कि उनके कमरे से कुछ कागजात मिले जिन पर उर्दू, हिन्दी व अंग्रेजी में
सरकार विरोधी कविताएं लिखी थीं। कालीचरन के लेख की पुष्टि बरेली
कालेज के इतिहास विभाग के प्राध्यापक एस०सी० दत्त ने की। कविताओं
का मुख्य अर्थ जनता को देश के प्रति बलिदान देने हेतु प्रेरित करना था।
एक कविता उदाहरणार्थ दी जा रही है - 'प्रिय देश वासियों! निद्रात्यागो
समय कम है। प्रियवर! विलम्ब न करो। देशहित हेतु क्रांतिकारियों का
साथ दो।³ मैनपुरी काण्ड के तहत लालारामधीन को गिरफ्तार कर लिया
गया। रामधीन वस्त्र विक्रेता थे और सदर बाजार में रहते थे। लेकिन
लाला रामधीन के विरुद्ध कोई प्रमाण न होने के कारण 23 जनवरी, 1919
को छोड़ दिया गया।⁴ राम प्रसाद बिस्मिल तो फरार थे ही वे कुछ दिन
आगरा में रहे और रूप सिंह नाम रखकर डॉक्टरी भी की।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवानी सिंह राणा, पृष्ठ-34
- स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डा०एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-92
- स्वतंत्रतां आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डा०एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-92
- स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डा०एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-88
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इसके बाद वे मिनहाट में रहने लगे। खेती के साथ-साथ वे साहित्य की
रचना भी करते थे। इसी बीच बिस्मिल ने बंगला भाषा भी सीखी जो
बहुत काम आयी। उन्होंने पुस्तकों का अनुवाद भी किया (निहिलिस्ट
रहस्य, बोल शेविकों की करतूत) जो काकोरी केस में उनके विरुद्ध
दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत किया गया। शाहजहाँपुर के बिस्मिल के बाद
सबसे सक्रिय व्यक्ति देव नारायण थे जिनका उपनाम भारतीय था, छक्कन
लाल के नाम से भी जाने जाते थे। गेंदालाल के बाद मातृवेदी के नेतृत्व
की दावेदारी भी उन्होंने प्रस्तुत कर दी। देव नारायण आगरा के निवासी
थे। देवनारायण की प्रशंसा में शचीन्द्र नाथ सन्याल ने लिखा है-‘देव
नारायण बहुत गम्भीर प्रकृति के समझदार आदमी थे। लेकिन हमारे देश
का परम दुर्भाग्य है कि गम्भीर प्रकृति के समझदार व्यक्तियों ने निहायत
ही कम संख्या में भारतीय विद्रोह आन्दोलन में भाग लिया है।.... उनसे
बात-चीत करके यह तय हुआ था कि देव नारायण अपने गाँव को छोड़कर
आगरा में जाकर अपना केन्द्र स्थापित करेंगे। यदि देव नारायण ऐसा
करते तो उत्तर भारत का विप्लव आन्दोलन और भी गौरवमय रूप धारण
करता।¹
रंगीसिंह के पुत्र गंगा सिंह चन्देल जो नयागंज, थाना-परौर,
जलालाबाद के निवासी थे, मैनपुरी काण्ड में फरार रहे। गंगा सिंह का
छद्म नाम ‘रामनाथ चिरईया' था। 1 सितम्बर 1918 में मोहल्ला रंग
महला (शाहजहाँपुर) शक्ति सिंह के मकान के कमरे में विस्फोटक
पदार्थयुक्त बोतल गंगा सिंह के हाथ से फट गयी। पुलिस का आरोप था
कि 25 जून 1918 को मिशन हाई स्कूल, मैनपुरी की विज्ञान प्रयोगशाला
से तेजाब व पारा की जो बोतलें चुराई गई थी,
- स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डा०एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-93
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उसका प्रयोग गंगासिंह विस्फोटक सामग्री बनाने में करते थे।¹ शाहजहाँपुर
के राजाराम की चर्चा की जा चुकी है, जो अशफाक के प्रेरणादायक बने
थे। अशफाक ने राजाराम के विषय में लिखा भी है। यहाँ थोड़ी और
