अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमेरी वालिदा जो बाकायदा तालीम हासिल किये हुए थीं, बराबर
अखबार की मुस्तकिल खरीदार बन गयी और मैं भी बराबर अखबार
पढ़ने लगा, तब मैंने जाना कि मुसलमान और भी कहीं हैं। क्योंकि उस
वक्त मैं जुगरफिया से नावाकिफ था और महज हिन्दुस्तान को ही
मुकम्मल दुनिया ख्याल करता था, जैसे मेंढ़क कुएं को तसव्वुर करता है।
चूँकि मैं पठान था और यह कौम आम तौर पर सेंटीमेंटल ख्याल की
जाती है। गो कि मैं अब ऐसा नहीं हूँ। इन ख्यालात में डूब गया और
रोजोशब इसी दुआ में रहता था कि तुर्क हिन्दुस्तान फतह कर लें और
यहाँ का बादशाह बन जाएँ तो हम खलीफये वक्त की रियाया बन जाएं
और अगर अफगानिस्तान से हुकूमत कायम कर ली तो फिर क्या है, फिर
हम भी हकदार ही हैं। अंग्रेज से नफरत पैदा हो गयी। मेरा यही ख्याल
था कि यही बालिये फसाद हैं और इनकी हुकूमत नेस्तनाबूद होनी
चाहिए।''¹
अशफाक उल्ला खाँ का यह कथन स्पष्ट करता है कि वे भावुक
खानदान के व्यक्ति हैं लेकिन खानदानी भावुकता की समझ आने पर वे
इसे त्याग देते हैं। यह त्यागना भी एक नई संवेदना को जन्म देता है,
वह है देश प्रेम की भावना और अंग्रेजों के प्रति घृणा। तुर्की के पतन से
उपजी अंग्रेजों के प्रति उनकी घृणा उनका मानसिक खाका तैयार करती
है। आगे चलकर अशफाक का वैचारिक स्तर परिपक्व होता है। अब
उनको पूर्व की भावनाओं से लाज आती है। अशफाक ने स्वीकार किया
है -'गरज यह कि मेरा उस वक्त का ख्याल आज मुझे बहुत जलील
मालूम होता है कि हम एक का हलकमे गुलामी उतारकर दूसरे की
गुलामी का जुआ अपने कंधो पर रखने में मुसर्रत सी महसूस करते हैं।
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ -26
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