अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 103, कुल 297 में से
संदर्भ में पढ़ेंFor the ashes of his father
And the temples of his Gods."¹
अशफाक की भावुकता की हद इस प्रकार थी कि इस कविता को
पढ़कर वे रो पड़े। अशफाक की भावना को अध्यापक ने भी देखा। उनके
मनोभावों को अच्छी तरह समझते हुए अशफाक को श्छंतपवने र्वा जीमूतसकश
नामक पुस्तक पढ़ने को दी। इस पुस्तक का अशफाक पर गहरा असर
हुआ। बेचैन अशफाक क्रांतिकारियों से मिलने के लिये प्रयत्नशील हो
गये। उसी समय उनका सम्पर्क बनारसी लाल से हो गया। अशफाक को
क्या पता था कि बनारसी लाल पुलिस का मुखबिर है। उसके मुखबिर
होने की बात तो बाद में उन्हें मालुम हुई। राजाराम बनारसी लाल के घर
में ही रहता था। अशफाक की क्रांतिकारी आन्दोलन में गहरी रुचि देखकर
उसने राम प्रसाद बिस्मिल की चर्चा की। भ्रम में पड़े अशफाक बनारसी
को सच्चा देशभक्त और मैनपुरी षड़यंत्र का क्रांतिकारी समझने लगे थे।
बनारसी लाल अभी और मानसिक अधिकार अशफाक पर करना चाहता
था, विश्वास पात्र होने की गरज से उसने 'आनन्दमठ' नामक पुस्तक
अशफाक को पढ़कर सुनाई।²
अशफाक अभी तक हिन्दी नहीं जानते थे। अब अशफाक को यह
लगने लगा था कि अब उनकी सारी समस्याएँ हल हो जायेंगी और वे
क्रांतिकारियों की जमात में सम्मिलित हो जायेंगे, उन्हें बनारसी लाल पर
पूरा विश्वास था। देखने में बनारसी हमेशा कुछ परेशान सा रहता था।
अशफाक ने समझा कि शायद साथियों के बिछुड़ जाने के कारण मन
बैचेन हो बनारसी का।
1920 में प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति पर सभी राजनीतिक बंदियों को
क्षमा कर दिया गया, लगभग सभी कैदी रिहा कर दिये गये।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवानसिंह राणा, पृष्ठ-35
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ-36
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