चर्चा आवश्यक जान पड़ती है। राजाराम की पुष्टि शक्ति प्रसाद (मकान
मालिक) और उनके नौकर वजीर खाँ ने की। मिशन स्कूल के हेड
मास्टर रूफस चरन के सामने राजाराम की तलाशी ली गई। पुलिस के
अनुसार निम्नलिखित आपत्तिजनक सामग्री मिली।
(क) बास्टक से एक डायरी जिसमें 17 मार्च 1917 से 18 अक्टूबर 1918 तक
की कई प्रविष्टियाँ अंग्रेजी में राजाराम की हस्तलिपि में मिली थीं।
(ख) टोपी से एक कागज
(ग) एक कागज जो उन्होंने फाड़कर फेक दिया तथा पुलिस ने उसे जोड़ा।
इसके अतिरिक्त राजाराम के कमरे से दो नकली मूँछे मिली। इसी प्रकार
की मूंछे जून 1918 में बरेली में डाली गयी डकैती के स्थान से मिली थी।
उनके कमरे में शस्त्रों के अवशेष पाये गये तथा स्वदेशी शपथ की 242
छपी प्रतियाँ मिली।²
मुखबिर सोमदेव के अनुसार राजाराम भारतीय संडा खेड़ा व परेली
की डकैती में शामिल थे। उन्होंने स्वाधीनता की प्रतियाँ शाहजहाँपुर व
दिल्ली में बेची। राजाराम बाजपेई का छद्म नाम गौतम था जबकि
राजाराम का कथन था कि वह आर्य कुमार सभा तथा सेवा समिति का
स्वयं सेवक था तथा उसकी शाखा उसने अपने ग्राम में स्थापित की।
सोमदेव के अनुसार राजाराम एक गुप्त संगठन 'मातृवेदी' के सदस्य थे।
डायरी में 'हरि' 'गणेश' व 'लक्ष्मण' नाम की चर्चा थी।
- स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डा०एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-90
- स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डा०एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-91
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यह छद्म नाम देव नारायण भारतीय, प्रताप सिंह और गोविन्द सिंह
के थे।$^1$ डायरी में 18 अक्टूबर 1917 की एक प्रविष्टि में कहा गया था-
जी०एस० (गंगा सिंह) द्वारा जीवन दान दूँगा।'' पुलिस का कहना था कि
यह गुप्त संगठन के सदस्य बनने की शपथ थी। लेकिन चतुर राजाराम
का कहना था कि उनके पिता उनकी शादी कराना चाहते थे परन्तु उन्होंने
शिक्षा पूरी न होने तक शादी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने गंगा
सिंह द्वारा मुझ पर दबाव डलवाया, अतः इन शब्दों का सम्बन्ध
'जी०एस०' द्वारा विवाह सम्बन्ध जुड़ने से था।'' डायरी के 2 मार्च 1918
की प्रविष्टि में कहा गया कि समस्त क्रांतिकारी पैम्पलेट रात में तैयार कर
लिए गये। पैम्पलेट में लिखा था - 'अंग्रेजों को मारो तथा देश को
आजाद करो। वन्दे मातरम्।''....‘‘देश भक्तों! देश की सुरक्षा हेतु शिवाजी
तथा प्रताप के समान अपनी तलवारों को म्यान से निकालो। फिरंगियों
को मारकर उनकी लाशों को बोरों में भरो। एक स्वर से कहो कि
हिन्दुस्तान आजाद है''$^2$ जो कागज राजाराम ने फाड़कर फेंका था, उनके
टुकड़ों को जब जोड़ा गया तो उससे जो शब्द बने वे इस प्रकार है-
'हमारा शरीर अंग्रेजों को मार डालने के काम आये। यह नश्वर शरीर
मातृभूमि को स्वतंत्र कराने हेतु अर्पित है। अंग्रेजों के सिर काट दो और
बता दो कि यह उनके अन्याय का परिणाम है। ऐसे थे राजाराम जो
अशफाक उल्ला खाँ के छात्र जीवन के खिलाड़ी साथी थे।
मैनपुरी षड्यंत्र का खुलासा हो जाने के बाद मुजरिम गेंदालाल
दीक्षित को ग्वालियर से मैनपुरी जेल लाया गया। पुलिस को मुखबिर
द्वारा यह सूचना मिली की मैनपुरी काण्ड में मुख्य व्यक्ति और सर्वे-सर्वा
गेंदालाल दीक्षित है।
- स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डा०एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-91
