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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 297 में से

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पृष्ठ 97

बाल्यकाल के बाद प्रथम विश्वयुद्ध के समय तुर्की साम्राज्य को भारी
नुकसान हुआ। तुर्की पर अंग्रेजों का अत्याचार था। तुर्की सम्राट जो
मुसलमानों का धर्म गुरु (खलीफा) हुआ करता था का पद समाप्त कर
दिया गया था, जिसके विरोध में आन्दोलन भी हुए। अशफाक तुर्की के
पतन का समाचार पढ़ते और अंग्रेजों के अत्याचार की सूचना पाते तो
बेचैन हो उठते। उस समय वे यह भी सोचते कि काश भारत पर भी
खलीफा या अफगानों का शासन हो जाता।¹
उन्हें क्या पता था कि यह उनकी अज्ञानता है। बाद में वे इस
अज्ञानता और मूर्खतापूर्ण बातों को स्वीकार करते हैं। वे लिखते हैं-‘‘जब
यूरोप की फिजा पर हिलाल के इर्द-गिर्द ईसाइयत का तूफान उठ रहा था
तब खिलाफत के झंडे को सरनगूं करने के लिए यूरोप के तसल्लीपरस्त
जमा हो रहे थे, जबकि आले उस्मान के कमजोर व नफीस बदन के चारों
तरफ ईसाई जागो जगन इकट्ठे हो रहे थे...अगर वहाँ अनवर व शकरी
दस्ते कयरस्त में तलवार लेकर मैदान में कूद पड़ते हैं, तो इधर भी अहले
दिल गर्दन में झोलियाँ डालकर दर-दर की भीख माँगते फिरते हैं और
रूपये से उनका खजाना पुर कर देते हैं। यों बाहमी उखवत और
इत्तहादे-इस्लामी की बुनियाद पड़ती है और भूला हुआ वायदा याद आता
है। खोई हुई मंजिल दिखायी देती है, भाई-भाई मिलते हैं। प्रोपेगण्डा
फैलता है, जिसका असर नौजवान मुसलमानों पर पड़ता है, कि इटली का
माल जला दिया जाता और उसके खिलाफ शोरिश पैदा की जाती, तुर्की
ख्वातीन की छुब्बुलवतनी, नौजवान तुर्की की सरफरोशिया तालिबाओं का
हिसाब, कॉलिज व स्कूल की कुर्बानियाँ एक नई स्प्रिट पैदा कर देती हैं।

  1. अशफाक उल्ला खाँ - भवान सिंह राणा, पृष्ठ-25
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