- स्वतंत्रता आन्दोलन में शाहजहाँपुर का योगदान, डा०एन०सी० मेहरोत्रा, पृष्ठ-92
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मैनपुरी जेल में दीक्षित जी को तपेदिक रोग हो गया। ग्वालियर और
मैनपुरी में उन पर मुकदमा चल रहा था। उन्हें यह ज्ञात हो गया था कि
उन्हें या तो फाँसी दे दी जायेगी या काला पानी की सजा। गेंदालाल जी
बुद्धि के तेज थे वे किसी भी आफत-विपत्ति से उबरने का मार्ग ढूँढ़ लेते
थे। इस हेतु भी उन्होंने एक युक्ति निकाली, उन्होंने कहा कि वह स्वयं
मुखबिर बनना चाहते हैं। उन्होंने पुलिस को यह भी विश्वास दिलाया कि
वह क्रांतिकारियों को पकड़वा देंगे। पुलिस प्रसन्न हो गयी कि क्रांतिकारी
दल का प्रमुख नेता मुखबिर बनना चाहता है। उन्हें जेल से निकालकर
दूसरे सरकारी गवाहों के निकट रखा गया। वहाँ सारा विवरण प्राप्त कर
रात्रि के समय सरकारी गवाह रामनारायण को लेकर वे भाग निकले।¹
रामनारायन के भाग जाने के बाद दीक्षित जी कोटा से आगरा पहुँचे और
फिर दिल्ली। वहाँ प्याऊ पर पानी पिलाने की नौकरी की लेकिन रोग तो
बढ़ता ही गया। अन्त में वे मृत्यु की गोद में समा गये। मरते समय
दीक्षित जी ने पत्नी से कहा-‘मेरा शरीर नष्ट हो जायेगा। मैं मोक्ष नहीं
चाहता, मैं तो चाहता हूँ कि बार-बार इसी भूमि में जन्म लूँ और बार-बार
इसी के लिए मरूँ। ऐसा तब तक करता रहूँ जब तक देश गुलामी की
जंजीर से न छूट जाय।² पं० गेंदालाल दीक्षित का देहावसान 21 दिसम्बर
1920 को हुआ।³ यह अमर शहीद सिर्फ अपनी यादें, अपनी संवेदनाएँ और
अपने ओजस्वी स्वर भारतीय क्रांतिकारियों के लिए छोड़कर सदैव के लिए
विदा हो गया।
- मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-94
- मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-94
- रामप्रसाद बिस्मिल रचनावली, दिनेश शर्मा, पृष्ठ-164
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मैनपुरी षड्यंत्र केस का निर्णय :- मैनपुरी षड्यंत्र केस का निर्णय
1 सितम्बर 1919 को अंग्रेज न्यायाधीश मि० किस ने सुनाया। इस निर्णय
में दम्भी लाल पांडे, सिद्ध गोपाल, गोपीनाथ को 7 वर्ष की सजा,
श्रीचन्द्रधर जौहरी को 5 वर्ष की सजा, किढ़ोरी लाल गुप्त, मुकुन्दी लाल,
राजाराम बाजपेई, मिजाजी लाल को 3 वर्ष की सजा सुनाई गयी। शिव
चरन लाल शर्मा, प्रभाकर शर्मा, फतहसिंह को जेल और दण्ड दिया गया।
ठाकुर प्रसाद, रामरतन, रामदीन, कालीचरन, शम्भु दयाल सक्सेना साक्ष्य
के अभाव में छोड़ दिये गये।¹ निश्चित ही मैनपुरी काण्ड का प्रभाव
अशफाक उल्ला खाँ पर इतना पड़ा कि उनका जीवन ही बदल गया। वे
आम नागरिकों से ऊपर उठ गये।
मैनपुरी षड्यंत्र के क्रांतिकारियों के गीत :-
गीतों, कविताओं ने ऊर्जायुक्त होने में काफी सहयोग दिया है, यही
कारण है कि क्रांतिकारी इनसे प्रेरणा पाने एवं समर्पित होने का उत्साह
पाते एवं तैयार होते। निश्चित एक लय ही ऐसी है जो मानसिक खुराक
देती है।
- पं० गेंदालाल दीक्षित द्वारा संचालित 'शिवाजी समिति में गाया जाने वाला प्रिय
सैनिक गीत -
'उठो! उठो!! उठो!!!
'उठो! उठो!! उठो!!!
बंधन मुक्त करो मैय्या को, हे भारत के वीरो!
हे भारत के वीरो!!
नाम कमाया जो पुरखों ने, क्या हम उसे गँवायेंगे
दूध पिया है भारत माँ का, क्या हम उसे लजायेंगे
- मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ 74,75 एवं
मैनपुरी षणयंत्र केस, पत्रांक सं0 11/919-राजकीय अभिलेखागार,
लखनऊ।
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कर्मवीर बन जाओ प्यारो! हे भारत के वीरो!
बंधन मुक्त करो!...
- पं० गेंदालाल दीक्षित द्वारा गाये जाने वाले प्रिय गीत इस प्रकार हैं -
'...नौजवानों यह मौका है, उठो खुल खेलो।
और जो सर पै बला आये, खुशी से झेलो।।
देश के नाम पर, सिदके में जवानी दे दो।
फिर न मिलेंगी ये माता की दुआयें ले लो।। - क्रांतिकारियों की प्रतिज्ञा का गीत -
'है देश को स्वाधीन करना जन्म इस संसार में,
तत्पर रहूँगा मैं सदा अंग्रेज दल संहार में,
अन्याय का बदला चुकाना मुख्य मेरा धर्म है,
मद-दलन अत्याचारियों का यह प्रथम शुचिकर्म है।
अंग्रेज-रुधिर-प्रवाह में निज पितृगण तर्पण करूँ,
अंग्रेज सिर सहित भक्ति में जननि के अर्पण करूँ,
होते हमारे मात जग में पददलित होगी नहीं,
रहते करोड़ों पुत्र के जननी दुखित होगी नही,
हे ईश। भारतवर्ष में शतवार मेरा जन्म हो,
कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो,' - क्रांतिकारी शिव कृष्ण द्वारा गाया जाने वाला गीत -
'जुबां को बन्द करे या मुझे लासीर करे।
मेरे ख्याल को बेड़ी पिन्हा नहीं सकते।।
खुशी से जेल को दे या चढ़ाय शूली पर।
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यह गन मशीन तेरे अब, डरा नहीं सकते।।
आत्मा अमर है शिव जिस्म है नश्वर मेरा।
लाख यह यत्न करे, पर मिटा नहीं सकते।।¹
राम प्रसाद बिस्मिल तो खुद ही समर्थ रचनाकार थे, उनके गीत
और उनकी गजलें क्रांतिकारियों की जुबान पर चढ़ी रहती थी। कविताओं
की संवेदनात्मक यात्रा देखें तो स्पष्ट हो जायेगा कि क्रांतिकारियों के हृदय
में कितनी तड़प, टीस और बेचैनी थी, जो काव्य के माध्यम से सम्प्रेषित
होती रहती थी। अशफाक भी एक अच्छे रचनाकार थे। उ०प्र० का मैनपुरी
काण्ड भारत वर्ष के क्रांतिकारी आन्दोलन की एक विशेष कड़ी है। इस
काण्ड से अशफाक ही नहीं कई युवा क्रांतिकारियों को प्रेरणा मिली होगी।
संयुक्त प्रान्त में बनारस षड्यन्त्र के बाद यह दूसरा षड्यंत्र था। यह
षड्यंत्र अन्य षड्यन्त्रों की अपेक्षा कई विशेषताएं रखता है। इस षड्यंत्र की
पहली विशेषता बड़ी विचित्र है जो जज ने अपने फैसले में खुले शब्दों में
प्रकाशित की है - ‘‘यह बड़े दुर्भाग्य का विषय है कि शिव कृष्ण के भाग
जाने के बाद कोई भी असली नेता कचहरी में मौजूद नहीं। यदि वे लोग
कोर्ट में होते तो उन्हें सख्त से सख्त सजा दी जाती।''²
- मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-79
- राम प्रसाद बिस्मिल रचनावली, दिनेश शर्मा, पृष्ठ-160
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अध्याय-चार
अध्याय-चार
उत्तर प्रदेश में क्रांतिकारी आन्दोलन
उत्तर प्रदेश में क्रांतिकारी आन्दोलन की भूमिका महत्वपूर्ण है।
क्रांतिकारी आन्दोलन की बढ़ती लहर इस प्रान्त में भी ठहरी नहीं थी। यह
प्रदेश तीन काण्डों (षड्यन्त्रों) के द्वारा इतिहास में उल्लेखनीय स्थान प्राप्त
कर चुका है-बनारस षड्यंत्र, मैनपुरी षड्यंत्र और काकोरी काण्ड।
1899 में लार्ड कर्जन को भारत का वाइसराय नियुक्त किया गया
था। कर्जन ने राष्ट्रीय आन्दोलन को पूरी शक्ति के साथ दमन करने और
खुले नसली भेदभाव की नीति का अनुसरण किया। वायसराय कर्जन
भारतीय बुद्धिजीवियों से घृणा करता था, उसने कर के द्वारा शहरी मध्यम
वर्गों के व्यापक हिस्सों को गम्भीर नुकसान पहुँचाया। 1898 और 1904 में
भारतीय राष्ट्रीय प्रेस के खिलाफ निर्दिष्ट सरकारी गोपनीयता कानून को
अधिक व्यापक कर दिया गया।¹ कर्जन की दमनकारी नीतियों ने
उपनिवेशवाद विरोधी रुख़ों को मजबूत बनाने तथा क्रांतिकारी आन्दोलन
को बढ़ाने में ही सहायता की।
क्रांतिकारी उत्थान के कई कारण हो सकते हैं लेकिन मुख्यतः वही
कारण थे जिनसे राष्ट्रीय आन्दोलन में उग्रवाद का उदय हुआ। भेद यह
था कि क्रांतिकारी शीघ्र परिणाम चाहते थे। उदारवादी दल ने प्रेरणा को
लोकप्रिय बनाया था। उग्रवादियों ने धीमें प्रभाव की नीति को अपनाया
था² लेकिन क्रांतिकारी इन सब चीजों में विश्वास नहीं करते थे।
क्रांतिकारियों का विश्वास था कि राष्ट्रीय जीवन में जो भी उपयुक्त तत्व
हैं, उसे विदेशी सत्ता समाप्त कर देगी चाहे धार्मिक,
- भारत का इतिहास, ग्रि० कोतोस्की, कोअ० अंतोनोवा, पृष्ठ 502
- आधुनिक भारत का इतिहास, बी०एल०ग्रोवर, पृष्ठ 309
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राजनैतिक स्वतंत्रता हो या नैतिक मूल्य या भारतीय संस्कृति।¹ इसी
कारण क्रांतिकारियों का मुख्य उद्देश्य भारत भूमि को अंग्रेजी शासन से
मुक्त कराना था।
ज्ञातव्य है कि उत्तर प्रदेश का क्रांतिकारी आन्दोलन मुख्यतः बंगाल से
फैला। सर्वप्रथम इस प्रान्त में, जो शान्तिपूर्ण प्रान्त कहा जाता था,
नवम्बर 1907 के ‘स्वराज्य’ नाम से इलाहाबाद से प्रकाशित पत्र के माध्यम
से क्रांतिकारी प्रचार प्रारम्भ हुआ। संयुक्त प्रान्त (उ०प्र०) में 1908 में
शचीन्द्र नाथ सन्याल ने एक क्लब की स्थापना की। इसी क्लब के
माध्यम से क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रारम्भ हुआ। इस क्लब का नाम
अनुशीलन समिति रखा गया। दिखावे के लिए ऊपरी तौर पर समिति का
उद्देश्य मानसिक, नैतिक, शारीरिक उन्नति करना था।² यह समिति 1914
तक लगभग निष्किय रही। जब रास बिहारी बोस 1914 में बनारस पहुँचे
तब उन्होंने संयुक्त प्रान्त में क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन अपने
हाथ में ले लिया। हाँलाकि पुलिस को उनकी तलाश थी और इनाम की
भी घोषणा हो गयी थी। पुलिस को चकमा देकर सन् 1914 के अधिकांश
समय में वे बनारस रहे। उनके नेतृत्व में अनुशीलन समिति काफी सक्रिय
हो गयी। बम तैयार किये गये और बंगाल से भी काफी मात्रा में बम
प्राप्त किये गये।³ ‘अनुशीलन समिति’ संस्था खोलने का मुख्य उद्देश्य
राजद्रोह प्रचार करना था। यह समिति 1909 से 1913 तक कायम रही।
इस समिति से वे सदस्य अलग हो गये जो समिति की कार्य प्रणाली से
असहमत थे, वे नहीं चाहते थे कि अंग्रेजों से इस प्रकार मुकाबला किया
जाय। गरमदल के सदस्य भी बाद में अलग हो गये,
- आधुनिक भारत का इतिहास, बी०एल०ग्रोवर, पृष्ठ -310
- भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त पृष्ठ-83
- भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, रामगोपाल पृष्ठ -207
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इनमें शचीन्द्रनाथ सन्याल भी थे। बाद में इन लोगों ने नई समिति
बनाई। एक मुखबिर के बयान के अनुसार शचीन्द्रनाथ कलकत्ता
जाते-आते रहते थे। वहाँ से वे बम और धन प्राप्त करते थे। 1913 की
शरद ऋतु में शचीन्द्र नाथ के साथियों ने बनारस के स्कूल कालेजों में
राजद्रोहात्मक पर्चे बाँटे और डाक द्वारा दूसरी जगह भी भेजे। लोग गाँवों
में जाते थे, भाषण देते थे। भाषण के दो विषय होते थे। एक तो यह कि
अंग्रेजों को बाहर करो दूसरा यह कि अपनी हालत सुधारो। यह बात
खुल्लम-खुल्ला कही जाती थी।
वर्ष 1914 में रास बिहारी जो दिल्ली और पंजाब के षड्यंत्रों में
मशहूर हो गये थे बनारस आये और सारा नेतृत्व अपने अधिकार में ले
लिया। शचीन्द्र दल के सदस्य समय-समय पर उनसे मिलते थे। 1914 के
नवम्बर की रात जब वे एक बम की टोपी की जाँच कर रहे थे तो वह
फट गई, इससे शचीन्द्र नाथ और रास बिहारी को चोट आ गयी।¹ इसके
बाद विष्णु गणेश पिंगले से मुलाकात हुई। पिंगले ने बताया कि 4000
आदमी विद्रोह की गरज से अमेरिका से आ चुके हैं और 2000 और आने
वाले हैं। 1915 में पिंगले और शचीन्द्रनाथ सन्याल मिले और रास बिहारी
के साथ महत्वपूर्ण सभा की। इसमें उन्होंने बतलाया कि शीघ्र ही एक
विराट विद्रोह होने वाला है और वे देश के लिए मरने को तैयार रहें। बाद
में शचीन्द्र नाथ पकड़े गये। अधिकारियों को पता चल चुका था कि
बनारस को केन्द्र मानकर संयुक्त प्रान्त, मध्य प्रदेश, पंजाब में क्रांतिकारी
गतिविधियाँ चलाई जा रही हैं, तीनों प्रान्तों की पुलिस सजग कर दी
गई।² भारत रक्षा कानून के मुताबिक बनायी गयी एक अदालत में
मुकदमा चला।
- भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्यथनाथ गुप्त पृष्ठ 85
- भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, राम गोपाल, पृष्ठ-208
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दस व्यक्तियों को लम्बी कैद की सजा हुई। शचीन्द्रनाथ सन्याल को साढ़े
बाइस साल की सजा हुई।¹ गवाहों के बयान से साबित हो गया था कि
कई बार फौजों को भड़काने की चेष्ठा की गयी, राजद्रोही परचे बाँटे गये।
पुलिस को तलाशी में निम्न वस्तुएं प्राप्त हुई -
- एक 450 छै फायर वाला रिवाल्वर
- एक टिन कारतूस
- एक ब्रीच लोडिंग राइफल
- एक दोनाली 500 एक्सप्रेस राइफल
- एक दोनाली बन्दूक
- सत्रह करौलियाँ
- बहुत से कारतूस
- एक पैकेट बारूद
- 'स्वाधीन भारत' और 'लिबर्टी' पर्चे
विनायक राव कापले जो बनारस षड्यन्त्र से सम्बन्ध रखते थे 9 फरवरी
1918 को मार डाले गये। बाद में उन्हीं से सम्बन्ध रखने वाले सुशील
लाहिड़ी पकड़े गये।
सुशील लाहिड़ी ने भी संयुक्त प्रान्त में क्रांतिकारी गतिविधियाँ
चलाने का प्रयास किया। संयुक्त प्रान्त में दूसरा बड़ा आन्दोलन जो
क्रांतिकारियों द्वारा हुआ वह था मैनपुरी काण्ड जिसकी चर्चा की जा चुकी
है। उत्तर प्रदेश में क्रांतिकारी आन्दोलन का नेतृत्व बनारस के बंगाली
क्रांतिकारियों ने किया। यह ज्ञातव्य है कि इसकी प्रेरणा से उत्तर प्रदेश के
बहुत से देश भक्त क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर आकर्षित हुए। - भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त पृष्ठ-86
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यही प्रेरणा कही न कहीं मैनपुरी षड्यंत्र की मानसिकता से भी जुड़ती है।
यह भी लगता है कि बालक अशफाक भी क्रांतिकारियों की गतिविधियों से
परिचित होते रहे होंगे। अशफाक पहले से ही अपनी माता को अखबार
पढ़ते देखा करते होंगे तो सूचना से वंचित कैसे होंगे।
मैनपुरी षड्यंत्र के प्रमुख नेता गेंदा लाल ने उ०प्र० के युवाओं में
पुनः आग सुलगा दी और सिद्ध कर दिया कि अभी युवा वर्ग सोया नही
है। षड्यंत्र की महत्वपूर्ण घटना है कि ब्रह्मचारी और गेंदालाल ने एक
धनी व्यक्ति के यहाँ डाका डालने का निश्चय किया। वह स्थान इतनी
दूर था कि एक दिन में नहीं पहुंच सकते थे। इसलिए पड़ाव डालना पड़ा।
गिरोह में 80 आदमी थे। इस गिरोह के एक भेदिया ने किसी तरह
पकड़वाने का निश्चय किया। भेदिया तो मार दिया गया लेकिन अन्य
साथी पकड़े गये। मैनपुरी षड्यंत्र उ०प्र० के क्रांतिकारी इतिहास का दूसरा
पड़ाव है जिसकी चर्चा की जा चुकी है लेकिन यह बताना भी आवश्यक है
कि चूँकि मैनपुरी षड्यंत्र में शाहजहाँपुर की भूमिका काफी रही है और
यही एक काण्ड है जिसके कारण अशफाक ने क्रांतिकारी जीवन अपनाया।
क्रांतिकारियों का एक प्रमुख कार्य यह भी था कि देश के युवाओं में
अंग्रेजों के प्रति घृणा पैदा करना और जनता को क्रांति के लिए तैयार
करना। इस हेतु क्रांतिकारी साहित्य का खूब वितरण होता था। क्रांतिकारी
सशस्त्र विद्रोह में विश्वास रखते थे और अंग्रेजों का वध करके आतंक पैदा
करना चाहते थे। लेकिन इसकी भूमिका क्रांतिकारी साहित्य से ही बनती
थी। क्रांतिकारी पर्चों को गुप्त रूप से उ०प्र० के विभिन्न नगरों में चिपका
दिया करते थे। ये पर्चे लखनऊ और दूसरे नगरों में प्रकाशित किये जाते
थे। क्रांतिकारी पर्चे का एक नमूना इस प्रकार है -
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''ओ३म्
वन्दे मातरम् वन्दे मातरम् - स्वदेशाभिमानियों को संदेश -
''वीर पुरुषों, आगे आवो और फोर्ट विलियम पर अधिकार करो। वह
कितने अंग्रेज हैं? उनको जल्दी बिन लो। प्रिय साथियों, देशवासियों, हम
सब जानते है कि जिस प्रकार भारत की सोने की चिड़िया पिछले 600
वर्षों में विदेशियों के अत्याचार से पीड़ित रही है। चार सौ वर्षों तक यवनों
ने हमारी मातृभूमि को आक्रान्त किया लेकिन उन्होंने केवल हमारे भौतिक
शरीरों को ही पीड़ित किया था, मगर अपनी सभ्यता की डींग हाँकने वाले
अंग्रेजों ने तो एक सौ साल के अन्दर हमारी सारी सम्पत्ति लूट ली और
इसे लूट कर इग्लैण्ड ले गये। उन्होंने हमारी महानता को नष्ट कर दिया
है और हमारे पुरुषों को स्त्रियों में परिवर्तित कर दिया है। हम सब उनकी
कूटनीति के शिकार बना दिये गये हैं। उन्होंने हमें झूठे प्रलोभन से ठगा
है और इस प्रकार का जाल हमारे चारों तरफ फैलाया है कि हर कदम पर
हमें इसके काँटे चुभते हैं। किसी ने सत्य ही कहा है -
अपने प्रति
''तुमने भारत के लोगों को प्रेम से आकर्षित किया
और फिर उन्हें ही मार डाला,
तुम हमारी प्रतिमा बने, तुमने हमें अपना
उपासक बनाया और फिर हमें ही मार डाला।
यह हमारी हत्या कितनी भयंकर है
तुमने हमें अपना बनाया और फिर हमें ही मार डाला।
वे जो मृत्यु के सन्निकट थे,
उन्हें बार-बार जीवित किया और फिर उन्हें मार डाला।''¹
- मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणि शुक्ल-पृष्ठ 80
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‘‘अब तक वैसे ही स्वराज्य के प्रलोभन में हमें फँसाया जा रहा है लेकिन
कोई भी देश कभी तलवार पकड़े बिना स्वतंत्र नहीं हुआ है। अब हे देश
प्रेमियों! वीर शिवाजी और प्रताप के समान अपनी तलवार उठाओ और
प्यारी भारत माता के उत्पीड़कों को पाठ पढ़ाओ। भारत के प्रत्येक स्त्री
पुरुष प्रतिज्ञा लो कि जब तक दुष्ट बेईमान, धोखेबाज और छद्मी एवं धूर्त
अंग्रेजों को, जो भारत के उत्पीड़क हैं, हम नहीं निकाल देंगे तब तक हम
प्रिय से प्रिय कार्यों को जिसमें हम संलग्न हैं, भूल जायेंगे और अपनी
सम्पूर्ण शक्तियों को हम इस कर्तव्य में लगा देंगे। उन्हें स्पष्ट समझा दो
कि अब भविष्य में हम तुम्हारी धूर्ततापूर्ण चालाकियों से प्रवंचित नहीं
होंगे। हमारा प्रमुख लक्ष्य और उद्देश्य है और हमेशा यह रहेगा कि हम
उनका सम्पूर्ण विनाश करेंगे।’’
‘‘अब सब भारतीयों को एक स्वर से घोषित करना है कि भविष्य में
हिन्दुस्तान वास्तविक हिन्दुस्तान होगा’’¹। उक्त पर्चा 1 मार्च 1918 की
रात को लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, आगरा, मथुरा, बरेली, फैजाबाद,
शाहजहाँपुर, तिलहर, पोवान, इटावा, गोंडा, मिर्जापुर, सुल्तानपुर, हरदोई
में चिपकाये गये। शिवकृष्ण, गोपीनाथ, दलपत, राम नारायण, सिद्ध
गोपाल, प्रभाकर और चन्द्रधर ने उक्त पर्चे चिपकाये। बस्ती में 2 मार्च
1918 की रात में पर्चे चिपकाये गये। ‘अंग्रेजों को मारो और स्वतंत्र बनो’
शब्दों से युक्त पर्चे मैनपुरी, मेरठ, एटा और फतेहगढ़ डाक द्वारा भेजे
गये। यह कार्य छात्र प्रभाकर ने किया।² मार्च 1918 के लगभग ‘अमेरिका
को स्वाधीनता कैसे मिली’ नामक पुस्तक का प्रकाशन लखनऊ से हुआ।
इस पुस्तक का संकलन ‘अमेरिका की स्वाधीनता का इतिहास’ नामक
पुस्तक के आधार पर देव नारायण ने किया था।
- मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-81
- मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-81
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गंगा सिंह ने अंग्रेजी उद्धरणों का इसमें समावेश किया था। इस पुस्तक
के शीर्षक पृष्ठ पर ये शब्द अंकित थे - ''हे वीर भारतीयों उठो, अस्त्र
उठाओ, अपनी तलवार खोलो और साहस के साथ आगे बढ़ो। विजय
प्राप्त करो या युद्ध क्षेत्र पर अपने जीवन का बलिदान करो। विदेशी
शासन ही अकाल और भारत की सब आपत्तियों का उत्तरदायी है।
स्वतंत्रता के लिये तलवार उठाना पाप नहीं।'' इस पर्चे में बनारस षड्यंत्र
के मुखबिरों की भी राजद्रोही कहकर भर्त्सना की गयी थी। इस पुस्तक में
उल्लेख किया गया था कि इंग्लैण्ड का तुच्छतम निवासी भी अपने को
सर्वप्रभु समझता है और हमें अपना गुलाम समझता है। इस पुस्तक का
समापन कविता से होता है, जिसका आशय है - 'हम बाग को नष्ट
करने वालों को पाठ पढ़ायेंगे... हे हत्यारे! दैनिक उत्पीड़न अच्छा नहीं है।
हमें बताओ कि तुम्हारे और हमारे बीच अन्तिम फैसला कब होगा?¹
24 दिसम्बर 1918 को उ०प्र० सरकार के आदेशानुसार यह पुस्तक जब्त
कर ली गयी। क्रांतिकारी संस्था के सदस्यों में अंग्रेजी सत्ता को समाप्त
कर देने की इतनी आग थी और तड़पन थी कि वे स्वतंत्रता की वेदी पर
मर-मिटने को तैयार रहा करते थे। उस समय की कविताओं का अर्थ यही
संकेत देता है। उदाहरण - 'हृदय में उस समय तक विश्राम नहीं लूँगा जब
तक भारत में अपना ही शासन फिर से स्थापित नही करूँगा, गौरव से
अलंकृत नही करूँगा और शत्रु से कोहनूर वापिस नहीं लूँगा। अगर मैं
इसमें असफल रहा तो अपना सिर काट लूँगा या अपने को डुबा दूँगा या
अपने को अग्नि की भेंट कर दूँगा।' कविताओं के आशय स्पष्ट रूप से
विद्रोहात्मक थे और आग उगलते शब्द जोश पैदा करते थे।
- मैनपुरी जनपद का राजनैतिक इतिहास, चिन्तामणिशुक्ल, पृष्ठ-82
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कविताएँ अण्डमान भेजने वालों और फाँसी पर लटकाने वालों की देह पर
पिघला कर शीशा डालने को कहती हैं। कहीं कुलीगीरी प्रथा का विरोध है
तो कहीं निरंकुशता से उत्पन्न हुए संत्रास, बेचैनी। क्रांतिकारियों पर विदेशी
सत्ता के गुप्तचर विभाग की कड़ी नजर रहती थी। तलाशियों,
गिरफ्तारियों का सामना करते ये क्रांतिकारी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए
सदैव भूखे रहते थे। शायद यही भूख जो कभी मिटी नहीं, अशफाक
उल्ला खाँ में भी थी।
काकोरी काण्ड के पूर्व भी कई डकैतियाँ डाली गयी थीं, जिसका
प्रभाव अशफाक पर निश्चित ही पड़ा था। खास तौर पर शाहजहाँपुर के
क्रांतिकारियों द्वारा किये गये कार्यों का असर तो अशफाक पर पड़ना ही
था।
- खंडा खेला (तिलहर थाना निगोही): - जून 1918 के तीसरे सप्ताह का
वह दिन डकैती के लिए क्रांतिकारियों ने नियुक्त कर रखा था। इस दिन
क्रांतिकारी खंडा खेड़ा ग्राम के प्रमुख के घर डाका डालने हेतु गये। इस
गाँव में एक बारात आयी थी। घर में प्रवेश की युक्ति नहीं सूझी। देर
होने पर ग्रामवासी सतर्क हो गये और क्रांतिकारियों को बिना कार्य
सम्पन्न किये वापस आना पड़ा।¹ - परेली (शाहाबाद, हरदोई) :- क्रांतिकारियों ने 23 जून 1918 को हरदोई
के शाहाबाद नामक थाने के अन्तर्गत परेली में एक विधवा ब्राह्मणी के घर
डाका डाला। यह विधवा ब्राह्मणी क्रांतिकारी राजाराम बाजपेई की मौसी
थी। राजाराम ने ही उस विधवा के कंधे पर छूरा रखा और चाभियाँ प्राप्त
की। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार डकैती में क्रांतिकारियों ने दस हजार
रूपये लूटे। - स्वतंत्रता आदोलन में जनपद शाहजहाँपुर का योगदान, एन०सी०
मेहरोत्रा पृष्ठ -115
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